भय्यू महाराज के जीवन में अर्थ और काम छा गए थे, धर्म व मोक्ष पीछे छूट चुके थे

भय्यू महाराज : मध्यान्ह में सूर्यास्त

इंदौर के मेरे भक्त और प्रेमी उदय देशमुख, जिन्हें लोग भय्यू महाराज के नाम से जानते हैं, उनके निधन की खबर सुनकर मैं सन्न रह गया। अभी कुछ दिन पहले बैतूल (मप्र) के एक पुस्तक-विमोचन कार्यक्रम में वे मेरे साथ रहनेवाले थे। बहन उमा भारती तो पहुंचीं लेकिन वे नहीं आए। हम मंच से अभी उतर ही रह थे कि उनका फोन आया। कह रहे थे कि उनकी तबियत अचानक बिगड़ गई। नहीं पहुंच पाने के लिए क्षमा मांग रहे थे। Continue reading

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हे मोदीजी और शाहजी, क्या यही हिंदुत्व है, यह तो औरंगजेबी अदा है : डॉ वेद प्रताप वैदिक

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इस औरंगजेबी अदा के क्या कहने? यह खुशी की बात है कि दोनों भाइयों की अब नींद खुल गई है। अमित भाई और नरेंद्र भाई ! पिछले चार साल में भाजपा अपने नाम के मुताबिक भाई—भाई जपो पार्टी बन गई है। यदि गुजरात में बल नहीं निकलते, कर्नाटक में सरकार बन जाती, उप्र और राजस्थान में पटकनी नहीं खाई होती तो अब भी 56 इंच का सीना फुला—फुलाकर भाई लोग उसे 100 इंच का कर लेते। लेकिन अब अकल आ गई है। अब अमित भाई घर—घर जा रहे हैं। Continue reading

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मेडिकल की पढ़ाई अब हिंदी में

आजकल मैं इंदौर में हूं। यहां के अखबारों में छपी एक खबर ऐसी है कि जिस पर पूरे देश का ध्यान जाना चाहिए। केंद्र सरकार का भी और प्रांतीय सरकारों का भी। चिकित्सा के क्षेत्र में यह क्रांतिकारी कदम है। पिछले 50 साल से देश के नेताओं और डाॅक्टरों से मैं आग्रह कर रहा हूं कि मेडिकल की पढ़ाई आप हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में शुरु करें। ताकि उसके कई फायदे देश को एक साथ हों। एक तो पढ़ाई के आसान होने से डाॅक्टरों की संख्या बढ़ेगी। गांव-गांव तक रोगियों का इलाज हो सकेगा। Continue reading

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दुनिया में फिर से शीतयुद्ध शुरू… अबकी जाने क्या होगा अंजाम…

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले हफ्ते जब यह घोषणा की कि वे अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर जाॅन बोल्टन को लाएंगे और माइक पोंपियो को विदेश मंत्री बनाएंगे, तभी मैंने लिखा था कि इन दोनों अतिवादियों के कारण अब नए शीतयुद्ध के चल पड़ने की पूरी संभावना है। इस कथन के चरितार्थ होने में एक सप्ताह भी नहीं लगा। अब ट्रंप ने 60 रुसी राजनयिकों को निकाल बाहर करने की घोषणा कर दी है।

अमेरिका अब सिएटल में चल रहे रुसी वाणिज्य दूतावास को बंद कर देगा और वाशिंगटन व न्यूयार्क में कार्यरत राजनयिकों को यह कहकर निकाल रहा है कि वे जासूस हैं। अमेरिका के नक्शे-कदम पर चलते हुए 21 राष्ट्रों ने अब तक लगभग सवा सौ से ज्यादा रुसी राजनयिकों को अपने-अपने देश से निकालने की घोषणा कर दी है। इन देशों में जर्मनी, फ्रांस, डेनमार्क, इटली जैसे यूरोपीय संघ के देश तो हैं ही, कनाडा और उक्रेन जैसे राष्ट्र भी शामिल है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इतिहास में इस तरह की यह पहली घटना है। किसी एक राष्ट्र का इतने राष्ट्रों ने एक साथ बहिष्कार कभी नहीं किया।

यह कूटनीतिक बहिष्कार इसलिए हो रहा है कि 4 मार्च को ब्रिटेन में रुस के पुराने जासूस कर्नल स्क्रिपाल और उसकी बेटी यूलिया की हत्या की कोशिश हुई। वे दोनों अभी अस्पताल में अचेत पड़े हुए हैं। इस हत्या के प्रयत्न के लिए ब्रिटेन ने रुस पर आरोप लगाया है। रुस ने अपने इस पुराने जासूस की हत्या इस संदेह के कारण करनी चाही होगी कि यह व्यक्ति आजकल ब्रिटेन के लिए रुस के विरुद्ध फिर जासूसी करने लगा था। इस दोहरे जासूस को रुस में 2005 में 13 साल की सजा हुई थी लेकिन 2010 में इसे माफ कर दिया गया था। तब से यह ब्रिटेन के शहर सेलिसबरी में रह रहा था। रुस ने ब्रिटिश आरोप का खंडन किया है और कहा है कि अभी तो इस मामले की जांच भी पूरी नहीं हुई है और रुस को बदनाम करना शुरु कर दिया गया है।

यह सबको पता है कि ब्रिटेन की यूरोपीय राष्ट्रों के साथ आजकल काफी खटपट चल रही है और ट्रंप और इन राष्ट्रों के बीच भी खटास पैदा हो गई है लेकिन मजा देखिए कि रुस के विरुद्ध ये सब देश एक हो गए हैं। जहां तक रुसी कूटनीतिज्ञों के जासूस होने का सवाल है, दुनिया का कौनसा देश ऐसा है, जिसके दूतावास में जासूस नहीं होते ? किसी एक दोहरे जासूस की हत्या कोई इतनी बड़ी घटना नहीं है कि दर्जनों देश मिलकर किसी देश के विरुद्ध कूटनीतिक-युद्ध ही छेड़ दें। रुस के विरुद्ध ट्रंप का अभियान तो इसलिए छिड़ा हो सकता है कि वे अपने आप को पूतिन की काली छाया में से निकालना चाहते हों और रुस के विरुद्ध सीरिया, एराक, ईरान, उ. कोरिया और दक्षिण एशिया में भी अपनी नई टीम को लेकर आक्रामक होना चाहते हों। घर में चौपट हो रही उनकी छवि के यह मुद्रा शायद कुछ टेका लगा दे।

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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केजरीवाल ने माफी मांगने का जो रास्ता ढूंढा है, मेरी राय में वह सर्वश्रेष्ठ है : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पहले विक्रमसिंह मजीठिया और अब नितिन गडकरी से माफी मांगकर भारत की राजनीति में एक नई धारा प्रवाहित की है। यह असंभव नहीं कि वे केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली और अन्य लोगों से भी माफी मांग लें। अरविंद पर मानहानि के लगभग 20 मुकदमे चल रहे हैं। अरविंद ने मजीठिया पर आरोप लगाया था कि वे पंजाब की पिछली सरकार में मंत्री रहते हुए भी ड्रग माफिया के सरगना हैं।

गडकरी का नाम उन्होंने देश के सबसे भ्रष्ट नेताओं की सूची में रख दिया था। इसी प्रकार अरुण जेटली पर भी उन्होंने संगीन आरोप लगा दिए थे। इस तरह के आरोप चुनावी माहौल में नेता लोग एक-दूसरे पर लगाते रहते हैं लेकिन जनता पर उनका ज्यादा असर नहीं होता। चुनावों के खत्म होते ही लोग नेताओं की इस कीचड़-उछाल राजनीति को भूल जाते हैं लेकिन अरविंद केजरीवाल पर चल रहे करोड़ों रु. के मानहानि मुकदमों ने उन्हें तंग कर रखा है।

उन्हें रोज़ घंटों अपने वकीलों के साथ मगजपच्ची करनी पड़ती है, अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं और सजा की तलवार भी सिर पर लटकी रहती है। ऐसे में मुख्यमंत्री के दायित्व का निर्वाह करना कठिन हो जाता है। इसके अलावा निराधार आरोपों के कारण उन नेताओं की छवि भी खराब होने की संभावनाएं हमेशा बनी रहती हैं। ऐसी स्थिति से उबरने का जो रास्ता केजरीवाल ने ढूंढा है, वह मेरी राय में सर्वश्रेष्ठ है। ऐसा रास्ता यदि सिर्फ डर के मारे अपनाया गया एक पैंतरा भर है तो यह निश्चित जानिए कि अरविंद की इज्जत पैंदे में बैठ जाएंगी।

