बंभन-वट से चमर-वट की विमर्श यात्रा

”पूछो मेरी जाति, शक्ति हो तो, मेरे भुजबल से’
रवि-समान दीपित ललाट से और कवच-कुण्डल से,.
पढ़ो उसे जो झलक रहा है मुझमें तेज-प़काश,.
मेरे रोम-रोम में अंकित है मेरा इतिहास।”

– कर्ण, रश्मिरथी

नौकरी-चाकरी-कारोबार-परिवार की सुरक्षा का सवाल हमेशा से ही मानव जाति के लिए मुश्किलों का सबब रहा है। होंगे लोग जो जात-पांत, छूत-अछूत की बात करते होंगे लेकिन वक्त के साथ सामाजिक परिवर्तन का चक्र लगातार आगे बढ़ता ही जा रहा है, बढ़ता ही रहेगा। अनय, अनीति, अन्याय का दौर हमेशा नहीं चलता। लेकिन थोड़ा गहराई से देखने की ज़रुरत है। गहराई से सोचने की ज़रुरत है। एक तरफा प्रचार के विपरीत सच्चाई को परखने की ज़रुरत है। उत्पादन के साधनों पर बीते 5000 साल में भारत में क्या चंद लोगों का ही अधिकार रहा है। जिसे आज की भाषा में स्किल कहते हैं, पेशागत हुनर जो रोजगार की सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है, वह पेशागत हुनर भारत में किस काल में चंद लोगों की मिल्कियत था?

जाति व्यवस्था कालबाह्य है, इसका आज कोई मतलब नहीं है। यह बात सही है लेकिन जब कभी यह व्यवस्था थी तो इसमें एक बात की पक्की गारंटी थी कि यह अपने दायरे में रोजगार के साधनों की सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी थी। हमें कभी भी यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि भारत में लंबे वक्त तक, हज़ारों साल तक अराजकता का दौर रहा। घरेलू और विदेशी स्तर पर देश लगातार अशांत रहा। रियासतों और राज्यों पर आक्रमण दर आक्रमण होते रहे। उस मुश्किल दौर में जीवन की सलामती, इज्जत की सलामती, घर-परिवार की सलामती और रोजी-रोटी की सलामती की पुख्ता गारंटी दे पाने में भारतीय राज्य, शासन, राजे-रजवाड़ों का हुक्काम, चाहे वो जैसा भी जिस रुप में था, वो नाकाम हो चुका था। तब उस भयानक दौर में जाति से जुड़ी व्यवस्था ने किसी हद तक रोजगार गारंटी और सामाजिक सुरक्षा का दायरा विकसित कर लिया था। छोटे-छोटे समूहों में समाज बंटता चला गया क्योंकि सुरक्षा और सबका पेट भरने का इंतजाम बड़े दायरे की तुलना में हमेशा ही छोटे दायरे में आसान और बेहतर होता है, जबकि हमेशा हमले का खतरा बना रहता था, तो छोटे समूह गांव छोड़कर भागने की पूरी तैयारी भी रखते थे। जान है तो जहान है, यही उस दौर में गांव की बसावट की सबसे अहम शर्त रहती रही।

भाग-भागकर जिस समाज ने सदियों तक जान बचाई, जीवन बचाया, उससे आप उम्मीद करें कि वो सभ्यता के सभी श्रेष्ठ मानदंड बनाकर रखेगा, मानवता की अप्रतिम मिसाल हमेशा की तरह पेश करता रहेगा, ये उम्मीद करना भी बौद्धिक दिवालियापन है। यहां तो पूरा दौर ही साल 712 ई. से 1857ई. तक भागने और जीवन बचाने की जुगत में ही बीतता गया। बीते एक हज़ार साल में कौन सी सदी रही, वो पीढी कौन सी रही जिसकी जिंदगी हमलावरों के खिलाफ बर्बर आक्रमणकारियों के खिलाफ जान बचाने के लिए भागते-हांफते न बीती हो। इसलिए जाति की सच्चाई में गिरावट कितनी आई, क्यों आई, इसके बारे में क्या कहा जाए, किसे दोषी ठहराया जाए। लाख बुराई आई लेकिन एक बात जो मुझे हमेशा सोचने पर विवश करती रही कि पीढ़ी दर पीढ़ी कला-शिल्प-ज्ञान, हुनर, उत्पादन से जुड़े तमाम बारीक कामों की विद्या को इसी जाति के तंत्र ने हिंदुस्तान में बचाया, बनाया, सजाया, संवारा और आगे बढ़ाया।

