छह खबरें और छत्तीस डिसप्ले, इसमें पत्रकारिता कहां है?

इसके बावजूद बच्चों को पढ़ाई जाती है पत्रकारिता

आज के अखबारों में पहले पन्ने पर तीन राजनीतिक खबरें हैं जो निर्विवाद रूप से पहले पन्ने की है। इनमें पहला ईवीएम का मामला, दूसरा चुनाव आयोग का फैसला कि वे विरोध की आवाज को बहुमत से दबाते रहेंगे और तीसरा राजग सहयोगियों के लिए भाजपा का आभार मिलन महत्वपूर्ण है। ये खबरें लगभग इसी क्रम में सभी अखबारों में पहले पन्ने पर है। चुनाव आयोग का फैसला सूचना के लिहाज से महत्वपूर्ण है पर नया नहीं है और इस बात की पुष्टि करता है कि अभी तक जो हो रहा था वह सब ठीक हुआ है। वही चलता रहेगा। राजग की बैठक वाला मामला भी ऐसा ही है और भले ही वह औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन जैसा मामला हो लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स ने उसे शक्ति प्रदर्शन लिखा है। लोकसभा चुनाव के मतदान खत्म होने और कल मतगणना से पहले इन राजनीतिक खबरों के बीच आज राजनीति से जुड़ी कुछ खबरों हैं जिन्हें पहले पन्ने पर नहीं रखने का विकल्प है।

इनमें अनिल अंबानी कांग्रेस और नेशनल हेरल्ड के खिलाफ मामला वापस लेंगे, मुलायम और अखिलेश के पास आय से अधिक संपत्ति का मामला खत्म और भारतीय वायु सेना का हेलीकॉप्टर अपने ही मिसाइल का निशाना बना था जैसी खबरे हैं। आइए देखें आज इन सभी खबरों को अखबारों में कैसे परोसा गया है। मेरे हिसाब से ईवीएम यानी वीवीपैट की पर्चियों पर अभी अगर कुछ फैसला हो सकता है तो इस खबर को लीड बनाने का मतलब है वरना यह विपक्ष की खबर को प्राथमिकता देने की औपचारिकता से ज्यादा कुछ नहीं है। सूचना तो ठीक है लेकिन उसपर कोई कार्रवाई ही न हो और कल चुनाव आयोग की खबर की तरह यह भी पहले पन्ने पर छप जाएगी कि सिर्फ पांच प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों को गिनने का फैसला सही है और वही है तो आज इस खबर को लीड बनाने का भी कोई मतलब नहीं है। अखबारों की स्वतंत्रता या शक्ति तब दिखती जब कहा जाता कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग को असहमति का भी सम्मान करना चाहिए। और उसका खुलासा जरूर होना चाहिए। पर वही कहीं नहीं है।

हिन्दुस्तान टाइम्स में वायुसेना का हेलीकॉप्टर अपने ही मिसाइल से गिराए जाने की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में भी यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है और मुलायम अखिलेश की आय से अधिक संपत्ति वाला मामला खत्म होने की खबर के शीर्षक में बताया गया है कि यह मामला 14 साल पुराना है। शीर्षक सिर्फ यह नहीं है कि मामला खत्म हुआ बल्कि यह भी बताता है कि मामला पुराना था। आप इसके राजनीतिक अर्थ निकाल सकते हैं कि मुलायम अखिलेश को राहत मोदी सरकार में मिली और यह भी कि उन्हें परेशान करने का काम मोदी सरकार ने नहीं शुरू किया था – पुराना मामला है। मैं नहीं कह रहा कि अखबार ऐसा जानबूझकर करते हैं पर आजकल व्हाट्सऐप्प की खबरों के हवाले से लोग जिस ढंग से बात करते हैं उससे इन खबरों और सुर्खियों का समाज पर प्रभाव समझ में आता है। कहने की जरूरत नहीं है कि शीर्षक लगाने वाला भी हमारे-आपके जैसा ही कोई है। वह वही बताता है जो वह देखता, जानता या समझता है। मेरा मतलब यह है कि चीजों को आप अपने हिसाब से समझना शुरू कीजिए।

