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फुलटास जिंदगी जीने और एक अंगुली के दुर्लभ टाइपिस्ट पत्रकार को अलविदा!

गोलेश स्वामी-

खनऊ के वरिष्ठ पत्रकार मेरे बड़े भाई समान ज्ञानेंद्र शर्मा जी का इस तरह जाना खल गया। वे जिंदादिल व्यक्तित्व के धनी थे। अभी होली से चंद दिन पहले ही एक निजी समारोह में उनसे मुलाकात हुई थी। लेकिन वे पहले की तरह इस बार नहीं मिले थे। मैं पास गया पूछा भाई साहब कैसै हैं? बोले सब ठीक हैं। लेकिन मुझे अहसास हुआ कि वे अस्वस्थ हैं, क्योंकि इससे पहले जब भी वे मिलते हमेशा चहकते हुए गर्मजोशी से मिलते। यहां तक कि जब हम कुछ पुराने साथी एक साथ फोटो खिंचवा रहे थे तो वे एकदम शांत बैठे रहे अन्यथा वे हमेशा ऐसे मौकों पर अभिभावक की भूमिका में होते थे।

वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की रणभूमि झांसी में जन्मे ज्ञानेंद्र जी ने नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान और स्वतंत्र भारत जैसे बड़े अखबारों के संपादकीय विभाग में उच्च पदों पर रहकर लेखन के क्षेत्र में झंडे गाड़े। लेखन में उनका होमवर्क जबर्दस्त होता था। जिससे उनके राजनीतिक विश्लेषण पठनीय होते थे। मैं ने उनके साथ कभी कार्य नहीं किया, लेकिन एक बड़े भाई और मार्गदर्शक के रूप में उनका सानिध्य हमेशा मिला। शायद चंद पत्रकार होंगे जिनको उनका खास स्नेह मिला, उनमें से एक मैं भी हूं।

उन्होंने अनेक बार “अमर उजाला” लखनऊ और “हिन्दुस्तान” लखनऊ की मेरी रिपोर्ट पढ़कर सराहना की और शाम को घर बुलाकर पीठ थपथपाई तो कई बार उलाहना भी दिया कि बहुत दिन से कोई अच्छी रिपोर्ट पढ़ने को नहीं मिली। यह उनकी आत्मीयता ही थी। मैं कहता भाई साहब जल्द लिखता हूं। वे उम्र में काफी बड़े होने के बावजूद अपने से आयु में छोटे पत्रकारों के साथ उनका व्यवहार हमेशा मित्रवत रहता था। नवीन जोशी जी की वे खूब तारीफ करते थे और घदू (घनश्याम दुबे)भाई का हमेशा ख्याल रखते थे। शायद दोनों से उनकी ज्यादा ही आत्मीयता थी।

स्वर्गीय राजबहादुर सिंह के त्रयोदशी संस्कार से लौटते समय वरिष्ठ पत्रकार सुरेश जी ने तय किया वे पत्रकारों के जन्म दिन पर उनको लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित करने का एक अनूठा कार्यक्रम शुरु करना चाहते हैं। सभी ने सर्वसम्मति से सहमति जताई और इसके लिए सबसे पहले ज्ञानेंद्र जी को चुना गया। सुरेश जी ने यूपी प्रेस क्लब में उनका अभूतपूर्व सम्मान कार्यक्रम किया। अफसोस कि एक पारिवारिक इमर्जेंसी के कारण मुझे अचानक बाहर जाना पड़ा था और इस ऐतिहासिक कार्यक्रम का मैं हिस्सा नहीं बन सका था। लेकिन मैने फोन करके उनको बधाई दी तो बोले कहां रह गए थे। मैं पारिवारिक इमर्जेंसी का हवाला दिया तो बोले कोई बात नहीं, किसी दिन घर आओ। लेकिन फिर ऐसा उलझा कि उनके घर नहीं जा सका था।

वे यूपी के पहले पत्रकार थे जो मुख्य सूचना आयुक्त बने और पत्रकारों के लिए सूचना आयुक्त बनने का रास्ता साफ किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव जी सहित देश और प्रदेश के अनेक बड़े राजनेताओं से अच्छे संबंध थे। कई राजनेता उनसे सलाह लेते थे। कुछ ब्यूरोक्रेटस को भी मैने उनसे मार्गदर्शन लेते देखा था। वे एक अच्छे पत्रकार के साथ-साथ अच्छे इंसान भी थे। उनके साथ बिताया समय भुलाया नहीं जा सकता। वे हमेशा मेरी हमेशा यादों में रहेंगे। सादर नमन।

अकु श्रीवास्तव-

खनऊ में हर नए और पुराने पत्रकार के लिए ज्ञानेंद्र शर्मा एक इनसाइक्लोपीडिया थे। उम्र भले ही अब 80 की हो गई थी पर साल भर पहले तक जिस गर्मजोशी से राजनीति की गणित समझाते थे, वो सटीक निशाने पर होती थी।

पत्रकारिता में हम नए नए थे और वो स्थापित। जिस भी बंदे ने बीस साल पहले तक लखनऊ से पत्रकारिता शुरू की होगी, उसको उनके रुतबे का अहसास न हो, यह हो नहीं सकता। ..और अगर आपने एक हाथ बढ़ाया तो वो आपको आगे तक ले जाने में संकोच नहीं करते थे। गुलिस्तां कालोनी का घर उनका खुला रहता था, सुबह से रात तक।

कई किस्से हैं उनके साथ काम करने के। नवभारत टाइम्स में नौ साल काम करने के दौरान और उसके पहले के भी। वीरबहादुर सिहं मुख्यमंत्री हुआ करते थे। तब तक हम भी थोड़ा सीनियर हो गए थे और नाइट शिफ्ट इंचार्ज थे। अचानक एक दिन रात ग्यारह बजे अवतरित हो गए। हमने कहा, क्या हुआ पंडत जी। बोले, जगह बनाओ, बड़ी खबर दे रहा हूं। ..और तैयार हो गए खबर टाइप करने के लिए।

एक अंगुली से टाइप करने का ऐसा माहिर पत्रकार मेरे सामने तो कोई नहीं गुजरा। 1988 की भंयकर गर्मियों तक हम लोग कम्प्यूटर पे नहीं आए थे। पंडत जी बोले, किसी के पास खबर नहीं है। बीरबहादुर कल इस्तीफा दे देंगे। अभी सीबी गुप्ता बिल्डिंग में सब फाइलें निपटा रहे हैं। बीस मिनट में खबर तैयार। नवभारत टाइम्स में वह अकेली खबर थी। काम उनका शाबाशी हमें भी मिली।

ज्ञानेंद्र जी की गजब फिटनेस थी। उस समय के बैडमिंटन के बड़े खिलाड़ी सैयद मोदी के साथ स्टेडियम में अक्सर देखे जाते थे। उनकी फिटनस देखकर कोई रश्क कर सकता था। ऐसा आदमी कैसे किसी बीमारी की जकड़ में आ सकता है.. ठीक है जाना सबको है.. पर ज्ञानेंद्र जी ने अपनी जिंदगी फुलटास जी। नमन पंडत जी।

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