जिसे गाली देनी हो दे लेकिन इतनी कृतघ्नता भी अच्छी बात नहीं। इसी जाति के तंत्र ने भारतीय समाज को, उसके मूल मानवीय चिंतन को विदेशी हमलों की आंधी में भी मूल रुप से सुरक्षितकर भविष्य की पीढ़ियों को स्थानांतरित करने में भरसक मदद की। लेकिन विदेशी आक्रमण के आंधी थमने के बाद इस जाति व्यवस्था की गलत रुढियों को ही जो अमिट मानकर हमेशा के लिए इससे चिपक गए, उन लोगों ने जाने या अनजाने देश का-समाज का बड़ा भारी अपकार ही किया।

मुझे अपने बचपन की याद है। जिस गांव में मैं रहता था, वह ब्राह्णणों का गांव, मैं भी ब्राह्णण जाति में जन्मा। मेरे खेत की देखभाल करने वाले परभू चर्मकार हमारे लिए बचपन से ही बड़का बाऊ थे, हम तो हमेशा ही उन्हें बड़का बाऊ कहते आए। उनके छोटे भाई नरोत्तम को चाचा कहते आए। परभू के बेटे गांव छोड़कर शहर चले गए और फिर लौटकर गांव नहीं आए, कभी परभू का कोई हाल तक नहीं पूछा। परभू हमारे ही घर पर ज्यादा वक्त गुजारते। नरोत्तम के बेटे नागेंद्र के साथ हम बचपन में खेले, बगैचे में खाए-नहाए। बातें तब भी सुनने को मिलती थी लेकिन बाबा ने यही संस्कार दिया था कि ये हमारा परिवार ही है।

उन दिनों कच्ची बखरी थी हमारी। नागेंद्र का मकान भी कच्चा ही था। हमारी बखरी बड़ी थी, नागेंद्र की बखरी छोटी थी। घास-फूस की मंड़ई हमारे दरवाजे भी थी, नागेंद्र के दरवाजे पर भी थी। गाय हमारे दरवाजे पर थी, गाय नागेंद्र के दरवाजे पर थी। नागेंद्र के घर का कुआं उनकी बस्ती में था जिसे हम चमरौटी कहते थे, हमारे पानी का बंदोबस्त हमारे कुएं पर था जिसे लोग बंभनौटी कहते थे। जाड़े के दिनों में दादी हमें पुआल बिछाकर गोबर से लीपे कमरे में ज़मीन पर सुला देती थीं, जाड़े के दिनों में नागेंद्र भी ऐसे ही सोते थे, ज़मीन पर पुआल पर लगदी बिछाकर। मैं बाद में शहर पढ़ने चला गया, नागेंद्र गांव के स्कूल में फिर कस्बे के स्कूल में पढ़ते रहे। तो हमारे और नागेंद्र के रहन-सहन के स्तर में बहुत बड़ा फर्क उस वक्त हमने नहीं जाना। हालांकि बाद में यानी आज से करीब 30 साल पहले की बात बताता हूं कि जब शहरीकरण की आंधी तेज हुई। बिजली-बत्ती, पक्के मकान, गाड़ी-बंगला, रेफ्रीज़रेटर, जेनरेटर, एसी-कूलर और अंग्रेजी शिक्षा का बोलबाला गांवों की ओर दस्तक देने लगा। 90 का दशक आते-आते सारा भेद चरम पर दिखने लगा। बंभनौटी में कच्चे मकान गिरे तो पक्के आए, लेकिन चमरौटी के हालात नहीं बदले। क्यों नहीं बदले, इस पर विवेचन होता ही आया है।

