बनारस का यह पत्रकार दुनिया के तीस सूचना नायकों की सूची में शामिल

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत और मिर्जापुर के पत्रकार पवन जायसवाल हुए सम्मानित

कोरोना संक्रमण से मौत के मुंह में पहुंचे बनारस के वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत जब स्वस्थ होकर घर लौटे तो उन्हें एक के बाद एक खुशियां मिलनी शुरू हुईं. पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ), पेरिस ने दुनिया के सूचना नायकों की एक सूची जारी की है जिसमें एक नाम विजय विनीत का भी है.

इस लिस्ट में कुल तीस सूचना नायकों के नाम हैं. कोविड-19 महामारी के दौरान साहस व दृढ़ता के साथ विश्वसनीय और महत्वपूर्ण जानकारी प्रसारित करने वाले भारत के सिर्फ दो पत्रकारों का नाम इस लिस्ट में शामिल किया गया है. इनमें एक नाम “द वायर” के सह-संस्थापक और संपादक सिद्धार्थ वरदराजन का है और दूसरा नाम विजय विनीत का है.

पेरिस की संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) की रिपोर्ट के मुताबिक “द वायर” के सह-संस्थापक और संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और हिंदी अखबार “जनसंदेश टाइम्स” के एक रिपोर्टर विजय विनीत ने दुनिया भर के 30 कोरोनोवायरस “सूचना नायकों” की सूची में प्रमुख स्थान बनाया है। पत्रकारों, व्हिसलब्लोअर और मीडिया आउटलेट के सर्वे में दोनों भारतीय पत्रकारों का नाम शामिल किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक दोनों भारतीय पत्रकारों ने अपने साहस, दृढ़ता या नवाचार करने की क्षमता के बल पर कोविड -19 महामारी के दौरान विश्वसनीय और महत्वपूर्ण जानकारी प्रसारित करने में मदद की है। दुनिया की जानी-मानी संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF), पेरिस ने कहा है कि द वायर के संपादक सिद्धार्थ और जनसंदेश टाइम्स वाराणसी के पत्रकार विजय विनीत ने कोरोनाकाल में सटीक सूचनाएं प्रसारित की। इसके लिए दोनों पत्रकारों को शासन और सरकार के जुल्म व ज्यादती का शिकार भी होना पड़ा।

देखें मूल प्रेस रिलीज का एक अंश-

Vijay Vineet & Siddharth Varadarajan among top 30 world list of Covid-19 ‘information heroes’

Two Indian journalists, Siddharth Varadarajan, co-founder and editor of “The Wire”, and a reporter for the Hindi newspaper “Jansandesh Times” Vijay Vineet find their place in the list of 30 coronavirus “information heroes” across the world – journalists, whistleblowers and media outlets whose “courage, perseverance or capacity to innovate has helped to circulate reliable and vital information during the Covid-19 pandemic.”

The Reporters Without Borders (RSF), a Paris-based international non-profit, which has prepared the list, notes how Varadarajan summoned for questioning by the police in response to a complaint by the chief minister of Utter Pradesh for “reporting” that the latter “attended a religious gathering that did not respect social distancing two days after the start of a nationwide lockdown.”

उधर, विजय विनीत को पंडित कमलापति त्रिपाठी फाउंडेशन ने पत्रकारिता के क्षेत्र में सर्वोच्च सम्मान दिया है. युगपुरुष पंडित कमलापति त्रिपाठी ने अंग्रेजों से लोहा लिया था और कई बार जेल भी गए. स्व. कमलापति त्रिपाठी देश के प्रखर पत्रकार और लेखक थे. उस दौर के जाने-माने अखबार ‘संसार’ और ‘आज’ के संपादक भी रहे. इनके नाम पर पत्रकारिता पुरस्कार पाने के बाद विजय विनीत ने कहा कि ये उनके लिए बहुत बड़े गौरव की बात है.

कोरोनाकाल में यही सम्मान पवन जायसवाल को भी मिला है. पवन ने साहसिक पत्रकारिता से समूचे मीरजापुर को गौरवान्वित किया है. पिछले साल नमक-रोटी प्रकरण में पवन ने भ्रष्ट और मायावी सिस्टम के दमन को काफी झेला. इनकी लड़ाई सड़क से लेकर प्रेस काउंसिल तक लड़ी गई. पीसीआई की सुनवाई के दौरान विजय विनीत, पवन जायसवाल और अधिवक्ता रणविजय सिंह पहुंचे थे.

इन दो बड़े सम्मानों के बाद विजय विनीत कहते हैं-

”मैंने जीवन में यह एहसास कभी नहीं पाला कि मुझे बड़ा पीढ़ा, मोटी रकम और ऊंची कुर्सी चाहिए। पैंतीस साल पहले भी मैं रिपोर्टर था और आज भी हूं। खबरों के लिए दिन-रात बेचैन रहने का शगल अभी भी मन में हिलोरें लेता है। सत्ता और सिस्टम की गलत नीतियों के खिलाफ लिखने-बोलने में मैं तनिक भी परहेज नहीं करता। मौजूदा दौर में प्रतिरोध की ताकत क्षीण होती जा रही है। मीडिया में अब ‘राजा का बाजा’ बजाने वाले पत्रकार ही सभी को सुहाते हैं। यह कहते हुए मुझे कोई गुरेज नहीं है कि जिन्होंने जीवन में कभी अपना ही अखबार पूरी तरह नहीं पढ़ा। साल भर में कायदे की कोई किताब नहीं पढ़ी। दो-चार अच्छी स्टोरियां और अच्छे लेख तक नहीं लिखे। वो लोग अब पादुका पूजन कर अपने लिए रास्ते ढूंढ़ रहे हैं। जलनखोरी और पादुका पूजन ही पत्रकारिता को गर्त में ले जा रही है।

चंदौली के एक गांव उतरौत से बनारस शहर में पढ़ने आया था। उस समय ढेरों सपने और बेशुमार हौसला था। मीडिया में रहते हुए हमने ईमानदारी का रास्ता चुना। न सरकारी पत्रकार बनने की कोशिश की, न दरबारी। किसी भी सत्ता की चाटुकारिता करना और लहालोट होकर रोजाना उनकी शान में कसीदे पढ़ना मुझे पसंद नहीं है। मैं जो हूं, वो हूं और आगे भी वही रहूंगा। मैं जानता हूं कि मीडिया की दुनिया में टिकता वही है, जिसकी खबरें बिकती हैं। बिकने वाले पत्रकारों की खबरें नहीं बिका करतीं। मैंने भीड़ से अलग हटकर हमेशा बेहतरीन रिपोर्ट्स लिखने और दिखाने की कोशिश की है। जनसंदेश में हमने कई प्रतिमान गढ़े हैं। वादा करता हूं कि आगे भी जो कुछ करूंगा, अच्छा ही करूंगा। हमेशा ऐसा लिखता रहूंगा जिससे बनारस गौरवान्वित होता रहेगा।

इस साल हमने कहानियों की सच्ची कहानी ‘बनारस लाकडाउन’ लिखी है। कोरोनाकाल में ‘आखों देखी’ देश की पहली पुस्तक को हर किसी ने सराहा है। कोविड से भी हमने तगड़ी जंग भी लड़ी है। अदम्य साहस और धैर्य के साथ इस धूर्त और षड्यंत्रकारी वायरस से जीत कर लौटा हूं। नवजीवन और सम्मान के लिए शुभकामनाएं देने के लिए आप सभी का एक बार फिर बहुत-बहुत शुक्रिया…।”

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