टाइम्स ऑफ इंडिया में हेलीकॉप्टर मार गिराने और अनिल अंबानी वाली खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर दो अलग-अलग सिंगल कॉलम की खबर है। बताया गया है कि इनका विस्तार अंदर है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने चुनाव आयोग से ईवीएम की शिकायत करने गए विपक्षी नेताओं की फोटो भाजपा के “शक्ति प्रदर्शन” वाली फोटो के साथ छापा है और खबर का शीर्षक है, “विपक्ष, भाजपा ईवीएम से छेड़छाड़ पर भिड़े; चुनाव आयोग ने ऐसी संभावना से इनकार किया”। अखबार ने भाजपा नेताओं की फोटो की खबर का कैप्शन दिया है कि वे दिल्ली में रात्रिभोज पर मिले। सबसे दिलचस्प है कि टीओआई ने तीन कॉलम की इस खबर के साथ तीन कॉलम में ही खबर छापी है जिसका शीर्षक है, “आशंकाओं को दूर करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है : प्रणब”। इस तरह आप समझ सकते हैं कि आज यहां राजनीतिक खबरों का प्लेसमेंट कुछ अलग है। चुनाव आयोग ने असहमति को सार्वजनिक करने की लवासा की मांग से इनकार किया लीड है।

इंडियन एक्सप्रेस ने ईवीएम वाली खबर का फ्लैग शीर्षक लगाया है, 22 विपक्षी दलों ने वीवीपैट पर (चुनाव) आयोग से मुलाकात की, मुख्य शीर्षक है, मतगणना की उल्टी गिनती, विपक्ष और सुरक्षा चाहता है, चुनाव आयोग कहता है सब ठीक है। इस खबर का इंट्रो है, आज चुनाव आयोग की बैठक होगी, भाजपा ने कहा हार के डर से विपक्ष ने ईवीएम से भरोसा खोया। आभार मिलन की खबर भी इसी के साथ है। शीर्षक है, पीएम, शाह ने रात्रिभोज की मेजबानी की, एनडीए के सहयोगियों को धन्यवाद दिया। इसके साथ एक ही फोटो है। डिनर वाली। टेलीग्राफ ने इससे संबंधित कोई खबर पहले पन्ने पर नहीं रखा है। एक फोटो में अमित शाह प्रधानमंत्री को बधाई दे रहे हैं। टेलीग्राफ ने एक और फोटो पहले पन्ने पर छापी है जो अंग्रेजी चार अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। कल राजीव गांधी की पुर्ण तिथि थी। अखबार ने राहुल और प्रियंका गांधी की फोटो छापी है, जो उनके पिता को श्रद्धांजलि देने के बाद की है।

इसके मुकाबले कोलकाता के दैनिक द टेलीग्राफ में ईवीएम से डर की खबर लीड है और इसके साथ सिंगल कॉलम में प्रणब मुखर्जी का बयान है कि मैं जनादेश से छेड़छाड़ सेसंबंधित खबरों से चिन्तित हूं। ईवीएम चुनाव आयोग के कब्जे में हैं और इनकी सुरक्षा आयोग की जिम्मेदारी है। आयोग ने ईवीएम से संबंधित खबर में यह भी बताया है कि उत्तर प्रदेश में ईवीएम को लेकर असामान्य भिड़ंत हुई है और इससे पता चलता है कि राजनीति में अविश्वास और कडवाहट कितना बढ़ गया है। अखबार के मुताबिक राज्य में कम से कम पांच जगहों से विरोध प्रदर्शन की खबर है। हालांकि चुनाव आयोग ने कहा है कि मामलों को आपस में सुलझा लिया गया है। अखबार ने गाजीपुर में बसपा-सपा उम्मीदवार अफजल अंसारी के धरने की खबर लीड में प्रमुखता से छापी है जो दिल्ली के अखबारों में ऐसे नहीं है। इसके अलावा अन्य खबरों के इसके शीर्षक इस प्रकार हैं, पहला, “चुनाव खत्म हुए हेलीकॉप्टर से जुड़ा खतरनाक राज खुला” दूसरा, अनिल कांग्रेस के खिलाफ मामले खत्म करेंगे तीसरा, मुलायम- अखिलेश मामला बंद : सीबीआई।