यह पैंतरा इस धारणा पर मुहर लगाएगा कि केजरीवाल से ज्यादा झूठा कोई राजनेता देश में नहीं है लेकिन यदि यह सच्चा हृदय-परिवर्तन है और माफी मांगने का फैसला यदि हार्दिक प्रायश्चित के तौर पर किया गया है तो यह सचमुच स्वागत योग्य है। यदि ऐसा है तो भविष्य में हम किसी के  भी विरुद्ध कोई निराधार आरोप अरविंद केजरीवाल के मुंह से नहीं सुनेंगे। केजरीवाल के इस कदम का विरोध उनकी आप पार्टी की पंजाब शाखा में जमकर हुआ है लेकिन वह अब ठंडा पड़ रहा है। इस फैसले की आध्यात्मिक गहराई को शायद पंजाब के ‘आप’ विधायक अब समझ रहे हैं। यह फैसला देश के सभी राजनेताओं के लिए प्रेरणा और अनुकरण का स्त्रोत बनेगा।

लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक देश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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सुंजवां सैनिक अड्डे पर हमला मोदी सरकार के मुंह पर करारे तमाचे हैं : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

इस आतंकी हमले का अर्थ क्या है? जम्मू के सुंजवां सैनिक अड्डे पर आतंकवादियों ने फिर हमला कर दिया। 5 भारतीय जवान शहीद हो गए और अन्य पांच-छह लोग घायल हो गए। यह हमला पाकिस्तान के आतंकवादियों ने ही किया है, ऐसा जम्मू-कश्मीर पुलिस के महानिदेशक का दावा है। यह हमला अफजल गुरु और मकबूल बट को हुई फांसी के दिन किया गया है। इसी अड्डे पर 2003 में भी हमला हो चुका है। तब 12 जवान मारे गए थे।

इसी तरह के हमले पठानकोट, उड़ी और नगरोटा के सैनिक अड्डों पर 2016 में हुए थे। सुंजवां के हमले की आशंका हमारे गुप्तचर विभाग ने फौज को पहले से बता रखी थी और पश्चिमी कमांड के ले.ज. सुरेंद्र सिंह 8-9 फरवरी को इस इलाके का मुआइना करने भी गए थे। इस तरह के हमलों का बार-बार होना क्या इस बात का प्रमाण नहीं है कि हमारा बंदोबस्त बिल्कुल लचर-पचर है।

हमलावरों ने सुंजवां में भी वही तौर-तरीके अपनाए, जो उन्होंने पिछले हमलों में अपनाए थे। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे लोग पिछली घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखते। इसके अलावा हमारी सरकार के मुंह पर ये हमले करारे तमाचे हैं। हमारे प्रधानमंत्री देश को यह कहकर भरमाते रहे कि हमने पाकिस्तान की सीमा में जाकर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की है लेकिन यदि वह की होती तो पिछले एक साल में क्या 406 बार हमारी सीमा का उल्लंघन होता? वह सर्जिकल नहीं फर्जीकल स्ट्राइक थी, यह सिद्ध होता है, हमारे सैनिक अड्डों पर होनेवाले हमलों से!

सरकार का यह दावा भी हास्यास्पद सिद्ध हो रहा है कि आतंकवाद और बातचीत, साथ-साथ नहीं चल सकते। दोनों चल रहे हैं और आराम से चल रहे हैं। हमारे सैनिक अड्डों पर होनेवाले हमले कश्मीर में भारत-विरोधियों की हौसला-आफजाई करते हैं। वे विधानसभा में बैठकर भारत-विरोधी नारे लगाते हैं। हमारे सरकारी नेता सिर्फ बयानबाजी करके खुश हो लेते हैं।

लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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रामलला तक पहुंचने पर जो दृश्य देखा, वह हृदय विदारक था

आज लगभग 40 साल बाद मैं फिर से अयोध्या की राम जन्मभूमि पर गया जहां रामलला विराजमान हैं, उस जगह तक पहुंचने में लगभग आधा घंटा पैदल चलना पड़ा। जब पहली बार यहां आया था तो शायद पांच मिनिट भी नहीं चलना पड़ा था। पैदल चलना मेरे लिए आनंद की बात है लेकिन रामलला तक पहुंचने पर जो दृश्य मैंने देखा, वह हृदय-विदारक था। लोहे के पाइपों से घिरा रास्ता ऐसा लग रहा था, जैसे हम हिटलर के किसी यातना-शिविर में से गुजर रहे हैं। ऐसे कई शिविर मैंने यूरोपीय देशों में देखे हैं लेकिन यह दृश्य तो उससे भी भयंकर था।

सुरक्षाकर्मियों ने कलम, घड़ी, बटुआ वगैरह भी नाके पर रखवा लिया। ऐसी सुरक्षा तो मैंने कभी रुस के क्रेमलिन, अमेरिका के व्हाइट हाउस और भारत के राष्ट्रपति भवन में भी नहीं देखी। अनेक सम्राटों और बादशाहों से मिलते हुए भी मुझे अपनी घड़ी और पेन निकालकर जमा नहीं कराने पड़े। बड़ी बेइज्जती महसूस हो रही थी लेकिन क्या करते ? वैसे मैं मूर्तिपूजक भी नहीं हूं लेकिन मेरे साथ देश के जाने-माने 30 लोग थे, जिनमें नालंदा वि.वि. के कुलपति और विख्यात वैज्ञानिक डाॅ. विजय भाटकर, एमआईटी पुणे के डाॅ. वि.ना. कराड़, स्वनामधन्य पूर्व मंत्री आरिफ खान, डाॅ. शहाबुदीन पठान आदि भी थे।

लोहे के पाइपों से घिरे इस रास्ते के चारों तरफ गंदगी फैली हुई थी और भूखे बंदर प्रसाद की बाट जोह रहे थे। उसके बाद हम लोग उस स्थाान पर गए जहां राम मंदिर के लिए शिलाएं तराशी जा रही थीं और राम मंदिर के लिए देश भर से ईंटे इकट्ठी की गई थी। बड़ी-बड़ी शिलाओं पर कारीगरी तो मनोहारी थी लेकिन लाल शिलाएं अजीब-सी लग रही थीं। उस मंदिर में तो दुनिया की सर्वश्रेष्ठ शिलाएं लगानी चाहिए। फिर हम सब गए सरयू के किनारे। बहती हुई मनोरम सरिता को देखकर याद आया कि राम ने यही प्राण त्यागे थे।

यह यात्रा अविस्मरणीय रही, क्योंकि यहां की 70 एकड़ भूमि में हम विश्व-तीर्थ बना हुआ देखना चाहते हैं, चाहे राम जन्म-स्थल पर तो मंदिर ही बने लेकिन शेष 60-65 एकड़ में दुनिया के कम से कम दस मजहबों के पवित्र-स्थल बनें। अयोध्या विश्व की आध्यात्मिक राजधानी बन जाए। यहां करोड़ों लोग हर साल धार्मिक पर्यटन के लिए आएं। उसके साथ-साथ यहां एक ऐसा विश्वविद्यालय भी कायम हो, जिसकी पढ़ाई में अध्यात्म और विज्ञान का संगम हो। अयोध्या अपने नाम को सार्थक करे। युद्ध की वृत्ति का निषेध करे। सारा विवाद खत्म हो। मामला अदालत के बाहर सुलझे। जब जीतें, कोई न हारे।

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक देश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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खोजोगे तो ऐसे भ्रष्ट जज हजार मिलेंगे

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ शाखा ने कमाल कर दिया। उसने एक जज को मुअत्तिल कर दिया। सरकारी नौकरों की मुअत्तिली की बात तो हम अक्सर सुनते ही रहते हैं लेकिन कोई जज मुअत्तिल कर दिया जाए, ऐसी बात पहली बार सुनने में आई है। इस जज को न तो शराब पीकर अदालत में बैठने के लिए मुअत्तिल किया गया है, न रिश्वत लेने के लिए और न ही कोई उटपटांग व्यवहार करने के लिए!

ओ.पी. मिश्रा नामक इस जज को इसलिए मुअत्तिल किया गया है कि उसने उप्र के एक पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति को जमानत पर छोड़ दिया था। प्रजापति आजकल जेल में है। उस पर कई अपराधिक मुकदमे तो चल ही रहे हैं लेकिन जज मिश्रा ने उसे बलात्कार के एक बहुत चर्चित मामले में जमानत दे दी थी। अमेठी से विधायक रहे इस प्रजापति पर आरोप है कि उसने और उसके दो साथियों ने एक औरत के साथ बलात्कार किया और बेटी के साथ भी जोर-जबर्दस्ती की।

यह मामला उस अदालत में चल रहा था, जिसका काम बच्चों को यौन-अपराधों से बचाना है। प्रजापति ने हलफनामा दायर करके कहा था कि उसके खिलाफ कोई भी अपराधिक मामला नहीं चल रहा, इसलिए उसे जमानत दी जाए। जज मिश्रा ने इस झूठे दावे को स्वीकार कर लिया और सारे मामलों से आंख मींचकर प्रजापति को जमानत दे दी। उस जमानत को उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया और प्रजापति अभी भी जेल में है लेकिन जज मिश्रा को मुअत्तिल करके उसने एक मिसाल कायम कर दी है।

