यूपी में जितने सत्ता केंद्र उतने ही अफसरों के गुट, जनता बेचारी रोये फूट-फूट

: यूपी में नाजुक होते नेताओं-नौकरशाहों के रिश्ते से विकास कार्यों और कानून व्यवस्था पर बुरा प्रभाव :  उत्तर प्रदेश की नौकरशाहों और राजनेताओं के रिश्ते भी निराले हैं। वर्षों से दोनों के बीच आंख-मिचौली का खेल चल रहा है। कब कौन कहां किसको पटकनी दे दे, कोई नहीं जानता। वैसे तो यह टकराव कोई खास मायने नहीं रखता है, लेकिन जब इसका असर समाज के किसी हिस्से पर पड़े तो इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। सच्चाई तो यही है कि अब देश, समाज और संविधान के तहत काम करने की कसम खाने वाले नौकरशाह और राजनेता जनता के हितों के बारे में रत्ती भर भी नहीं सोचते हैं। अगर ऐसा न होता तो उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव द्वारा सरकार की तरफ से छह वर्षों में अपने अफसरों को 13 पत्र लिखे जाने के बाद भी हालत जस के तस नहीं रहते।

यह दुख की बात है कि लम्बे अर्से से जनप्रतिनिधियों की अधिकारियों के बारे में यह शिकायत खत्म नहीं हो रही है कि वह उनकी सुनते नहीं हैं। जनप्रतिनिधि आरोप लगाते हैं कि आफिस के समय फोन करो तो ‘अधिकारी महोदय मीटिंग में हैं’  और सुबह करो तो ‘साहब फ्रेश हो रहे हैं’ का टका सा जबाव मिल जाता है। लौट कर फोन करना तो अफसरों की आदत में ही नहीं शुमार नहीं है। नेताओं और अफसरों के बीच संवादहीनता का सबसे अधिक खामियाजा विकास कार्यों पर पड़ रहा है तो जनता को भी इससे परेशानी हो रही है। जनता के छोटे से छोटे काम महीनों और कभी-कभी तो वर्षों तक लालफीताशाही में अटके रहते हैं, जो जनप्रतिनिधि के एक फोन से ही कुछ मिनटों में निपट सकते हैं। सबसे आश्चर्यजनक यह है कि इतना सब होने के बाद भी किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई होना तो दूर उसे इसके लिये किसी अधिकारी को सफाई तक नहीं देनी पड़ती है।

नेताओं और नौकरशाही के बीच संवादहीनता के दर्जनों मामले प्रतिदिन सामने आते रहते हैं। ऐसा क्यों होता है। इसकी तह में जाकर देखा जाये तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाती है। दरअसल अफसर तभी नाफरमानी करता है जब उसके सिर पर ‘किसी’ का हाथ होता है। उसे उम्मीद रहती है कि उसका ‘गॉड फादर’ किसी भी दशा में उसका बाल भी बांका नहीं होने देगा। उत्तर प्रदेश में इस समय जितने सत्ता के केन्द्र हैं उतने ही अधिकारियों के गुट बने हुए हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के अलावा मुलायम सिंह यादव, आजम खां, शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव के बीच नौकरशाह और अधिकारी पूरी तरह से गुटों में बंट गये हैं। इससे अधिकारियों और नेताओं दोनों का ही भला हो रहा है, लेकिन वो जनप्रतिधि चक्की के दो पाटों के बीच पिस रहे हैं जो बिना गुटबाजी के अपनी राजनीति चलाते हैं।

अब अखिलेश कैबिनेट में मंत्री आजम खां को ही ले लीजिए। उनके पास नगर विकास, संसदीय कार्य मुस्लिम वक्फ और अल्पसंख्यक कल्याण जैसे भारी भरकम विभाग हैं। आजम के करीबी अधिकारी किस तरह से बेलगाम हो जाते हैं, इसका नजारा एक नहीं कई बार देखने को मिल जाता है। हद तो तब हो गई थी कि जब करीब डेढ़ वर्षों पूर्व आजम की शह पर उनके एक चहेते अधिकारी ने रामपुर की तत्कालीन सांसद जयाप्रद की गाड़ी से लाल बत्ती तक उतार दी थी। काफी हायतौबा हुआ लेकिन इस अधिकारी को कोई छू भी नहीं पाया। आजम के विभाग में तैनात अधिकारियों की हनक का आलम यह है कि मुख्य सचिव तो दूर वह मुख्यमंत्री तक की नहीं सुनते हैं। इसके बदल में इन अधिकारियों को करना बस यह होता है कि आजम खां तानाशाहों की तरह फरमान सुनाते हैं और अधिकारियों को इसे बिना ना नुकुर के पूरा करना होता है। कुछ दिनों पूर्व आजम ने जिस तरह से जौहर विवि को अल्पसंख्यक संस्थान के रूप में मान्यता दिलाई, वह उनकी हनक का ही करिश्मा था। तत्कालीन कार्यकारी राज्यपाल कुरैशी ने जौहर विवि को अल्पसंख्यक संस्थान की मान्यता देकर वह कर दिखाया जो पिछले कई राज्यपाल संविधान का हवाला देकर नहीं कर पा रहे थे। आजम ने पिछले दिनों इसी तरह का एक और प्रयास किया। वह चाहते थे कि अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जिसे राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है, उसे कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया जाये। इसकी फाइल राज्यपाल राम नाईक के पास पहुंची तो उन्होंने इसे रोक लिया। इससे आजम का गुस्सा सांतवें आसमान पर पहुंचा हुआ है। यह और बात है कि वह चिल्लाने के अलावा कुछ कर नहीं सकते हैं।

