मैनेज करने और मैनेज होने वाली पत्रकारिता का यह दौर और आलोक तोमर जी की याद

Ashish Maheshwari : फेसबुक है कि याद दिला देता है… आज जब पत्रकारिता मैनेज करने और मैनेज होने भर का माध्यम बनकर रह गई है ऐसे दौर में आलोक तोमर जी का न होना बेहद सालता है… दिल्ली में करियर के शुरूआती दिनों में फेसबुक के माध्यम से जिस शख्स से परिचय हुआ उनमें आलोक तोमर एक बड़ा नाम हैं ….मेरे पिता के मित्र और वरिष्ठ पत्रकार Hari Joshi ने कभी मुझसे कहा था कि दिल्ली में कोई दिक्कत हो तो आलोक तोमर जी से मिल लेना ….फोन पर बात तो बहुत हुई. मोबाइल पर तबले वाली उनकी कॉलर ट्युन और बेबाक अंदाज से रूबरू हुआ पर दुख इस बात का कि मुलाकात न हो सकी….

अपनी पैनी कलम के चलते आलोक जी एक पुलिस अधिकारी से हुए पंगे के चलते जेल तक हो आए लेकिन कभी हार न मानी ….अपनी कलम से बडे़ बड़े लोगों की इनसाइड स्टोरी लिखने का जो माद्दा आलोक जी के अंदर था शायद आज हर कहीं नही मिलता ….साल 2011 की होली के अगल दिन किसी काम से मैने कवि कुमार विश्वास को फोन किया तो पता चला कि वे आलोक जी के अंतिम संस्कार में हैं …अपने होम टाउन में होली मनाने गया था और ये खबर सुनकर स्तब्ध और दुखी था लेकिन दुनिया ज़माने से लडकर हार न मानने वाले आलोक जी कैंसर से जीवन की लड़ाई हार चुके थे , आज फिर आलोक जी को उनके जन्म दिन पर मैं अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं …. धन्यवाद फेसबुक की आपने आज अपने जिंदगी के झंझावातों में डूबने वाले मुझ अधूरे इंसान को आलोक जी के जन्म दिन की याद दिलाई ….हमेशा जिंदा रहेंगे वो हमारे दिल में.

युवा पत्रकार आशीष माहेश्वरी के फेसबुक वॉल से.

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