योगी के खिलाफ लामबंद हुए 16 लाख कर्मचारी, पेट पर लात पड़ने से हैं नाराज

संजय सक्सेना, लखनऊ

लखनऊ। कोरोना महामारी के समय आर्थिक तंगी से जूझ रही योगी सरकार एक तरफ जरूरतमंदों का पेट भरने का हरसंभव प्रयास कर रही है तो दूसरी तरफ सरकारी कर्मियों की जेब भी ढीली कर रही है। कोशिश है सरकार की तिजोरी में पैसा बढ़ सके। पहले जनता के नुमांइदों के कुछ अधिकारों में कटौती करके पैसा जुटाया गया। इसके बाद योगी जी की नजर राज्य कर्मचारियों को मिल रहे भत्तों (डीए) पर पड़ गई। इसमें से कुछ भत्ते तो दशकों पुराने थे। सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी से बचे रहने के लिए कोई सरकार इन भत्तों को खत्म करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी। अब जबकी योगी सरकार ने इन भतों को खत्म किया तो राज्य कर्मचारियों और सरकार के बीच तल्खी बढ़ गई है। यह तल्खी अभी तो दबी हुई है, लेकिन कोरोना महामारी का खतरा कम होते ही कर्मचारी आंदोलन या हड़ताल कर सकते हैं। जिस तरह के कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बसपा के नेता कर्मचारियों के साथ सुर में सुर मिला रहे हैं उससे तो यही लगता है कि कर्मचारियों के भत्ते खत्म किया जाना बड़ा सियासी मुद्दा बन सकता है।

योगी सरकार ने अपने कर्मचारियों के छहः तरह के भते खत्म करके सही किया या फिर यह कर्मचारियों के साथ नाइंसाफी है, इस सवाल का जबाव लोग अपने-अपने हिसाब से दे रहे हैं। पहले उन भत्तों की बात हो जाए जो खत्म किए गए हैं। योगी सरकार के आदेश के बाद सचिवालय के दस हजार से अधिक कर्मचारियों को मिलने वाला न्यूनतम 625 और अधिकतम 2000 रुपये का भत्ता खत्म कर दिया गया है। इसी तरह से 16 लाख कर्मचारियों को मिलने वाला न्यूनतम 340 और अधिकतम 900 रुपये का नगर प्रतिकर भत्ता भी बंद कर दिया गया है। राज्य के प्रत्येक जूनियर इंजीनियर को मिलने वाला चार सौ रूपए का विशेष भत्ता अब नहीं मिलेगा। इसी तरह से पीडब्ल्यूडी कर्मचारियों को मिलने वाला रिसर्च,अर्दली डिजाइन भत्ता जो चार सौ रूपए था भी बंद कर दिया गया है। इसी प्रकार से सिंचाई विभाग के कर्मचारियों को मिलने वाला आईऐंडपी, अर्दली भत्ता जो 500 से अधिक था, अब मिलना बंद हो गया है।.भविष्य निधि लेखों के रख-रखाव करने वाले कर्मचारियों को मिलने वाला करीब चार सौ रूपए प्रोत्साहन भत्ता भी खत्म कर दिया गया है।

16 लाख कर्मचारियों के हछः तरह के भत्ते खत्म किए जाने के संबंध में जब वित्त मंत्री सुरेश खन्ना से सवाल किया गया तो उनका कहना था कि छठवें वेतन आयोग की संस्तुतियों में जो भत्ते समाप्त करने की सिफारिशें थी, उन्हें ही समाप्त करने का फैसला लिया गया है। इन भत्तों को केंद्र सरकार ने भी समाप्त किया है। राज्य कर्मचारियों को वेतन, डीए और एचआरए मिलता रहेगा। प्रदेश की आर्थिक गतिविधियां सुस्त हैं। तमाम दुश्वारियों के बाद भी कर्मचारियों को उनका वेतन समय से दिया जा रहा है और आगे भी दिया जाएगा।

गौरतलब हो , इन छहः भत्तों को पहले एक साल के लिए स्थगित किया गया था जिसे नये फैसले में हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। इसी से कर्मचारी नाराज हैं। वे लॉकडाउन के बाद आंदोलन की तैयारी में हैं। 12 मई को फैसले का आदेश आने के बाद कर्मचारी संगठनों ने एक दूसरे से बात की और तय किया कि लॉकडाउन के बाद इस मसले पर आंदोलन करना ही होगा। कर्मचारी संगठन भत्ते पूरी तरह से समाप्त किए जाने और श्रम कानूनों को तीन साल के लिए स्थगित किए जाने को सरकार का अमानवीय फैसला बता रहे है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि सरकार हम मजदूरों/कर्मचारियों को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर कर रही है।

राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के अध्यक्ष हरिकिशोर तिवारी और महामंत्री शिवबरन सिंह यादव ने कहा कि एक तरफ सांसदों के भत्तों में बढ़ोतरी की जा रही है और दूसरी तरफ कर्मचारियों के भत्ते खत्म किए जा रहे। प्रदेश सरकार ने पहले कहा कि हम वेतन में कोई कटौती नहीं करेंगे। फिर कहा कि केंद्र सरकार द्वारा जो फैसला लिया जाएगा, वह लेंगे। फिर केंद्र के फैसले के इतर पहले योगी सरकार ने छह भत्तों पर साल भर के लिए रोक लगा दी और जब कर्मचारी संगठनों ने कोई विरोध नहीं किया तो इसे हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। उधर,सचिवालय भत्ता खत्म किए जाने से नाराज सभी सचिवालय कर्मचारी संगठनों ने कहा कि जब भत्ते पहले ही एक साल के लिए स्थगित थे तो फिर उसे एकदम से समाप्त करने का कोई तात्कालिक फायदा अधिकारी या सरकार बताए। सचिवालय समन्वय समिति के एक प्रतिनिधिमंडल ने सीएम के प्रमुख सचिव संजय प्रसाद से मुलाकात भी की और ज्ञापन भी सौंपा। समिति के सदस्यों ने बताया कि उन्हें संजय प्रसाद द्वारा आश्वस्त किया गया है कि यह स्थगन आदेश अस्थायी है। वित्तीय स्थिति ठीक होते ही इसे दोबारा लागू किया जाएगा।

ज्ञातव्य हो राज्य कर्मचारियों के छह भत्ते खत्म किए जाने का आदेश मंगलवार को अपर मुख्य सचिव, वित्त ने जारी कर दिया। बीते 24 अप्रैल को खत्म किए गए इन भत्तों को राज्य सरकार ने 31 मार्च, 2021 तक स्थगित करने का निर्णय लिया था। राज्य सरकार का अनुमान था कि इन भत्तों को खत्म करने से हर साल राज्य सरकार के खजाने पर 24,000 करोड़ रुपये का कम बोझ आएगा।बाद में इन भत्तों को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। उत्तर प्रदेश स्थानीय निकाय कर्मचारी महासंघ ने आंदोलन की घोषणा कर दी है। महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष शशि कुमार मिश्र ने कहा है कि फैसले के बाद ही कार्यसमिति की विडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बात की गई और तय किया गया कि रणनीति तैयार की जाए। सचिवालय संघ के अध्यक्ष यादवेंद्र मिश्र ने कहा कि यह प्रदेश के 16 लाख कर्मचारियों के लिए बुरी खबर है। यह कर्मचारियों के साथ सरकार का धोखा है।

बात डीए खत्म किए जाने की सियासत की कि जाए तो विपक्ष इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहता है। सबसे पहले अखिलेश ने कर्मचारियों के समर्थन में ट्वीट करते हुए गहा सरकारी सेवकों के डीए पर पाबंदी का फैसला सरकार तुरंत वापस ले। एक तरफ बिना अवकाश लिए अधिकारी-कर्मचारी अपनी जान पर खेलकर कई गुना काम कर रहे हैं, दूसरी तरफ सरकार उन्हें हतोत्साहित कर रही है। पेंशन पर निर्भर रहने वाले बुजुर्गों के लिए तो ये और भी घातक निर्णय है।

कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने पूछा कि सरकारी कर्मचारियों का डीए किस तर्क से काटा जा रहा है जबकि इस दौर में उनपर काम का दबाव कई गुना हो गया है। दिन रात सेवा कर रहे स्वास्थ्य कर्मियों और पुलिसकर्मियों का भी डीए कटने का क्या औचित्य है? तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को इससे बहुत कष्ट है। पेन्शन पर निर्भर लोगों को निर्भर रहना पड़ रहा है। प्रियंका ने कहा कि ये चोट क्यों मारी जा रही है? सरकारें अपने अनाप शनाप खर्चे क्यों नहीं बंद करतीं? सरकारी व्यय में कटौती क्यों नहीं घोषित की जाती?

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार संजय सक्सेना का विश्लेषण.

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