जयपुर भास्कर ने संजय सैनी का जवाबी पत्र लेने से किया इनकार

जयपुर भास्कर प्रबंधन अब अपने पत्रों का जवाब स्वीकार करने से मना कर रहा है। इस कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार संजय सैनी की ओर से 17 मई का भेजा हुआ जवाबी पत्र भास्कर प्रबंधन ने स्वीकार नहीं किया है। सैनी ने भास्कर जयपुर की एचआर हेड वंदना सिन्हा को पत्र भेज कर 21 मई तक रांची ज्वाइन करने की चेतावनी भरे पत्र का कड़ा जवाब दिया था। उन्होंने अपने डेपुटेशन को अवैध व गैरकानूनी बताते हुए आदेश को भास्कर प्रबंधन की दुर्भावनावश की गई हरकत करार दिया था। सैनी ने यह जवाबी पत्र स्पीड पोस्ट से भिजवाया था लेकिन वंदना सिन्हा ने इसे रिफ्यूज कहते हुए लेने से मना कर दिया। सैनी को जब यह पत्र मिला तो उन्होंने बाकायदा ई-मेल कर भास्कर प्रबंधन की इस हरकत की जानकारी सर्वोच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को भी दे दी है। 

सैनी को भास्कर प्रबंधन का 6 मई का पत्र 15 मई 2015 को मिला। सैनी ने दैनिक भास्कर राजस्थान, जयपुर की एचआर हैड वंदना सिन्हा को लिखा कि कंपनी प्रबंधन की ओर से प्रार्थी कामगार पर अनर्गल आरोप लगाते हुए एक रजिस्टर्ड पत्र 6 मई को उसके निवास स्थान पर भेजा था जो 15 मई को मिला है। प्रार्थी कामगार ने इस पत्र का जवाब 17 मई को आपको व दैनिक भास्कर के राज्य संपादक व नेशनल सेटेलाइट एडीटर ओम गौड को ई-मेल पर दे दिया था। साथ ही इस पत्र का स्पीड पोस्ट से जवाबी पत्र भेजा गया था।

उन्होंने लिखा कि बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है, कंपनी की जिम्मेदार अधिकारी होते हुए भी आपने इस पत्र को लेने से मना कर दिया। इससे साफ तौर पर जाहिर होता है कि आप प्रार्थी के खिलाफ कार्रवाई करने का कोई षड्यंत्र कर रही हैं। प्रार्थी को आशंका है कि कंपनी प्रबंधन जवाबी पत्र नहीं मिलने की आड़ लेकर प्रार्थी के खिलाफ दुर्भावनावश कोई कार्रवाई करना चाहता है। इसका उदाहरण मेरा जवाबी पत्र लेने से मना किया जाना है।  यह जवाबी पत्र मुझे 26 मई को वापस मिला है।

कंपनी प्रबंधन को उन्होंने यह भी बताया कि सर्वोच्च न्यायालय अपने कई फैसलों में यह कह चुका है कि न्यायालय में विवादित मामलों में यदि कोई जिम्मेदार अधिकारी, कंपनी या जिसके नाम पत्र लिखा गया है, वह पत्र को लेने से मना करता है तो वह पत्र स्वीकार ही माना जाएगा।  ऐसे में कंपनी प्रबंधन कोई कार्रवाई करता है तो वह कार्रवाई अवैध मानी जाएगी। 

सैनी ने वंदना सिन्हा को 17 मई 2015 को लिखा कि उसकी ओर से 1 जनवरी 2015 को मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना का केस करने के बाद कंपनी प्रबंधन की ओर से लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है। उस पर केस वापस लेने के लिए लगातार दबाव बनाया जा रहा है। उसके केस वापस लेने से मना करने के बाद दुर्भावनावश और अवैधानिक तरीके से उसका डेपुटेशन रांची किया गया है। इसका उदाहरण नेशनल सेटेलाइट एडीटर ओम गौड़ का 3 मार्च का कथन है कि-‘तुमने कंपनी के खिलाफ केस करके गलती की है। तुमने कंपनी की पॉलिसी के खिलाफ जाकर काम किया है। इस कारण तुम्हारा डेपुटेशन किया गया है।’ इसके बाद 3 मार्च को ही स्टेट एडीटर लक्ष्मीप्रसाद पंत का कथन कि ‘तुमने केस वापस नहीं लिया तो तुम्हें और तुम्हारे परिवार को जेल भेज देंगे। तुमने कंपनी के खिलाफ केस किया है तो इसके नतीजे भुगतने के लिए भी तैयार रहना होगा।’  

