आउटलुक मैग्जीन ने स्टाफ और फ्रीलांस लेखकों का पैसा मारा, नए संपादक मौनी बाबा बने

कभी देश की जानी मानी पत्रिका के रूप में चर्चित आउटलुक का नाम आजकल चिरकुटई के कारण कुचर्चा में है. इस मैग्जीन के संचालक अब हरामखोरी पर उतर आए हैं. इन्होंने कई महीनों से अपने स्टाफ को वेतन नहीं दिया है. गुस्से और क्षोभ के कारण कई लोगों ने इस्तीफा तक दे दिया है.

अंग्रेजी मैगज़ीन में कार्यरत एक पत्रकार जिसने तंग आकर कम सैलरी वाली दूसरी नौकरी पकड़ ली है, ने बताया “कई महीने से लगातार वेतन न मिलने से आर्थिक तंगी और स्ट्रेस इतना बढ़ गया कि मेरी पूरी टीम ने आउटलुक छोड़ दिया. तीन महीने का वेतन अब तक बकाया है जिसके लिए तमाम कॉल और ईमेल किये लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं।”

उधर, आउटलुक हिंदी पत्रिका की हालत पहले से ही पतली है. लॉकडाउन के दौरान यह ऑनलाइन बन कर सिमट गई. खर्च में कटौती के नाम पर कई लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया गया. इसके एडिटर इन चीफ हरवीर सिंह खुद भी जुलाई में इस्तीफा देकर एक चैनल ज्वाइन कर चुके हैं.

हिंदी संस्करण ने भी एक साल से लेखकों का बकाया दबा रखा है. सबसे बुरी गत फ्रीलान्स लेखकों की है. आउटलुक ग्रुप की अन्य मैग्ज़ीनों मसलन ट्रैवेलर का यही हाल बताया जाता है.

वरिष्ठ पत्रकार कंचन श्रीवास्तव ने कल ट्विटर पर अंग्रेजी में लिखा, “मैंने पिछले साल आउटलुक हिंदी में कुछ आर्टिकल लिखे। आज तक पैसा नहीं मिला, नए नए बहाने देकर टरकाया गया. अब पता चला है कि एडिटर हरवीर सिंह जॉब छोड़ चुके हैं.”

उनके ट्वीट के जवाब में वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट अर्जुन कामदार लिखते हैं, “मेरा पैसा १४ महीने से बकाया है.”

फ्रीलान्स लेखक सुतीर्थ लाहिड़ी कहते ने ट्विटर पर जवाब दिया, “मुझे खेद है आपके साथ ऐसा हुआ. पिछले नवम्बर में लिखे आर्टकिल का मेरा पैसा अब जाकर दस महीने बाद मिला। इस बीच दो एडिटर बदल गए, फाइनेंस ने जवाब देना बंद कर दिया। एक एडिटर ने कभी कभार जवाब दिया। अनगिनत ट्वीट और ईमेल के बाद अंत में मुझे पैसा मिला। शेम ऑन यू आउटलुक ट्रेवेलर।”

वरिष्ठ पत्रकार विनोद कापड़ी समेत अन्य लोगों ने भी आउटलुक प्रबंधन की हरक़तों पर गुस्से का इज़हार किया। कतिपय पाठकों ने तो मैगज़ीन बंद करने की धमकी भी दे डाली। हिंदी पखवाड़े में हिंदी पत्रकारिता की इस दुर्गत से सब हैरान हैं।

जो लेखक आज भी पैसा वापस मिलने की उम्मीद में मैगज़ीन के अधिकारियों संपर्क जारी रखे हुए हैं उनका कहना है कि नए एडिटर का बर्ताव भी टरकाने वाला है. नया संपादक मौनी बाबा बन गया है. फोन करने पर ठीक से बात तक नहीं करता. उसे लगता है कि वह यूं ही मौन रखकर सबको अपना पैसा भूलने के लिए मजबूर कर देगा लेकिन उसे ये नहीं पता कि आज सोशल मीडिया का दौर है. उसकी सरोकार व संवेदना की पूरी कुंडली वायरल होने लगेगी तब उसे समझ आएगा कि दूसरों की हक की लड़ाई का विरोध कर उसने गलत किया।

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