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सुख-दुख

वैदिकजी को कुछ यूँ याद किया ओम थानवी और रवीश कुमार ने!

ओम थानवी-

डॉ वेदप्रताप वैदिक नहीं रहे। दशकों पहले कुलिशजी (पत्रिका के संस्थापक-संपादक) ने परिचय करवाया था। वैदिकजी नवभारत टाइम्स में थे। फिर भी मेरे आग्रह पर इतवारी पत्रिका में लिखते रहे। तब कमीज़-पतलून वाले थे। बाद में सदा धोती-कुरते या कुरते-पाजामे में जमे। अंतिम घड़ी तक सक्रिय रहे। फ़ोन पर कुशलक्षेम जानते। आईआईसी में मिल जाते।

हमने अनेक यात्राएँ साथ कीं। देश और विदेश में। उनके राजनीतिक तेवर बदलते रहते थे। बड़े-बड़े राजनेताओं से संपर्क थे, जिन्हें इस तरह सुनाते कि सच और गप का फ़ासला मिट जाता था। एक बार हम लोग पांडुरंग शास्त्री आठवले के आयोजन में पुणे में थे। भरे विशाल हॉल में उन्होंने सुनाया: कल प्रधानमंत्री (नरसिम्हा राव) का फ़ोन आ गया। तार के साथ कोई फ़ोन उठाकर लाया और बोला कि पी.एम. हैं लाइन पर, हमने कहा भई ज़रा होल्ड करने को कहो उनको, देखते नहीं दाढ़ी बना रहे हैं। कथन में ऐसा आत्मविश्वास उन्हीं के पास था।

हिंदी के लिए उन्होंने लम्बा आंदोलन चलाया। सड़कों पर उतरे। मुलायम सिंह यादव आदि ने भी मदद की। पर बाद में लोग साथ नहीं रहे। पीटीआई की हिंदी समाचार सेवा ‘भाषा’ उन्हीं ने खड़ी की। हाल के वर्षों में हरिशंकर व्यास के नया इंडिया के लिए एक स्तंभ वे रोज़ लिखते थे। आईआईसी के बगीचे तक में बैठ भी लिख भेजते थे। सरल-सहज भाषा उनकी उपलब्धि थी। लिखने और बातचीत में उनका संयम बहुत गहरा था। उत्तेजित नहीं होते थे। उकसाने पर भी नहीं।

विनम्र और सद्भावी वैदिकजी की स्मृति को सादर नमन।


रवीश कुमार-

रोज़ लिखने की आदत के हिसाब से उनकी उम्र कोई बीस साल की रही होगी मगर 78 साल की उम्र में वेद प्रताप वैदिक जी इस दुनिया को छोड़ गए। वैदिक जी ने क़रीब-क़रीब हर दिन लिखा है। यह शोध का विषय हो सकता है कि कब-कब नहीं लिखा है।

इन दिनों तो सुबह छह बजे तक उनका लेख आ जाता था। आप उनसे खूब बहस कर सकते थे, जैसा कि मैं करता था, जवाब यही मिलता था कि लेकिन मेरा स्नेह हमेशा तुमको मिलता रहेगा। फिर हम दोनों हँस लेते थे। मैं कह भी देता था कि आपकी बेटी इतिहासकार है। अब आप ये सब लिखना बंद कर दीजिए तो उन्हें ये बात बहुत अच्छी लगती थी। शायद बेटी को बहुत प्यार करते रहे होंगे।

मेरी सुरक्षा को लेकर हमेशा चिन्तित रहते थे। विदेश नीति पर साधिकार लिखने वाले वैदिक जी हिन्दी ठाठ से जीते थे। अंग्रेज़ी धुआँधार बोलते थे। दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव किया था। उनके जीवन में बड़े लोगों के क़िस्से भी एक से एक थे। ख़ूब सुनाना पसंद करते थे। तमाम संबंधों के बाद भी क्या-क्या ठुकरा दिया इसकी सूची तैयार होती थी। जब कभी शो के लिए बुलाया मना नहीं किया। हमेशा हौसलाअफ़जाई की है। वेद प्रताप वैदिक से बात करने की स्मृतियाँ अच्छी हैं। मैं उन्हें सहेज कर रखना चाहूँगा। मैं अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ ।


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