सारे मामले की अब जांच होगी कि मिश्रा ने प्रजापति को जमानत किस आधार पर दी है। कोई आश्चर्य नहीं कि इस मामले में जबर्दस्त रिश्वतखोरी हुई हो या कोई अवांछित राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ हो। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच बधाई की पात्र है कि उसने तत्काल सख्त कदम उठाया। जज मिश्रा सेवानिवृत्त होने वाले ही थे कि उन्हें यह दिन देखना पड़ा। किसी भी ईमानदार जज के लिए उसके जीवन में इससे बड़ा कलंकित दिन क्या होगा कि उसे जिस दिन सेवा-निवृत्त होना हो, उसे उसी दिन मुअत्तिली का आदेश मिल जाए।

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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केजरीवाल के इस काम ने वरिष्ठ पत्रकार डा. वेद प्रताप वैदिक का दिल खुश कर दिया

दिल्ली की केजरीवाल सरकार के एक विज्ञापन और एक खबर ने मेरा दिल खुश कर दिया। विज्ञापन यह है कि दिल्ली के किसी भी निवासी को यदि एमआरआई, सीटी स्केन और एक्स रे जैसे दर्जनों टेस्ट करवाने हों तो वह सरकारी अस्पतालों और पोलीक्लिनिकों में जाए। यदि एक माह में उसका टेस्ट हो जाए तो ठीक वरना वह अपना टेस्ट निजी अस्पतालों में भी करवा सकता है। वह मुफ्त होगा, जैसा कि सरकारी अस्पतालों में होता है।

आप जानते ही हैं कि देश के सरकारी अस्पतालों की हालत क्या है? वहां अफसरों और नेताओं के इलाज पर तो जरुरत से ज्यादा ध्यान दिया जाता है लेकिन आम आदमियों को भेड़-बकरी समझकर गलियारों में पटक दिया जाता है। यही हाल टेस्टों का है। पहली बात तो यह कि टेस्टों की लाइन इतनी लंबी होती है कि महिनों इंतजार करना पड़ता है और कभी-कभी इंतजार की इस अवधि के दौरान मरीज दूसरे संसार में चला जाता है।

दूसरी बात यह कि टेस्ट हमेशा ठीक ही हों, यह भी जरुरी नहीं। जो मरीज इन अस्पतालों में जाते हैं, वे कौन होते हैं? वे, जिनकी जेब खाली होती है, ग्रामीण, गरीब, पिछड़े, दलित और अल्पशिक्षित लोग! सारी चिकित्सा अंग्रेजी भाषा में होती है, जादू-टोने की तरह। दिल्ली सरकार को सबसे पहले तो इन सरकारी अस्पतालों को सुधारना चाहिए और उसने अब ये जो असाधारण सुविधा की घोषणा की है, उसे ठीक से लागू करना अपने आप में बड़ी जिम्मेदारी है। इसमें भ्रष्टाचार की काफी गुंजाइश है।

अरविंद और मनीष, दोनों ही मेरे प्रिय साथी हैं। मैं दोनों से कहता हूं कि वे दिल्ली प्रशासन के सभी कर्मचारियों और विधायकों के लिए यह अनिवार्य क्यों नहीं कर देते कि उनका और उनके परिजनों का इलाज सरकारी अस्पतालों में ही हो। इन अस्पतालों का स्तर रातों-रात सुधर जाएगा। यदि केजरीवाल सरकार की उक्त योजना सफल हो गई तो ‘आप’ पार्टी का दिल्ली से बाहर फैलना बहुत आसान हो जाएगा लेकिन ध्यान रहे इलाज की यह सुविधा मोदी की नोटबंदी और स्किल इंडिया की तरह फेल न हो जाए। वह सिर्फ विज्ञापन और भाषण का विषय बनकर न रह जाए।

दिल्ली सरकार को हर माह आंकड़े जारी करके बताना चाहिए कि उसकी इस नई योजना से कितने लोगों को लाभ मिल रहा है। इस बीच मप्र सरकार ने गरीबों के लिए पांच रु. में और दिल्ली सरकार ने सरकारी स्कूल के बच्चों को नौ रुपए में भोजन देने की जो घोषणा की है, वह भी सराहनीय कदम है। मुझे विश्वास है कि केंद्र की सरकार इन दोनों सरकारों से कुछ प्रेरणा लेगी।

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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एक महान राष्ट्रवादी अंग्रेजी अखबार ने ये कैसा शीर्षक दिया!

दुनिया में सबसे ज्यादा शाकाहारी किस देश में रहते हैं? जाहिर है कि भारत में रहते हैं। दुनिया का कोई देश ऐसा नहीं हैं, जिसके लाखों-करोड़ों नागरिकों ने अपने जीवन में मांस, मछली, अंडा जैसी कोई चीज़ कभी खाई ही नहीं। दुनिया का ऐसा कौन सा देश है, जिसमें इन पदार्थों को ‘अखाद्य’ (न खाने योग्य) माना गया है? भारत के अलावा कोई भी नहीं।

मैं दुनिया के लगभग 80 देशों की यात्रा पिछले 50 साल में कर चुका हूं। कई देशों में तो लोगों को यह समझाने में बड़ी मुश्किल हो जाती थी कि मैंने कभी मांस, मछली, अंडा खाया ही नहीं। वे पूछते रह जाते कि यदि यह सच है तो आप इतने तगड़े और स्वस्थ कैसे हैं? चीन, जापान और कोरिया जैसे देशों में भाषा की अनभिज्ञता के कारण मुझे भूखे ही रह जाना पड़ता था। मेरा वजन घट जाता था।

लेकिन देखिए, अब कैसा मजाक हो रहा है। एक महान राष्ट्रवादी अंग्रेजी अखबार ने आज शीर्षक दिया है कि ‘भारतीय लोग बेहतर खाने लगे हैं, मांस और अंडों की खपत बढ़ गई।’ वाह क्या खूब? क्या मांस और अंडे बेहतर भोजन है? क्या यह गर्व की बात है?

आज ही अखबारों में एक विदेशी विश्वविद्यालय की खोजी रपट छपी है, जिसमें पाया गया है कि शाकाहारियों का जीवन लंबा होता है और मांसाहारियों के मुकाबले उन्हें बीमारियां कम होती हैं। यह तो शाकाहार का व्यावहारिक भौतिक पक्ष है लेकिन इसका नैतिक और अध्यात्मिक पक्ष इससे भी अधिक प्रबल है। बिना किसी जीव की हिंसा किए बिना मांस प्राप्त नहीं किया जा सकता। अपना पेट भरने के लिए किसी अन्य प्राणी के प्राण क्यों लिए जाएं?

कौन से धर्मग्रंथ में लिखा है कि यदि आप मांस नहीं खाएंगे तो आप घटिया हिंदू, घटिया मुसलमान, घटिया ईसाई या घटिया सिख माने जाएंगे? जहां तक बलि देने का प्रश्न है यदि अपने बेटे की जगह हजरत इब्राहीम एक भेड़ को रख सकते हैं तो भेड़ या बकरे या भैंसे की जगह आप एक कद्दू या एक नारियल को क्यों नहीं रख सकते? महर्षि दयानंद सरस्वती ने अब से लगभग डेढ़ सौ साल पहले अपनी पुस्तक ‘गोकरुणानिधि’ में आंकड़ों और तर्कों के आधार पर सिद्ध किया था कि अपने पशुओं को जिंदा रखकर आप ज्यादा खाद्यान्न जुटा सकते हैं और उन्हें मार डालने की बजाय जिंदा रखना आर्थिक दृष्टि से भी बहुत लाभदायक होता है।

मैं तो वह दिन देखना चाहता हूं कि भारत में किसी मांसाहारी को ढूंढना ही मुश्किल हो जाए। सभी जातियों और सभी मजहबों के लोग शाकाहारी बन जाएं। यह काम कानून से नहीं हो सकता है। यह समझाने से, संस्कार डालने से, प्रेम से हो सकता है। क्या मेरे-जैसे लोग कानून के डर से मांस नहीं खाते?

डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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सिर्फ मायावती ही क्यों? सरकार में दम हो तो सभी पार्टियों के बैंक खाते चेक करवाए

डा. वेद प्रताप वैदिक
दिल्ली की एक बैंक में मायावती की बसपा का एक खाता पकड़ा गया है, जिसमें नोटबंदी की घोषणा के दो दिन बाद ही 104 करोड़ रु. जमा हुए। अब इस खाते की जांच होगी। क्या खाक जांच होगी? बसपा ही क्यों, सभी पार्टियां बिल्कुल स्वच्छंद हैं, अरबों-खरबों रु. अपने पास नकद या बैंकों में रखने के लिए! हमारी राजनीतिक पार्टियां भ्रष्टाचार की अम्मा हैं। आप अकेली मायावती को कैसे पकड़ेंगे? वह दिखा देंगी, कई हजार दानदाताओं के नकली नाम, जिन्होंने 20 हजार रु. से कम का चंदा दिया है।

चुनाव आयोग ने 20 हजार से कम चंदे को बेनामी होने की छूट दी है। इस बेनामी छूट का फायदा उठाकर भाजपा और कांग्रेस ने अपने हजारों करोड़ रू के काले धन को सफेद कर लिया है। इस चोर दरवाजे में कौनसी पार्टी है,जो अपनी दुम दबाकर नहीं निकली है? यहां तक कि भारत की दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां, यह दावा नहीं कर सकतीं कि उनके हाथ मैले नहीं हैं। मायावती के पास सिर्फ 104 करोड़ निकले, यह अपने आप में बड़ी उलट-खबर है।

उत्तर प्रदेश में चार सौ विधायक सिर्फ 100 करोड़ याने क्या सिर्फ 25-25 लाख रु. में चुनाव लड़ लेंगे? यदि एक-एक विधायक बहुत कंजूसी करे तो भी उसे 3 से 5 करोड़ रु. चाहिए। याने मायावती के पास 2000 करोड़ तो होने ही चाहिए तो अब कल्पना कीजिए कि भाजपा, सपा और कांग्रेस के पास कितने-कितने हजार करोड़ रु. होंगे?

