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सुख-दुख

पश्चिम में ज़ेन की लोकप्रियता एक असाधारण घटना है!

दिनेश श्रीनेत-

इन दिनों ज़ेन दर्शन पर कुछ सरल सी किताबें पढ़ रहा हूँ. यह मेरा अपना तरीका है कि जब किसी नए विषय पर कुछ पढ़ना होता है तो मैं पहले उसके सामान्य और लोकप्रिय तत्वों को समझने का प्रयास करता हूँ. यानी ‘मेड-इज़ी’ टाइप के अध्ययन से शुरुआत होती है. जब उसमें मन रमता है तो फिर ज्यादा गंभीर और मानक पुस्तकों का अध्ययन आरंभ होता है. सिर्फ आरंभ, क्योंकि किसी विषय के अध्ययन की कोई सीमा नहीं है.

ज़ेन को पढ़ते-समझते मुझे यह विचारों को महज विचार न रहने देने बल्कि जीवन में समाहित करने का दर्शन ज्यादा लगा. इससे उलट यह भी कह सकते हैं कि किताबी दर्शन से हटकर जीवन की छोटी-बड़ी बातों में जीवन के बड़े सत्य को हासिल करना पाना ही ज़ेन जीवन पद्धति का उद्देश्य है. यह बौद्ध धर्म के दर्शन को सरल और व्यावहारिक तरीके से अपनाने पर जोर देता है. बौद्ध धर्म के सबसे बुनियादी पक्ष आत्मज्ञान को आधार बनाते हुए ज़ेन में बाकी आडंबर जैसे प्राचीन ग्रंथ, अनुष्ठान और पूजा को कम करते हुए उसे रोजमर्रा के जीवन से जोड़ा गया है.

आम तौर पर ऐसा होने पर किसी भी धर्म या जीवन पद्धति के आडंबर में बदलने का अंदेशा सबसे ज्यादा होता है. किंतु इससे उलट ज़ेन दर्शन मनुष्य की अंतःप्रज्ञा, उससे विवेक और तर्कसंगतता पर ज्यादा भरोसा करता है और जीवन में उन छोटी-छोटी बातों को शामिल करने पर जोर देता है, जिनसे व्यक्ति अपने आंतरिक सत्य और विवेक के ज्यादा करीब जा सके, बजाय किसी बाहरी ज्ञान को खुद पर आरोपित करने के. इस तरह से मेरी समझ में ज़ेन बुद्ध को सबसे करीब से महसूस कर पाया है, बुद्ध के वास्तविक अर्थ ‘जागृत व्यक्ति’ को सबसे सही अर्थों में महसूस कर पाया है. भारत से चीन और फिर वहां जापानी यात्रा ज़ेन का निर्माण हुआ.

पश्चिम में ज़ेन की लोकप्रियता भी एक असाधारण घटना है और यह पश्चिम की उपभोक्तवादी संस्कृति को एक सशक्त जवाब की तरह सामने आता है. मेरे प्रिय इतिहासकार अर्नोल्ड टॉयनबी से बौद्ध दार्शनिक व कवि दाइसाकू इकेदा ने ‘चूज़ लाइफ : अ डायलॉग’ में एक लंबा संवाद किया है. टायनबी का मानना है कि बीसवीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक बौद्ध धर्म का पूर्व से पश्चिम की ओर आंदोलन था. पश्चिम में आने का लाभ यह हुआ कि इससे दर्शन को अनुष्ठान और मठों से बाहर साधारण जीवन में अपनी ऊर्जा ग्रहण करने की स्वतंत्रता मिली. जापानी दार्शनिक डीटी सुजुकी तथा एलन वॉट्स जैसे अमेरिकी लेखकों ने अपनी किताबों से पश्चिम में इस दर्शन को बहुत लोकप्रिय बनाया.

यह रोचक है कि अमेरिका के लोकप्रिय कॉमिक कैरेक्टर बैटमैन को बहुत से पॉपुलर कल्चर के अध्येताओं ने बुद्ध के जीवन तथा विचारों से जोड़ा है. सिद्धार्थ की तरह ऐशो-आराम में पले-बढ़े ब्रुस वेन को मानवीय पीड़ा का पहला पाठ तब मिला जब उसके माता-पिता को एक रात थिएटर से बाहर निकलते समय गोली मार दी गई. सिद्धार्थ की तरह ब्रूस की एक लंबी यात्रा रही है जिसमें वह उन लोगों के तक पहुंचता है जिनके पास क्रोध, मृत्यु के भय और अन्याय से निपटने के दर्शन थे. ‘बैटमैन बिगिन्स’ फिल्म पर आधारित उपन्यास में डेनिस ओ’ नील ने ब्रूस की इस यात्रा को बखूबी प्रस्तुत किया है. डेनिस ओ’ नील मेरे प्रिय बैटमैन लेखक रहे, जिनकी मृत्यु पर मैंने लिखा भी था.