पर मुद्दा ये है कि आधुनिक सभ्यता के दौर में अमीरी-गरीबी का भेद यानी आर्थिक विषमता का मसला ज्यादा अहम हो गया, जाति खुद में पीछे होती गई, छूटती गई। मसलन, नागेंद्र सरकारी स्कूल में अध्यापक हो गए, चमरौटी के और कई युवक सरकारी नौकरी में आ गए लेकिन बंभनौटी में मुश्किल से ही नागेंद्र के ‘समौरिया'(बराबर उम्र का) कोई सरकारी नौकरी पा सका। लिहाज़ा आज चमरौटी के दिन अच्छे हैं। इसके विपरीत बंभनौटी में नशा-गलत आदतों ने कई युवकों का जीवन ही बरबाद कर दिया। वहीं चमरौटी में युवकों की शालीनता, श्रमशीलता, अनुशासन, विनम्रता और लगातार सही रास्ते पर चलने के स्वभाव ने उनकी जिंदगी बदल दी। हालांकि अब बंभनौटी में भी चेतना बढ़ी है, क्योंकि चेतना फिर से उठ रही है, युग बदल रहा है, आज बंभनौटी के युवक भी सजग हैं, अच्छी आदतों की ओर ध्यान गया है। हालांकि सरकारी नौकरी से बंभनौटी के ज्यादातर युवकों में आज भी नाउम्मीदी है लेकिन स्किल और हुनर से जुड़े दूसरे कामों में तालीम, प्रवीणता और योग्यता हासिलकर वो जिदंगी की गाडी खींच रहे हैं। कोई बीटेक के जरिए तो कोई एमबीए के जरिए तो कोई ऑटोमोबाइल डिप्लोमा, आईटीआई के ही जरिए प्राइवेट कंपनियों में अच्छी जगहों पर काबिलियत दिखा रहे हैं।

इसमें एक मुश्किल ये भी है कि ज्यादातर राज्यों में, जनपदों में गांव भांय-भांय, सांय-सांय कर रहे हैं, क्योंकि युवकों की बड़ी आबादी परिवार समेत शहरों में शिफ्ट हो चुकी है, रोजगार का सवाल ज़मीन और जड़ों से दूर ले गया है। लेकिन तीज-त्योहार, शादी-विवाह पर आज भी युवकों की टोली जुटती है, वैसे ही जीवन की पुरानी यादें खिलती हैं, जातिभेद जैसे सवाल अब गांव में बेमानी लगते हैं, अब जो सवाल गांव में खड़ा होता भी है तो वो आर्थिक विषमता के आधार पर खड़ा है। ये सवाल ब्राह्मण-ब्राह्मण के बीच खड़ा है, ये ठाकुरों में खड़ा है, ये भूमिहारों में खड़ा है, ये यादवों-हरिजनों समेत तमाम दूसरी जातियों में खड़ा है, ये सवाल मुसलमानों और ईसाइयों को भी उतना ही परेशान कर रहा है। इस आर्थिक विषमता के अभिशाप को दूर करने के लिए आज बड़े राजनीतिक और क्रांतिपरक संघर्ष की ज़रुरत है।

इसलिए ज़रुरी है कि जाति से जुडे अतीत के ज़ख्मों को बार-बार कुरेदने और खोदने से अच्छा है कि नया दिया जले। नई रोशनी फैले। हर जीवन को अपना दीपक खुद ही बनना होगा, और जो रोशनदिमाग है, ये उनकी जिम्मेदारी है कि जहां अंधेरा है उन्हें वहां जाकर सेवा का दीपक जलाना होगा। हिंसा, अत्याचार और भेदभाव के अंधेरे को हमेशा के लिए मिटाकर नवसमाज सृजन का सही वक्त यही है। इसमें हम सबकी ऊर्जा लगे, इसी में से बेहतरी की राह निकलेगी। बाकी तो सब स्वार्थी और जेब-खरीद राजनीति के मोहरे हैं, जो जितना गाली बक सके एक दूसरे को, कम ही है।

लेखक राकेश उपाध्याय टीवी जर्नलिस्ट हैं. संप्रति न्यूज़ 24 में कार्यरत है. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है. संपर्क : rakesh.varanasi@gmail.com


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