यदि सरकार में दम हो तो इन सभी पार्टियों के बैंक खाते वह क्यों नहीं चेक करवाती है? सिर्फ मायावती का ही क्यों? अभी तो दिल्ली का (वह भी एक ही खाता) चेक हुआ है। जरा लखनऊ के खाते चेक करवा कर देखे जाएं। पार्टियों के ही नहीं, सभी नेताओं और उनके पिछलग्गुओं व नौकर-चाकरों के भी खाते चेक करवाकर देखे जाएं। इस देश के गरीब और भोले लोगों की आंखे फटी की फटी रह जाएंगी।

आज खबर है कि अरुणाचल के दो बैंक मेनेजरों ने आत्महत्या कर ली है, क्योंकि नेताओं और सेठों ने उन पर दबाव डाल कर उनके बैकों में करोड़ों का काला धन बेनामी ढंग से जमा करवा दिया था। अभी तक तो भ्रष्टाचार के पूज्य पिताजी याने हमारे किसी नेता की आत्महत्या की खबर तो हमने नहीं पढ़ी है। यदि नरेंद्र मोदी और भाजपा अपने सारे चंदे को उजागर करने का सत्साहस कर सकें तो वे भारत के इतिहास में सार्वजनिक नैतिकता का नया अध्याय लिखेंगे।

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में आधे से ज्यादा भारत में नहीं रहना चाहते!

‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में छपे एक सर्वेक्षण ने आज मुझे जरा चौंका दिया। इसके अनुसार देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में आधे से भी ज्यादा भारत में नहीं रहना चाहते। वे भारत को अपनी अटल मातृभूमि नहीं मानते। उन्हें मौका मिले तो वे किसी अन्य देश में जाकर हमेशा के लिए बसना चाहेंगे। उन नौजवानों में से 75 प्रतिशत का कहना है कि वे किसी तरह भारत में रह रहे हैं। 62.8 प्रतिशत युवतियों और 66.1 प्रतिशत युवकों का मानना है कि इस देश में निकट भविष्य में अच्छे दिन आने की संभावना कम ही है। उनमें से 50 प्रतिशत का कहना है कि भारत की दशा सुधारने के लिए किसी ‘महापुरुष’ का अवतरण होना चाहिए। उनमें से लगभग 40 प्रतिशत ने कहा कि यदि उन्हें पांच साल के लिए प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो वे देश की दशा सुधार सकते हैं।

जाहिर है कि यह उनके आत्म-विश्वास की अति है। जिन लोगों को राजनीति करते-करते 30-40 साल हो गए और जिन्हें मुख्यमंत्री बने रहने का अनुभव भी है, ऐसे लोग भी प्रधानमंत्री बनने पर बुद्धु सिद्ध हुए और अपने होश-हवास खो बैठे तो ये 18 से 26 साल के नौजवान कौन सा तीर मार लेंगे? उनके इस दावे को तो हम कोरे उत्साह के खाने में डालकर छोड़ दे सकते हैं लेकिन इस काम के लिए किसी ‘महापुरुष’ की प्रतीक्षा का क्या मतलब है? क्या वे कोई तानाशाह चाहते हैं या कोई मुहम्मद तुगलक चाहते हैं या कोई हिटलर, मुसोलिनी और स्तालिन चाहते हैं? क्या वे स्तालिन के रुस और माओ के चीन की तरह भारत में डंडे का राज चाहते हैं?

यदि हां तो मानना पड़ेगा कि उन्होंने लोकतंत्र को रद्द कर दिया है। यह रवैया निराशा और बौद्धिक गरीबी का सूचक है। यदि जनता जागरुक हो तो जैसा डा. लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं। यदि देश की व्यवस्था सड़ी-गली दिख रही है तो जैसे तवे पर रोटी उल्टी-पल्टी जाती है, वैसे ही सरकारों को बदल डालना क्यों नहीं चाहिए?

भारत छोड़कर विदेशों में बस जाने की बात बेहद गंभीर है। यह हमारे युवकों में छा रहे पलायनवाद और घोर स्वार्थीपन का प्रमाण है। यह हमारी सरकारों की नकल की प्रवृत्ति का भी तार्किक परिणाम है। हमारे नेता, जो कि नौकरशाहों के नौकर हैं, पश्चिमी राष्ट्रों की नकल करते हैं। वे उनकी मानसिक गुलामी के शिकार हैं। हमारी युवा-पीढ़ी में दम हो तो वे देश के नेताओं को खदेड़ें, देश के हालात सुधारें और इस महान देश को अपने लिए ही नहीं, सारे संसार के युवकों के लिए आकर्षक बना दें।

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क dr.vaidik@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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मोदी ने पहाड़ खोद डाला लेकिन चुहिया भी नहीं निकाल सके : वैदिक

नोटबंदी के बाद अब नगदबंदी… हमारी सरकार की नाव नोटबंदी के भंवर में फंसती ही चली जा रही है। ऐसा लग रहा है कि आजकल उसके पास कोई काम ही नहीं है, सिवाय इसके कि वह नए नोटों के लिए रोज़ मार खाती रहे, नए और पुराने नोटों के जखीरों को पकड़ती रहे, भ्रष्टाचारी बैंकरों पर जांच और मुकदमे चलाए, 40 करोड़ बैंक खातों की जांच करवाए और जन-धन खाताधारियों को नई नैतिकता सिखाए। अब जबकि सारा काला धन सफेद हो चुका है और जितना आयकर पहले मिलता था, उसके भी घटने की आशंका हो रही है तो हमारी सरकार अपनी आंखें रगड़ रही है, हाथ मल रही है और अपने बाल नोंच रही है। उसे समझ नहीं पड़ रहा है कि अब वह कौन सी बंडी बदले और कौनसा बंडल मारे? डूबती नाव को तिनके का सहारा ! अब वह नगदबंदी के तिनके को पकड़कर लटक रही है।

नगदबंदी का दूर-दूर तक कोई जिक्र तक नहीं था, 8 नवंबर की महान घोषणा के वक्त ! हमारे प्रचारमंत्री को क्या पता था कि नोटबंदी इस बुरी तरह फेल हो जाएगी। अब वे कालाधन भूल गए। किसी ने उन्हें नगबंदी की पुड़िया पकड़ा दी। अब वे नगदबंदी का चूरण सबको बांट रहे हैं। बदहजमी का यह चूरण वे उनको भी खिला रहे हैं, जो भूखे पेट सोते हैं। उन्हें यह पता ही नहीं कि दुनिया के अत्यंत सुशिक्षित और समृद्ध देशों में भी नगदबंदी नहीं है। वहां भी नगद का व्यवहार खूब होता है और यांत्रिक लेन-देन के बावजूद भारत से कई गुना भ्रष्टाचार वहां व्याप्त है।

जरा बताएं कि अभी वेस्टलैंड हेलिकाप्टरों में 300 करोड़ की रिश्वत या बोफर्स में 62 करोड़ की रिश्वत क्या नगद में ली गई थी? यह नोटबंदी और नगदबंदी हमारे बैंकों और आयकर विभाग को भ्रष्टाचार के सबसे बड़े गढ़ बना देगी। 25 करोड़ जन-धन खातेधारी याने उनके 100 करोड़ परिजन (एक घर में चार सदस्य), सभी पर भ्रष्ट होने की तोहमत है याने भ्रष्टाचार ही राष्ट्रीय शिष्टाचार बन गया है। कालेधन और भ्रष्टाचार का इलाज न नोटबंदी से होगा, न नगदबंदी से। ये दोनों दांव उल्टे पड़ गए हैं। नोटबंदी ने कालाधन बढ़ा दिया है और नगदबंदी के चलते आम आदमी की जिंदगी दूभर हो रही है। आपने पहाड़ खोद डाला लेकिन उसमें से आप चुहिया भी नहीं निकाल सके।

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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किसी देश का प्रधानमंत्री इतना असहाय-निरुपाय नहीं हो सकता : वेद प्रताप वैदिक