आइए, अब इन्हीं खबरों के आलोक में कुछ हिन्दी अखबारों का पहला पन्ना देख लें। दैनिक भास्कर में पहले पन्ने पर लगभग आधा विज्ञापन है। इसके बावजूद छहों खबरें छोटी-बड़ी पहले पन्ने पर हैं। और मुझे नहीं लगता कि इस स्थिति में इससे बेहतर डिसप्ले हो सकता था। आज भास्कर का पहला पन्ना देखकर लग रहा है कि अच्छा अखबार बनाने के लिए खबरों की समझ के साथ नीयत की जरूरत है। हिन्दुस्तान में ईवीएम पर लीड के अलावा छह में एक खबर, मुलायम अखिलेश को सीबीआई से बड़ी राहत है। एक और खबर (शीर्षक) यहां है जो दूसरे अखबारों में नहीं दिखी, एनडीए का मोदी पर भरोसा, कहा – विपक्ष का हंगामा बेवजह। नवभारत टाइम्स में छह में से पांच खबरें पहले पन्ने पर है। सिर्फ चुनाव आयोग वाली खबर नहीं है। यह टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। बाकी सब खबरें कहने और देखने के लिए ही हैं। पढ़ने से कुछ नहीं मिलने वाला है। अगर आप अच्छा पेज बनाना चाहते हैं तो दैनिक भास्कर और नवभारत टाइम्स को साथ रखकर देखिए लगभग समान जगह में उसकी खबरें ज्यादा और पढ़ने लायक क्यों लगती हैं। नवोदय टाइम्स में आधा पन्ना विज्ञापन है और देश भर में ईवीएम पर हाहाकार और 22 दल चुनाव आयोग पहुंचे – एक ही खबर दो बार है। बीच में जो छोटी संक्षिप्त खबरें हैं वो भी ईवीएम पर ही हैं। इसके अलावा छह में से एक और खबर रात्रिभोज की है जो फोटो समेत पांच कॉलम में फैलाई गई है।

अमर उजाला में लीड का शीर्षक है, चुनाव आयोग के द्वार 22 विपक्षी दल, पीएम मोदी बोले – यह विपक्ष की हताशा। इसके अलावा रात्रिभोज की खबर फोटो के साथ है बाकी की चार खबरों में चुनाव आयोग की खबर में अमर उजाला ने जो जानकारी दी है वह अभी तक किसी और के शीर्षक में नहीं है। अखबार ने बताया है कि चुनाव आयोग में अब अल्पमत की राय दर्ज तो होगी पर उसे सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। इसके अलावा, कांग्रेस के खिलाफ 5000 करोड़ का मानहानि का मामला वापस लेंगे अंबानी और मुलायम अखिलेश को 12 साल बाद मिली क्लीन चिट भी है। राजीव गांधी की बरसी किसी को याद नहीं है। अमर उजाला ने वायुसेना का हेलीकॉप्टर भारतीय मिसाइल से ही गिराए जाने से संबंधित खबर पहले पन्ने पर नहीं ली है। दैनिक जागरण में पहले पन्ने पर कोई विज्ञापन नहीं है। और छहों खबरें हैं। हालांकि दो बहुत छोटी और एक बदले हुए शीर्षक से। इसके मुकाबले टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर छहों खबरें देखिए। आप मानेंगे कि कुछ खबरें औपचारिकता में छापी जाती हैं। राजस्थान पत्रिका में भी पांच खबरें पहले पन्ने पर हैं। छठी छोटी हो या नहीं महत्वपूर्ण भी नहीं है पर बिना विज्ञापन का पन्ना होने के बावजूद टेलीग्राफ और जागरण और पत्रिका के पन्नों में अंतर हैं और खबरें दब जाती हैं। छोटी तो हैं हीं।

आज की चुनी गई इन छह खबरों का भिन्न अखबारों में डिसप्ले देखिए, शीर्षक देखिए, लिखने की शैली और प्रस्तुति देखिए और सोचिए कि क्या यह सब किसी नियम या शिक्षा के तहत किया गया लगता है। मुझे नहीं लगता। खबर लिखना, अखबार बनाना ऐसी किसी विशेष योग्यता की मांग नहीं करता है जो सीखाया जाए और अगर कुछ सीखाया जा सकता है तो उसका पालन कहां कितने अखबारों में हो रहा है – यह देखने, समझने की चीजे है। ऐसी हालत में भी मीडिया संस्थान नौकरी चाहने वालों से पत्रकारिता की डिग्री मांगते हैं। सामान्य स्नातक या अंग्रेजी हिन्दी जानने वालों को नौकरी पर नहीं रखते हैं। नहीं जानने वाले चार-छह लाख रुपए खर्च करके कोर्स करते हैं और हिन्दी अखबारों में जो शुरुआती वेतन कैम्पस सेलेक्शन के बाद मिलता है वह इस फीस का कर्ज चुकाने की ईएमआई बराबर भी नहीं होता है। हालत सिर्फ अखबारों की नहीं, पत्रकारों और पत्रकारिता संस्थाओं की भी खराब है। और खबरें देखिए लगभग सभी अखबारों में छहों या कम से कम पांच खबरें हैं। पर क्या पाठकों पर समान प्रभाव छोड़ेंगी। स्पष्ट है कि कई अखबार खबर देकर भी उसका असर नहीं होने देते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट

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