दिल्ली से सटे एनसीआर की बात की जाये तो यहां राम गोपाल यादव की पंसद के अधिकारियों को ही तैनाती मिलती है। इन अधिकारियों को रामगोपाल का पूरा संरक्षण मिलता है। यहां के अधिकारियों को इधर-उधर करना तभी संभव हो पाता है जब चचा चाहते हैं। वर्ना भतीजे की क्या बिसात है जो यहां पत्ता भी हिला पाये। भले ही लाख घोटाले किये हों। इसी तरह से यूपी सरकार में कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव को भी यह नहीं पसंद है कि उनकी मर्जी के बिना कोई अधिकारी सिंचाई विभाग में अदला-बदला जाये। सीएम तक इस बात का ध्यान रखते हैं कि सिंचाई विभाग में कोई बदलाव किया जाये तो चचा शिवपाल यादव की रजामंदी से ही हो। रही सही कसर सपा प्रमुख मुलायम सिंह पूरी कर देते हैं। कुछ वरिष्ठ अधिकारी (जो 2003 से 2007 तक मुलायम के सत्ता में रहते) अभी तक अखिलेश को सीएम के तौर पर हजम नहीं कर पाये हैं। इन अधिकारियों की नजर में अभी भी मुलायम ही सीएम हैं। वह अपना कोई भी दुख दर्द नेताजी के पास ही लेकर पहुंचते हैं। मुलायम भी कभी यह नहीं कहते हैं कि वह सीएम अखिलेश से जाकर मिलें। मुलायम तुरंत इन अधिकारियों के पक्ष में फरमान सुना देते हैं। इसी तरह से कुछ पंचम तल के बल पर सीना तानें घूमते हैं। बाकी जो बचते हैं वह जातिवाद के सहारे अपनी गोटियां बैठा लेते हैं। गुटबाजी के चलते भ्रष्ट अधिकारियों की भी पौ-बारह हो रही है। नियुक्ति सचिव राजीव कुमार को ही ले लीजिये। सीबीआई जांच में दोषी और सजा मिलने के बाद भी स्टे लेकर वह अपने पद पर विराजमान हैं।

मंत्री से लेकर संत्री तक को इस बात का अहसास रहता है कि कौन विधायक किस गुट का है। इसी के आधार पर गुटों में बंटे अधिकारी जनप्रतिनिधियों से आचरण  करते हैं। अपने ही दलों के विधायकों की बात सपा में नहीं सुनी जाती है, ऐसे में विरोधी दलों के सांसदों का क्या हाल होता होगा, आसानी से समझा जा सकता है। लब्बोलुआब यह है कि अगर अफसर नेताओं की सुन नहीं रहे हैं तो इसके लिये कहीं न कही राजनेता ही दोषी हैं जो अपने हित साधने के लिये अधिकारियों को गलत-सही सभी फैसलों पर संरक्षण देते हैं। शासन को पता है कि मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों के प्रति सामान्य शिष्टाचार और प्रोटोकाल का पालन नहीं हो रहा है। जनप्रतिनिधियों का काम करना तो दूर की बात है। इसका नुकसान समाजवादी पार्टी और सरकार को उठाना पड़ रहा है। उसकी चौतरफा निंदा हो रही है। अखिलेश सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी बढ़ती जा रही है क्योंकि जनता तो यही जानती है कि उसने सपा को वोट दिया है और उसके कार्यकाल में अव्यवस्था का माहौल है। नाजुक मोड़ पर खड़े नेताओं और नौकरशाहों के रिश्तों को जल्द नहीं सुधारा गया तो 2017 में समाजवादी पार्टी को एक बार फिर 2007 की तरह सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. एक जमाने में ‘माया’ मैग्जीन के ब्यूरो चीफ हुआ करते थे. इन दिनों कई हिंदी अखबारों में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.

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