मुरादाबाद की अपनी सभा में नरेंद्र मोदी फिर बरसे। अपने विरोधियों पर बरसे। लेकिन मोदी की भी क्या गजब की अदा है? जहां विरोधी उनके सामने बैठे होते हैं याने संसद, वहां तो वे मौनी बाबा बने रहते हैं और अपने समर्थकों की सभा में वे दहाड़ते रहते हैं। वे कहते हैं कि लोग उन्हें गुनाहगार क्यों कहते हैं? मोदी को गुनाहगार कौन कह रहा है? मैंने अपने परसों के लेख में यही लिखा था कि यह नोटबंदी एक गुनाह बेलज्जत सिद्ध हो रही है। याने इसका कोई ठोस लाभ न अभी दिख रहा है और न ही भविष्य में। हां, आम लोग बेहद परेशान हैं। वे लोग, जिनके पास काला धन तो क्या, सफेद धन ही इतना होता है कि वे रोज़ कुआ खोदते हैं और रोज पानी पीते हैं। नोटबंदी के पीछे मोदी की मन्शा पर किसी को भी शक नहीं करना चाहिए। यह देशभक्तिपूर्ण कार्य हो सकता था। इससे देश का बड़ा कल्याण हो सकता था लेकिन इसे बिने सोचे-विचारे लागू कर दिया गया।

यह अमृत अब जहर बनता जा रहा है। यह काले धन का दुगुना बड़ा स्त्रोत बन गया है। विरोधियों ने इसका फायदा उठाने की जी-तोड़ कोशिश की है। वे मोदी की मन्शा पर शक कर रहे हैं। वे नोटबंदी का उद्देश्य यह बता रह हैं कि बैंकों में जमा होने वाले अरबों-खरबों रुपए को मोदी सरकार बड़े-बड़े पूंजीपतियों को बहुत कम ब्याज पर हथियाने देगी। इस तरह के आरोप निराधार हैं लेकिन यह तो सत्य है कि नोटबंदी ने देश में अपूर्व भ्रष्टाचार को जन्म दिया है। करोड़ों साधारण लोगों ने जन-धन के नाम पर अपने हाथ काले कर लिये हैं। हमारे बैंक रिश्वत और भ्रष्टाचार के अड्डे बन गए हैं।

अब मोदीजी को एक नई तरकीब सूझी है। वे जन-धन खाते वालों से कह रहे हैं कि जिन्होंने उनके नाम से अपना पैसा इन खातों में जमा किया है, उसे वे न लौटाएं ! किसी देश का प्रधानमंत्री क्या इतना असहाय-निरुपाय भी हो सकता है कि लोगों में अनैतिकता फैलाए, उनकी भरोसेमंदी खत्म कर दे और समाज में मरने-मारने का माहौल फैला दे? यदि सरकार है और उसमें दमखम है तो जन-धन खातों में जो मोटी राशियां 8 नवंबर के बाद जमा हुई हैं, उन्हें जब्त कर ले। सिर्फ उन्हें बख्श दे, जो बता सकें कि उसका भरोसे लायक स्त्रोत क्या है। जिनका काला धन जब्त हो, उन पर जुर्माना और सजा दोनों हो। सरकार रोने-गाने से नहीं, कसीदे और दोहे से नहीं, लोहे से चलती है।

पिछले 25 दिन में बैंकों में लगभग 12 लाख करोड़ रु. जमा हो चुके हैं। सरकार के मुताबिक बाजार में 14.50 लाख करोड़ के 500 और 1000 के नोट चलन में थे। (सरकारों व एजेंसियों में रखी नकदी सहित) इसका मतलब यह हुआ कि अब बहुत कम बड़े नोट ही बचे हुए हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि बाकि के नोट भी एकाध हफ्ते में बैंकों में आ जाएंगे। याने जितना भी बड़े नोटों वाला नकद पैसा (सफेद और काला भी) बाजारों और घरों में था, वह बैंकों में आ जाएगा। यह सरकार की जबर्दस्त सफलता है। इतने कम समय में इतना पैसा सरकार ने करोड़ों लोगों से उगलवा लिया लेकिन सरकार के पास असली सवाल का जवाब क्या है? गरीब कल्याण कोष में कितना पैसा आएगा?

असली सवाल यह है कि सरकार के खजाने में टैक्स कितना आएगा? खुद सरकार ही नहीं बता सकती, क्योंकि लाइन में लग-लग कर लोगों ने जो ढाई-ढाई लाख रु. जमा करवाए हैं, उन पर आप कोई आयकर नहीं थोप सकते। जिन लोगों ने करोड़ों रु. नकद देकर अपने खातों में उसे कर्ज दिखवा लिया है, उस पर भी आयकर नहीं लगता। जिन लोगों ने अपने नोट ट्रकों और कारों में भरकर नागालैंड, अरुणाचल और मणिपुर जैसे सीमांत क्षेत्रों के बैंकों में स्थानीय नामों से जमा करवा दिए हैं, वे भी करमुक्त हैं। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश तथा अन्य पड़ौसी राष्ट्रों में भारतीय मुद्रा धड़ल्ले से चलती है।

इन राष्ट्रों से आनेवाले करोड़ों-अरबों के पुराने नोट सरकार को लेने पड़ेंगे। इन पर भी टैक्स नहीं लगाया जा सकता। नक्सलियों, नेताओं, तस्करों और अफसरों ने अपना सारा छिपा धन सफेद कर लिया है और ऐसी तरकीब से कर लिया है कि वह टैक्स की गिरफ्त के बाहर रहे। खेती तो करमुक्त है ही। मोदी सरकार ने लाखों किसानों को रातोंरात लखपति बना दिया है। अमित शाह का जुमला सच साबित हो गया है। बैंकों में जमा यह कालाधन जब बाहर निकलेगा तो उसका रंग सफेद होगा।

इन्हीं नए नोटों से रिश्वतें दी जाएंगी, तस्करी की जाएगी, आतंकी दनदनाएंगे और काला धन दुगुनी रफ्तार से पैदा होगा। मोदीजी महागुरु सिद्ध हुए। उन्होंने देश के करोड़ों किसानों, मजदूरों, कर्मचारियों और छोटे व्यापारियों को भी काले धन की कला का उस्ताद बना दिया। अभी वे सिर्फ काले को सफेद करने की दलाली कर रहे हैं लेकिन जब उनके हाथों में लाखों रु. आएंगे और जाएंगे तो उन्हें मोटी कमाई का चस्का भी शायद लग जाए। अभी देश की अर्थ-व्यवस्था पैंदे में बैठती-सी लग रही है लेकिन यदि करोड़ों लोगों को यह चस्का लग गया तो देश की अर्थव्यवस्था तो कुलाचे भरने लगेगी। अर्थशास्त्र के इतिहास में इसे ‘विकास का मोदी मंत्र’ के नाम से जाना जाएगा।

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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नौसिखिया प्रधानमंत्रीजी बुरी तरह फंस गए हैं : वेद प्रताप वैदिक

नरेंद्र मोदी की नाव भंवर में हैं। 17 दिन बीत गए लेकिन कोई किनारा नहीं दीख पड़ रहा है। खुद मोदी को खतरे का अहसास हो गया है। यह नाव मझधार में ही डूब सकती है। वरना मोदी-जैसा आदमी, जो 2002 में सैकड़ों बेकसूर लोगों की हत्या होने पर भी नहीं हिला, वह सभाओं में आंसू क्यों बहाता? खुद के कुर्बान होने का डर जो है। संसद के सामने दो हफ्तों से घिग्घी क्यों बंधी हुई है? यह बताता है कि मोदी पत्थरदिल नहीं है, तानाशाह नहीं है। वह इंदिरा गांधी या हिटलर नहीं है। वह सख्त दिखने में है, बोलने में है लेकिन अंदर से काफी नरम है। क्या आपने कभी हिटलर, मुसोलिनी या इंदिरा गांधी को सार्वजनिक रुप से रोते हुए देखा है या सुना है?