उन्होंने अपने जवाबी पत्र में लिखित रूप से यह भी बताया है कि इससे पूर्व एच.आर. मैनेजर जोगेन्दर सिंह और सिटी प्रभारी सतीश कुमार सिंह ने 25 फरवरी को दिन में 12 बजे एक कमरे में उसे बुला कर कुछ कागजों पर उसके जबरन हस्ताक्षर करवा लिए। केस वापस लेने के लिए शपथ पत्र पर हस्ताक्षर कराने की कोशिश की। इन तमाम सबूतों की वीडियो रिकार्डिंग और तथ्यों के आधार पर प्रार्थी कामगार ने अपने डेपुटेशन आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की है। हालांकि इस पर आदेश अभी नहीं हुए हैं पर यह मामला अब  सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। ऐसे में कंपनी प्रबंधन की ओर से बार-बार डेपुटेशन पर जाने के आदेश देना, नहीं जाने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की धमकी देना अवमानना के स्तर को और भी बढ़ाता है।  ऐसे में प्रार्थी कंपनी प्रबंधन पर आपराधिक अवमानना की कार्रवाई कर सकता है।

उन्होंने भास्कर प्रबंधन को बताया कि अपनी बीमारी के दौरान सरकारी डॉक्टर से 27 मार्च 15 तक का मेडिकल अवकाश दे चुका था। उसके बाद भी कंपनी प्रंबधन ने अपने पैनल के डाक्टर के साथ मिल कर मेडिकल चैकअप के बहाने प्रार्थी कामगार की बीमारी में भी उसके जीवन से खिलवाड़ करने और जीवन को नुकसान पहुंचाने का षड्यंत्र किया।  इससे प्रार्थी डर गया कि कंपनी प्रबंधन मैनेज करके प्रार्थी और उसके परिवार को नुकसान पहुंचाने के लिए कोई भी एक्सीडेंट करा सकता है। इससे प्रार्थी मानसिक अवसाद में आ गया। प्रार्थी ने अपने मनोचिकित्सक डा. तुषार जगावत की मेडिकल उपचार की पर्ची 28 मार्च 15 को ही मेल कर दी थी। ऐसी स्थिति में प्रार्थी को अपने और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए मुख्यमंत्री राजस्थान सरकार, राज्य मानवाधिकार से गुहार करनी पड़ी। प्रार्थी कामगार के नियुक्ति पत्र (19 अगस्त 2004) के अनुसार प्रार्थी की नियुक्ति जयपुर में हुई थी। प्रार्थी के नियुक्ति आदेश में जयपुर से बाहर तबादला करने/डेपुटेशन पर भेजने संबंधी भेजने का कोई ब्यौरा नहीं है। ऐसे में प्रार्थी कामगार को तीन महीने के लंबे समय से जयपुर से बाहर नहीं भेजा जा सकता।

दैनिक भास्कर प्रबंधन ने आज तक स्थाई आदेश जारी नहीं किए जो औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश )अधिनियम 1946 के तहत जरूरी है। ऐसे में कंपनी प्रबंधन पर राज्य सरकार के आदर्श स्थायी आदेश लागू होते हैं। इन आदेशों के तहत कंपनी प्रबंधन किसी भी कर्मचारी को दूसरे राज्य में डेपुटेशन पर भेजने के लिए कर्मचारी की सहमति लेना आवश्यक है। जो प्रार्थी कामगार से नहीं ली गई। ऐसे में प्रार्थी के डेपुटेशन आदेश अवैध और गैरकानूनी है। इसे निरस्त किया जाए।

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