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पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में आधे से ज्यादा भारत में नहीं रहना चाहते!

‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में छपे एक सर्वेक्षण ने आज मुझे जरा चौंका दिया। इसके अनुसार देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में आधे से भी ज्यादा भारत में नहीं रहना चाहते। वे भारत को अपनी अटल मातृभूमि नहीं मानते। उन्हें मौका मिले तो वे किसी अन्य देश में जाकर हमेशा के लिए बसना चाहेंगे। उन नौजवानों में से 75 प्रतिशत का कहना है कि वे किसी तरह भारत में रह रहे हैं। 62.8 प्रतिशत युवतियों और 66.1 प्रतिशत युवकों का मानना है कि इस देश में निकट भविष्य में अच्छे दिन आने की संभावना कम ही है। उनमें से 50 प्रतिशत का कहना है कि भारत की दशा सुधारने के लिए किसी ‘महापुरुष’ का अवतरण होना चाहिए। उनमें से लगभग 40 प्रतिशत ने कहा कि यदि उन्हें पांच साल के लिए प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो वे देश की दशा सुधार सकते हैं।

‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में छपे एक सर्वेक्षण ने आज मुझे जरा चौंका दिया। इसके अनुसार देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में आधे से भी ज्यादा भारत में नहीं रहना चाहते। वे भारत को अपनी अटल मातृभूमि नहीं मानते। उन्हें मौका मिले तो वे किसी अन्य देश में जाकर हमेशा के लिए बसना चाहेंगे। उन नौजवानों में से 75 प्रतिशत का कहना है कि वे किसी तरह भारत में रह रहे हैं। 62.8 प्रतिशत युवतियों और 66.1 प्रतिशत युवकों का मानना है कि इस देश में निकट भविष्य में अच्छे दिन आने की संभावना कम ही है। उनमें से 50 प्रतिशत का कहना है कि भारत की दशा सुधारने के लिए किसी ‘महापुरुष’ का अवतरण होना चाहिए। उनमें से लगभग 40 प्रतिशत ने कहा कि यदि उन्हें पांच साल के लिए प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो वे देश की दशा सुधार सकते हैं।

जाहिर है कि यह उनके आत्म-विश्वास की अति है। जिन लोगों को राजनीति करते-करते 30-40 साल हो गए और जिन्हें मुख्यमंत्री बने रहने का अनुभव भी है, ऐसे लोग भी प्रधानमंत्री बनने पर बुद्धु सिद्ध हुए और अपने होश-हवास खो बैठे तो ये 18 से 26 साल के नौजवान कौन सा तीर मार लेंगे? उनके इस दावे को तो हम कोरे उत्साह के खाने में डालकर छोड़ दे सकते हैं लेकिन इस काम के लिए किसी ‘महापुरुष’ की प्रतीक्षा का क्या मतलब है? क्या वे कोई तानाशाह चाहते हैं या कोई मुहम्मद तुगलक चाहते हैं या कोई हिटलर, मुसोलिनी और स्तालिन चाहते हैं? क्या वे स्तालिन के रुस और माओ के चीन की तरह भारत में डंडे का राज चाहते हैं?

यदि हां तो मानना पड़ेगा कि उन्होंने लोकतंत्र को रद्द कर दिया है। यह रवैया निराशा और बौद्धिक गरीबी का सूचक है। यदि जनता जागरुक हो तो जैसा डा. लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं। यदि देश की व्यवस्था सड़ी-गली दिख रही है तो जैसे तवे पर रोटी उल्टी-पल्टी जाती है, वैसे ही सरकारों को बदल डालना क्यों नहीं चाहिए?

भारत छोड़कर विदेशों में बस जाने की बात बेहद गंभीर है। यह हमारे युवकों में छा रहे पलायनवाद और घोर स्वार्थीपन का प्रमाण है। यह हमारी सरकारों की नकल की प्रवृत्ति का भी तार्किक परिणाम है। हमारे नेता, जो कि नौकरशाहों के नौकर हैं, पश्चिमी राष्ट्रों की नकल करते हैं। वे उनकी मानसिक गुलामी के शिकार हैं। हमारी युवा-पीढ़ी में दम हो तो वे देश के नेताओं को खदेड़ें, देश के हालात सुधारें और इस महान देश को अपने लिए ही नहीं, सारे संसार के युवकों के लिए आकर्षक बना दें।

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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