इसका अर्थ यह नहीं कि मोदी पराई पीर पर पिघल रहे हैं। जिस बात ने मोदी को पिघलाया है, वह यह है कि उन्होंने इतनी जबर्दस्त पहल की थी और यह क्या हो गया? लेने के देने पड़ गए। जिन लोगों की पसीने की कमाई मारी जाएगी, क्या वे मोदी को 2017 के प्रादेशिक और 2019 के राष्ट्रीय चुनाव में माफ करेंगे? मोदी भी मजबूर हैं। खुद से मजबूर ! वे जिस सीढ़ी से ऊपर चढ़ते हैं, उसे ढहाने की कला में वे उस्ताद हैं। केशूभाई व लालकृष्ण आडवाणी मिसाल हैं। इस बार उन्होंने भाजपा और संघ की सीढ़ियों पर भी प्रहार कर दिया है। भाजपा और संघ देश के छोटे व्यापारियों के दम पर चलने वाले संगठन हैं। वे संघ और भाजपा की रीढ़ हैं। मोदी ने इस रीढ़ पर ही डंडा जमा दिया है।

मोटे पैसे वाले और विदेशी गुप्त खातेवाले तमाशा देख रहे हैं और मजे ले रहे हैं। उन्होंने रातों-रात अपने अरबों-खरबों रुपयों को सोने-चांदी, डालरों और संपत्तियों में बदल लिया है। जन-धन योजना खातों में एक सप्ताह में ही 21 हजार करोड़ रु. कहां से आ गए? काला धन दुगुनी गति से सफेद हो रहा है। मोदीजी ने आम आदमी को भी काले धन की कला में पारंगत कर दिया है। दो हजार के नोट ने बड़ी सुविधा कर दी है। करोड़ों गरीब लोग काले को सफेद करने के लिए रात-रात भर लाइन में लगे रहते हैं। अमित शाह ने 15 लाख रु. के वादे को चाहे चुनावी जुमला कहकर उड़ा दिया हो लेकिन मोदी की जादूगरी जिंदाबाद कि अब करोड़ों लोगों के खातों में लाखों रु. रातों-रात पहुंच गए हैं। सरकार घबरा गई है। मोदीजी पीछे हटना नहीं जानते लेकिन जिस अदा से वे लड़खड़ा रहे हैं, उसे देखकर लाल किले में बैठा हुआ मुहम्मद शाह रंगीला भी गश खा जाए।

रोज-रोज फरमान जारी करनेवाली यह सरकार अपनी गलती खुद ही स्वीकार कर रही है। वह आम जनता को राहत पहुंचाने के लिए बेताब दिखाई पड़ रही है। नौसिखिया प्रधानमंत्रीजी फंस गए हैं लेकिन उन्हें बचाने की कोशिश न तो उनकी पार्टी कर रही है और न ही विरोधी दल। विरोधी दल तो चाहते हैं कि उनकी नय्या जल्दी से जल्दी डूब जाए। लेकिन इस बचाने और डुबाने के खेल में कहीं भारत का भट्ठा न बैठ जाए।

इसे राष्ट्रीय संकटकाल समझकर आज जरूरत है कि मोदी की मदद की जाए। सरकार को अच्छे-अच्छे ठोस सुझाव दिए जाएं। यदि दिसंबर में भी हालात पर काबू न हो तो मोदी से कहा जाए कि हिम्मत करो और इस तुगलकी फरमान को वापस ले लो। वापसी के लिए मोदी की पीठ ठोकी जाए। उत्साह बढ़ाया जाए। उनका अपमान न किया जाए। उन्होंने नोटबंदी अच्छे इरादे से की थी लेकिन कभी-कभी तीर गलत निशाने पर भी लग जाता है। मोदी की नाव भंवर में डूब जाए, उससे कहीं अच्छा है कि उसे खींचकर किनारे पर ले आया जाए।

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक देश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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‘डॉन’ की पाक पत्रकारिता को सलाम कर रहे डा. वेद प्रताप वैदिक

-डा. वेद प्रताप वैदिक-

पाकिस्तान अपने लिए संकट पर संकट खड़े किए जा रहा है। उड़ी के आतंकी हमले के कारण सारी दुनिया में उसकी बदनामी तो पहले से ही हो रही थी, अब वहां की सरकार अपने पत्रकारों से भी भिड़ गई है। प्रसिद्ध अखबार ‘डॉन’ के संवाददाता सिरील अलमिदा पर वह बरस पड़ी है। अलमिदा का नाम ‘एग्जिट कंट्रोल लिस्ट’ में डाल दिया गया है याने वे अब विदेश-यात्रा नहीं कर सकते। उनका दोष यह है कि उन्होंने 6 अक्तूबर को ‘डॉन’ में एक लेख लिखकर सरकार और फौज की अंदरुनी बहस को उजागर कर दिया। उन्होंने बताया कि पंजाब के मुख्यमंत्री और नवाज शरीफ के भाई शाहबाज शरीफ ने अपनी फौज और आईएसआई के अधिकारियों को काफी खरी-खोटी सुना दी।

शाहबाज ने उनसे कहा कि आप लोग यदि आतंकियों की पीठ ठोकना बंद नहीं करेंगे तो पाकिस्तान सारी दुनिया में इसी तरह बदनाम होता रहेगा। यह खेद की बात है कि सरकार के लोग जब आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करते हैं तो फौज और गुप्तचर एजेंसी उन्हें बचाने का काम करती है। इस खबर के छपते ही पाकिस्तान में हंगामा मच गया। सरकार ने तीन-तीन बार इसका खंडन किया। अलमिदा पर राष्ट्र-द्रोह के आरोप लगाए गए। उन्हें गोपनीयता भंग करने के अपराध में गिरफ्तार करने की मांग की गई और अब उनके विदेश जाने पर रोक लगा दी गई है।

सरकार इतनी बौखला गई है कि प्रधानमंत्री और सेनापति को मिलना पड़ा, इस मामले पर विचार करने के लिए। लेकिन ‘डॉन’ के संपादक अड़े हुए हैं। उनका कहना है कि अलमिदा ने जो कुछ लिखा है, वह प्रमाणों के आधार पर लिखा है। सरकार भी सैद्धांतिक दृष्टि से अपनी जगह ठीक है कि राष्ट्र की सुरक्षा संबंधी सभी गोपनीय बातों को उजागर करना ठीक नहीं है लेकिन इसमें गोपनीय बात कौनसी है? क्या सारी दुनिया और पाकिस्तान की जनता को पता नहीं है कि आतंकियों की मदद कौन कर रहा है?

इसके अलावा, जो उजागर हुआ है, उससे तो पाकिस्तान की छवि कुछ न कुछ सुधरेगी ही। इससे यह भी पता चलता है कि पाक नेता वहां की फौज की कठपुतली नहीं हैं। उनमें कुछ दम-खम बचा हुआ है। दूसरी बात यह कि पाकिस्तान में भी लोकतंत्र जिंदा है। तीसरी बात यह कि अलमिदा की इस खबर से आतंकियों पर दबाव बढ़ेगा और पाकिस्तान के अच्छे दिन आएंगे। पाकिस्तान के कई बहादुर पत्रकार अलमिदा का खुलकर साथ दे रहे हैं। पाकिस्तानी पत्रकारों पर जितने जुल्म होते हैं, वे उतनी ही बहादुरी से उनका मुकाबला करते हैं। यही कहलाती है- पवित्र (पाक) पत्रकारिता!

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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मोदी की प्रचार कला ने पाक के घुटने टिका दिए हैं

सरताज अजीज के मुंह से यह सुनकर मुझे अचरज हुआ कि जब तक नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं, भारत-पाक रिश्ते नहीं सुधर सकते। अजीज का यह बयान बहुत मायने रखता है, क्योंकि वे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के विदेशी मामलों के सलाहकार हैं। वे वास्तव में विदेश मंत्री ही हैं। नवाज शरीफ के पिछले कार्यकाल में वे विदेश मंत्री ही थे। वे काफी अनुभवी, उम्रदराज और संयत व्यक्ति हैं। ऐसा बयान उन्होंने क्यों दे दिया? अपनी पिछली पाकिस्तान-यात्रा के दौरान मैंने मियां नवाज़ शरीफ, सरताज अजीज और विदेश सचिव एजाज चौधरी से यही कहा था कि यदि पाकिस्तान का बर्ताव ठीक रहा तो नरेंद्र मोदी भारत-पाक संबंधों के इतिहास में नया अध्याय जोड़ सकते हैं।

अब नरेंद्र मोदी ने ऐसा क्या कर दिया? जहां तक फौजी शल्य-क्रिया का सवाल है, इससे भी भयंकर शल्य-क्रियाएं पिछली सरकारों के दौरान हो चुकी हैं। वर्तमान शल्य-क्रिया के बारे में पाकिस्तान यह मानता है कि वह हुई ही नहीं है और पाकिस्तान सबूत देकर सारी दुनिया को यही बात समझा रहा है तो मोदी से इतने नाराज होने की जरुरत ही क्या है? मुझे लगता है कि पाकिस्तान की फौज, आईएसआई और नवाज सरकार जिस बात के कारण सबसे ज्यादा खफा और हताश है, वह फौजी शल्य-क्रिया के कारण नहीं है बल्कि सारी दुनिया में हो रही पाकिस्तान की थू-थू के कारण है।

मोदी की प्रचार कला ने पाक के घुटने टिका दिए हैं। मिया नवाज ने कई देशों में अपने विशेष दूत भिजवाए हैं। मुशाहिद हुसैन तो मंजे हुए नेता और पत्रकार-संपादक रहे हैं लेकिन उनकी बातों का भी वाशिंगटन में मजाक उड़ रहा है। उन्होंने वहां विशेषज्ञों के बीच कह दिया कि यदि कश्मीर हल नहीं होगा तो काबुल भी कुलबुलाता रहेगा। उन्होंने कह दिया कि अमेरिका पाकिस्तान से हाथ धो लेगा तो रुस और चीन उसकी मदद करेंगे। ऐसी ऊटपटांग बातें क्यों कही जा रही हैं?