बहरहाल, वापस इस दर्शन पर लौटते हैं तो हम पाते हैं कि पश्चिम ने अपनी बहुत सी दुविधाओं और दुश्चिंताओं का समाधान ज़ेन फिलॉसफ़ी में खोजा है. यहां तक कि इस दौर की लोकप्रिय यूट्यूबर लाना ब्लैंकली भी अपनी शांत आवाज़ में जीवन के जिन आयामों की बात करती है वह ज़ेन के बहुत करीब होते हैं. इससे मेरे मन में एक और विचार उपजता है, वह ये कि धर्म का जो लोकप्रिय स्वरूप है, उसमें जीवन पद्धति और ज्ञान को थोपने पर ज्यादा जोर है, लेकिन अगर संस्कृति को परिभाषित करें तो वह जाग्रत चेतन और अचेतन मन का विस्तार है.

हर संस्कृति एक विचार है मगर ऐसा विचार जो विस्तार लेते हुए आपके अभिवादन के तरीकों, खान-पान, वस्त्रों के चयन, सोचने-खाने-बैठने के तरीकों तक में समाहित हो गई है. धार्मिकता नियमों तथा आडंबरों का सहारा लेती है और संकुचित और जड़ मस्तिष्क वालों पर अच्छा काम करती है मगर संस्कृति तभी जन्म लेती है जब वह एक सचेतन व्यक्ति के विचार से कर्म की यात्रा करते हुए पद्धति और शैली में बदल जाए. इसीलिए स्टीव जॉब्स जैसे लोगों को ज़ेन दर्शन ने आकर्षित किया, इसका असर उनके “हर दिन जीवन का अंतिम दिन” वाले दर्शन से लेकर ऐपल के प्रोडक्ट और डिज़ाइन फिलासफी तक में देखा जा सकता है.

चट्टानों की कठोर धार्मिक मान्यताओं का निर्माण आध्यात्मिक रूप से खोखले लोगों के लिए होता है जबकि संस्कृति में बहती नदी सी निरंतरता है, वह हर क्षण आपको नवीन बनाकर रखती है क्योंकि वह मनुष्य की आंतरिक यात्रा से निकलती है न कि महज किसी के कहे गए शब्दों से. ज़ेन की एक अच्छी बात यह है कि इसकी स्थापनाओं पर किसी एक व्यक्ति या स्कूल का दबाव नहीं है, यहां तक कि बुद्ध का भी नहीं, इसमें बुद्ध के साथ-साथ ताओ, कन्फ्यूशियस, चीनी कविता तथा लोक कथाओं का मेल देखने को मिलता है.

ज़ेन उन बातों पर जोर देता है जिसकी इस समय दुनिया को सबसे ज्यादा जरूरत है, जैसे इस दर्शन में जिस जीवन शैली का अनुसरण किया जाता है उसमें सहअस्तित्व की अवधारणा को मजबूत करना, धरती के बहुमूल्य संसाधनों को बर्बाद न करना, सचेतन मन का विस्तार, अपनी जीवन शैली में उपभोग को न्यूनतम करना – जिसके भारत में सबसे अच्छे प्रवक्ता गांधी बने, सभी प्राणियों की पीड़ा से खुद को जोड़ पाना शामिल है.

जब मैं अपने गांव जाता था तो जिस आखिरी स्टेशन पर हम उतरते थे, वहां सुबह के धुंधलके में एक पत्थर दिखाई देता था, जिस पर लिखा होता, ‘लुंबिनी कानन : महात्मा बुद्ध का जन्मस्थान यहां से …. किलोमीटर की दूरी पर है.’ मुझे यह देखकर रोमांच हो आता कि बुद्ध सचमुच कभी यहीं कहीं पास में जन्मे थे. बुद्ध मेरे लिए सदैव एक खोज की तरह ही रहेंगे. अभी जब समाज में हिंसा एक सामूहिक उत्सव बनती जा रही है, बुद्ध करुणा का प्रतीक बनकर उभरते हैं.

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