संसद में कश्मीर पर विशेष प्रस्ताव क्यों पारित किया जा रहा है? गुप्तचर प्रमुख रिजवान अख्तर को हटाने की खबर क्यों आ रही है? फौज और शाहबाज शरीफ (पंजाब के मुख्यमंत्री और नवाज के छोटे भाई) के बीच तू-तू–मैं-मैं क्यों हो रही हैं? इन सब दुविधाओं को मोदी के मत्थे मढ़ना ठीक नहीं है। ये सब परेशानियां पाकिस्तान की अपनी करनी का नतीजा है।  यह वह नाजुक वक्त है, जबकि पाकिस्तान को अपने अंदर झांककर देखना चाहिए। जिस आतंकवाद के कारण आज पाकिस्तान सारी दुनिया में बदनाम हो गया है, उसका इलाज जरुरी है।

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क dr.vaidik@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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तीन करोड़ रुपये घूस लेने से इनकार करने वाले अधिकारी मोइन खान को सलाम

(स्व. मोइन खान)

नई दिल्ली की म्युनिसिपल कौंसिल के कानून अधिकारी मोइन खान की हत्या हो गई। कई अफसरों की हत्या की खबरें छपती रहती हैं। लेकिन इस खबर ने मुझे झकझोर दिया। इस अफसर की हत्या इसलिए करवाई गई कि इसने रिश्वत में 3 करोड़ रु. लेने से मना कर दिया था। मोइन खान को यह रिश्वत इसलिए दी जा रही थी कि वे दिल्ली के एक होटलवाले पर ‘कृपा’ नहीं कर रहे थे। कनाट प्लेस स्थित इस होटल के मालिक से म्युनिसिपाल्टी 150 करोड़ का शुल्क वसूल करना चाहती थी।

ऐसा वह अदालत के आदेश पर कर रही थी। होटल मालिक का कहना था कि मोइन खान तीन करोड़ रु. की घूस ले ले और डेढ़ सौ करोड़ के शुल्क को आया-गया कर दे। इस होटल के मालिक को 1981 में यह कीमती ज़मीन एक छात्रावास बनाने के लिए दी गई थी लेकिन पहले उसको एक टूरिस्ट लॉज बनाया गया और बाद में उसे चार-सितारा होटल में बदल दिया गया। 1995 में उसकी लीज़ रद्द हो गई लेकिन होटलवाले ने जमीन खाली नहीं की। अब अदालत ने उस पर पांच लाख जुर्माना किया और 142 करोड़ रु. का शुल्क भरने के आदेश दिए। इसी की वसूली के लिए कानून-अफसर को नियुक्त किया गया था।

मोइन खान जामिया नगर में रहते थे। उन्होंने राजनीतिशास्त्र में एम.ए. किया था और एलएलबी पास थे। वे अपनी कार से घर जा रहे थे। दो लोगों ने उनकी कार रोककर रास्ता पूछा। उन्होंने जैसे ही शीशा नीचे किया उन्हें गोली मार दी गई। दिल्ली की मुस्तैद पुलिस ने मोबाइल फोन और सीसीटीवी की मदद से हत्यारों को पकड़ लिया तो मालूम पड़ा कि उस होटल-मालिक ने इन हत्यारों को पांच लाख रु. दिए थे, मोइन को मारने के लिए! अखबारों में छपे ये तथ्य सही ही होंगे।

(सीसीटीवी फुटेज में कैद हुए हत्यारे)

जाहिर है कि हत्यारों को तो सजा मिलेगी ही लेकिन होटल मालिक तो छूट जाएगा। पैसे खाकर बड़े से बड़ा वकील उसे बचाने के लिए अदालत में खड़ा हो जाएगा और जजों का भी क्या भरोसा? लेकिन स्वर्गीय मोइन खान के लिए दिल्ली शहर और देश क्या कर रहा है? उनकी पत्नी और तीनों बेटियां अब किसके सहारे रहेंगी? हमारे नौटंकीबाज नेताओं के सिर पर जूं भी नहीं रेंगी? ऐसे ईमानदार और सेवाभावी अफसर भारत मां के सच्चे सपूत हैं। मोइन खान की बहादुरी देश के सारे अफसरों, वकीलों और जजों के लिए अनुकरणीय है। स्वर्गीय भाई मोइन खान को मेरा सलाम!

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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वेद प्रताप वैदिक बोले- अरनब गोस्वामी बहुत नीच आदमी है (देखें वीडियो)

वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं. काफी सुलझे हुए पत्रकार माने जाते हैं. भाषा और विचार के स्तर पर संतुलित माने जाते हैं. लेकिन अरनब गोस्वामी को लेकर उनका गुस्सा ऐसा फूटा कि उन्होंने अरनब गोस्वामी को ना जाने क्या क्या कह दिया, वह भी पूरी मीडिया के सामने. उपर दिए गए तस्वीर पर क्लिक करिए और वीडियो देखिए.

टाइम्स नाऊ के एडिटर इन चीफ अरनब गोस्वामी के खिलाफ सार्वजनिक रूप से किसी वरिष्ठ पत्रकार ने इतना गुस्सा पहली बार जाहिर किया है. इस वीडियो को लेकर लोगों में तरह तरह की चर्चाएं हैं :  https://www.youtube.com/watch?v=mUrI5Fp-YyM

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मोदी की झुंझलाहट का असली कारण कांग्रेस नहीं खुद मोदी ही हैं

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरोप लगाया है कि ‘एक परिवार’ उनके काम में बाधा डाल रहा है। वह अपनी पराजय का बदला ले रहा है। वह राज्यसभा में कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित नहीं होने दे रहा है। यदि वे विधेयक कानून बन जाते तो लाखों मजदूरों को बोनस मिलने लगता, सारे देश में एक रूप सेवा कर प्रणाली लागू हो जाती, जल यातायात कानून बनने पर दर्जनों नदियां सड़कों की तरह उपयोगी बन जातीं, किसानों के हितों की रक्षा होती।

मोदी ने जो आरोप लगाया हैं वे गहरी निराशा के परिणाम हैं। यदि वे बहुत झुंझलाए हुए नहीं होते तो वे ऐसे तीखे आरोप नहीं लगाते। उनके आरोप सही हैं लेकिन असली सवाल यह है कि कांगेस जो कुछ कर रही है, वैसा वह क्यों नहीं करें? कांग्रेस आखिरकार, विपक्ष में है। प्रमुख विपक्षी दल है। यदि वह हर बात में सरकार की टांग न खींचे तो वह कैसी विपक्षी पार्टी है?

कांग्रेस के पास आज है ही क्या? उसके पास न तो कोई नेता है, न कोई नीति है, न विचारधारा है, न सिद्धांत है, न दिशा है। वह करे तो करे क्या? यदि वह हर बात का विरोध न करे तो उसके पास काम ही क्या रह जाएगा? देश के लोग कांग्रेस की इस मजबूरी को अच्छी तरह समझते हैं। मोदी को खैर मनानी चाहिए कि कांग्रेस के पास डॉ. लोहिया जैसा नेता नहीं है। वरना 40 तो क्या, 4-5 सांसद ही काफी होते, इस सरकार की खाट खड़ी करने के लिए!

मोदी की झुंझलाहट का असली कारण कांग्रेस नहीं खुदी मोदी ही हैं। चुनाव-अभियान के दौरान उन्होंने जो सब्ज-बाग सजाया था, दो साल पूरे होने आए लेकिन उनके पेड़ों पर कोई फल दिखाई नहीं पड़ रहे। न काला धन लौटा, न भ्रष्टाचार घटा, न करोड़ों रोजगार पैदा हुए, न मंहगाई घटी, न अंग्रेजी का शिकंजा ढीला हुआ, न जातिवाद की आग ठंडी पड़ी, न सांप्रदायिकता घटी, न आतंकवाद से छुटकारा मिला, न गरीबों को राहत मिली। लोग नरेंद्र मोदी को नहीं कोस रहे हैं। वे खुद को कोस रहे हैं। वे खुद से पूछ रहे है कि वे इतना तगड़ा धोखा कैसे खा गए? उन्होंने इतना भरोसा क्यों कर लिया? वे आशाओं की इस हवाई कुतुब मीनार पर क्यों चढ़ गए?

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बादशाह का शाह उर्फ पंचिंग बैग : इस ताजपोशी पर पुराने अध्यक्षों ने कसीदे क्यों काढ़े?

अमित शाह को दुबारा भाजपा अध्यक्ष बना दिया गया। यह क्या है? यह नरेंद्र मोदी की बादशाहत है। मोदी के बाद शाह और शाह के बाद मोदी याने मोदी की बादशाहत! अब सरकार और पार्टी, दोनों पर मोदी का एकाधिकार है। पार्टी-अध्यक्ष का चुनाव था, यह! कैसा चुनाव था, यह? सर्वसम्मत! याने कोई एक भी प्रतिद्वंद्वी नही। जब कोई प्रतिद्वंद्वी  ही नहीं तो वोट क्यों पड़ते? यह बिना वोट का चुनाव है। देश की सारी पार्टियों को भाजपा से सबक लेना चाहिए। याने कांग्रेस-जैसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों को भी! अभी तो अमित शाह अधूरे अध्यक्ष थे। देर से बने थे। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बने थे। उस समय के अध्यक्ष थे, राजनाथसिंह, जिनके नेतृत्व में मोदी जीते और प्रधानमंत्री बने।

राजनाथसिंह गृहमंत्री बने तो अध्यक्ष की खाली कुर्सी पर मोदी ने अपनी छाया बैठा दी- अमित शाह! मोदी-लहर ने अमित को शाह बना दिया। हरयाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू-कश्मीर- इन सब प्रांतों में जीत का सेहरा शाह के सिर बंध गया, अपने आप! लोकसभा में उ.प्र. की जीत का भी संपूर्ण श्रेय अमित शाह की गजब की राजनीतिक शैली और रणनीति को मिल गया। अब शाह बन गए बादशाह!

लेकिन ज्यों ही बदनाम कांग्रेस की लहर उतरी, मोदी का जादू फीका पड़ा, फूलता हुआ गुब्बारा पंचर हो गया। दिल्ली और बिहार ने दोनों गुब्बारे पिचका दिए। एक गुब्बारा तो पांच साल पूरे करेगा ही लेकिन दूसरे को बदलने का यह बढि़या मौका था लेकिन उसे अब आगे के तीन साल के लिए फिर उड़ा दिया गया है। क्यों? क्योंकि मोदी चतुर खिलाड़ी है।

अब दिल्ली और बिहार-जैसी मार फिर इसी साल पड़नेवाली है। प. बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम! मार पड़ेगी तो पड़े! बादशाह पर क्यों पड़े? शाह पर पड़ेगी। भूसे के थैले पर पड़ेगी! पंचिंग बैग पर! इसीलिए पंचिंग बैग की ताजपोशी पर पुराने तीन अध्यक्षों ने जमकर कसीदे काढ़े! भाजपा की सदस्यता तीन करोड़ से 11 करोड़ कर दी। 500 किमी रोज दौड़ रहे हैं। श्यामाप्रसाद मुखर्जी, दीनदयालजी, अटलजी, मधोकजी, आडवाणीजी, जोशीजी किस खेत की मूली हैं, ऐसे महान व्यक्तित्व के सामने? संघ को भी ठंड लग गई है। वह मोटी रजाई ओढ़े खर्राटे खींच रहा है। बेचारे 11 करोड़ कार्यकर्ता क्या करें? वे बगले झांक रहे हैं।

लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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राहुल गांधी सियासत का एक अवसरवादी चेहरा

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नरेंद्र मोदी के राज में भी हिंदी की वही दशा जो सोनिया-मनमोहन राज में थी : डा. वेदप्रताप वैदिक

नरेंद्र मोदी के राज में हिंदी की वही दशा क्यों हैं, जो सोनिया-मनमोहन राज में थी? सोनिया इटली में पैदा हुईं थीं और मनमोहनजी पाकिस्तान में! मोदी उस गुजरात में पैदा हुए हैं, जहां महर्षि दयानंद और महात्मा गांधी पैदा हुए थे। इन दोनों ने गुजराती होते हुए भी हिंदी के लिए जो किया, किसी ने नहीं किया। और फिर मोदी तो संघ के स्वयंसेवक भी रहे याने दूध और वह भी मिश्री घुला हुआ। फिर भी हिंदी की इतनी दुर्दशा क्यों है? यह दूध खट्टा क्यों लग रहा है?

मुझे पहले ही से डर था। यदि मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो अन्य प्रधानमंत्रियों की तरह वे भी नौकरशाहों की नौकरी करने लगेंगे। इसीलिए मैंने कुछ सभाओं में भाषण देते हुए, जिनमें मोदी भी मौजूद थे, मैंने साफ-साफ कहा कि मोदी क्या-क्या व्रत लें। उनमें तीन बातें मुख्य थीं। एक तो गरीबी-रेखा 32 रु. नहीं, 100 रु. हो। दूसरी, 16 पड़ौसी राष्ट्रों का महासंघ बनाएं। अखंड भारत नहीं, आर्यावर्त्त! बृहद् भारत। और तीसरी, हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलाएं। मोदी ने बड़ी जोर से सहमति भी व्यक्त की लेकिन 20 महीने बीत गए और हमारे मोदीजी उस दिशा में 20 कदम तो क्या, दो कदम भी आगे नहीं बढ़े। ये व्रत भी ‘जुमले’ बन गए, काले धन की वापसी की तरह! हर भारतीय को 15-15 लाख रु. तो क्या, 15 रु. भी नहीं मिले।

आज अंग्रेजी के अखबार ‘इकनामिक टाइम्स’ ने हिंदी में शीर्षक खबर छापकर बताया है कि सरकार के दफ्तरों में लगभग 100 प्रतिशत अधिकारी हिंदी जानते हैं लेकिन कई मंत्रालयों में उसका प्रयोग 10-12 प्रतिशत भी नहीं होता है। जहां थोड़ा ज्यादा होता है, वह निचली श्रेणी के कर्मचारी करते हैं। ऊंचे स्तरों पर कहीं-कहीं तो हिंदी बिल्कुल शून्य है। याने इस देश में हुकूमत किसकी चल रही है? बाबुओं की, नौकरशाहों की, अंग्रेजों के गुलामों की। प्रधानमंत्रीजी की नहीं। वे तो बस टीवी के पर्दों पर और अखबारों के पन्नों पर हैं। प्रधानमंत्री बाहर-बाहर हैं और नौकरशाह अंदर-अंदर! हिंदी है, नौकरानी और अंग्रेजी है, महारानी! इस गोरी महारानी ने मोदी को भी मोहित कर लिया है।

आप देखते नहीं क्या, कि मोदी फिल्मी सितारों की तरह ‘टेलीप्राम्पटर’ पर देख-देखकर अपने अंग्रेजी भाषण पढ़ते रहते हैं। वे भाषण देते नहीं, पढ़ते हैं, क्योंकि वे अंग्रेजी में होते हैं। इन भाषणों को लिखनेवाला नौकरशाह ऊपर और हमारे मोदीजी नीचे! ऐसे मोदीजी हिंदी को संयुक्तराष्ट्र की भाषा क्यों बनाएंगे? देश में ही हिंदी की इतनी दुर्दशा है। वे उसे राष्ट्रभाषा ही नहीं बना पा रहे हैं तो उसे वे विश्वभाषा कैसे बनाएंगे? शायद बना दें, क्योंकि उन्हें देश से ज्यादा विदेश अच्छा लगता है। इसीलिए उनके लगभग सारे अभियानों के नाम विदेशी भाषा में हैं। भाजपा और संघ के लाखों कार्यकर्ताओं की बोलती बंद है। बेचारे परेशान हैं। हिंदी की जो भी दशा हो, वे अपनी दुर्दशा क्यों करवाएं?

लेखक डा. वेदप्रताप वैदिक जाने माने वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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पत्रकार वेद प्रताप वैदिक भी धुर मोदी विरोधी हो गए… पढ़िए उनका ताजा लेख

देश में मोहभंग का वातावरण जितनी तेज़ी से अब बढ़ता जा रहा है, उतनी तेज़ी से कभी नहीं बढ़ा। इंदिरा गाँधी से मोहभंग होने में जनता को 8-9 साल लगे,राजीव गाँधी के बोफोर्स का पिटारा ढाई साल बाद खुला और मनमोहन सिंह को इस बिंदु तक पहुँचने में 6-7 साल लगे लेकिन हमारे “प्रधान–सेवक” का क्या हाल है? प्रचंड बहुमत से जीतनेवाले जन—नायक का क्या हाल है? उसका नशा तो दिल्ली की हार ने एक झटके में ही उतार दिया था,और अब वसुंधरा राजे की रोचक कथाओं और सुषमा स्वराज की भूल ने सम्पूर्ण भाजपा नेतृत्व और संघ परिवार को भी कटघरे में ला खड़ा किया है।

अब जो भी वसुंधरा या सुषमा के पक्ष में बोलता है, वह लोगों को ललित मोदी का वकील मालूम पड़ता है। और जो नहीं बोलता है, उसके मौन की दहाड़ सारा देश सुन रहा है। हमारे प्रधान—सेवक का योग-दिवस (21 जून) अभी से शुरू हो गया है। नाक, कान, आँख और मुँह सब एक साथ बंद हो गए हैं। मोटे मोदी पर छोटा मोदी भारी पड़ रहा है। 56 इंच का सीना पता नहीं सिकुड़कर कितना इंच रह गया है?

मोदी सरकार की प्रतिष्ठा पैंदे में बैठ गई है। मोटे मोदी को छोटा मोदी ले बैठा। देश के सामने दूसरा विकल्प उभरा था—अरविन्द केजरीवाल का, वह भी नौटंकी में बदल गया है।जन—आंदोलनों के लिए देश फिर तैयार हो गया है। ऐसी स्थिति में आपात्काल के बादलों का घिरना शुरू हो गया है। आडवाणी जी को बधाई कि उनको ये घिरते हुए बादल अभी से दिखाई पड़ने लगे हैं।”

(‘नया इंडिया’ में प्रकाशित वेदप्रताप वैदिक के लेख का एक अंश)

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