अनुराग कश्यप मानसिक रूप से विक्षिप्त लगता है!

Shikha : अनुराग कश्यप मुझे कई बार मानसिक रूप से विक्षिप्त लगता हैl माना हिंसा, अपराध और गंदगी आज के समाज का सच है, पर उसे फिल्माने का या कोई सामाजिक मुद्दा उठाने का एक यथार्थवादी सलीका होता हैl पर जिस प्रकार इन्हें वह अपनी फिल्मों में फिल्माता है, दृश्यों का फिल्मांकन, डायलाग, गाने आदि, उन्हें देखकर यही लगता है कि इस तरह की कल्पनाएँ किसी स्वस्थ दिमाग की उपज नहीं हो सकतीl

सड़ांध मारती, विक्षिप्त और गंदे दिमाग की ही उपज हो सकती हैंl शायद अपने गंदे से दिमाग में अमानवीयता की हर हद को पार करती हिंसा की कल्पना करते वक्त वो कुटिल सी मुस्कान ज़रूर होती होगी उसके चेहरे पर मानो मन ही मन अपनी उस कल्पना के सागर में गोते लगाता हुआ शायद आनंदित महसूस करता होगाl और, भयानक तो यह है कि दर्शकों का एक तबका इस सड़ांध को पसंद करने लगता हैं, जिन दृश्यों को देखकर उल्टियां आनी चाहिए उनपर तालियाँ पीटकर हंस देता हैl एक ऐसे समाज में हम जी रहे हैं।

कामरेड शिखा के उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ पठनीय कमेंट्स इस प्रकार हैं :

Navmeet Nav : हिंसा अपराध गन्दगी समाज की सच्चाई है। इनको दिखाया ही जाना चाहिए। लेकिन यह इस तरह से दिखाया जाना चाहिए जिससे दर्शक के मन में इनके प्रति घृणा और गुस्सा उत्पन्न हो। लेकिन यह इस तरह दिखाता है कि दर्शक को मजा आता है। बुर्जुआ संस्कृति और प्रस्तुतिकरण का क्लासिकीय उदाहरण है।

Shikha Shikha बिलकुल सटीक विश्लेषण नवमीत. किसी दृश्य में एक अपराधी द्वारा एक चार पांच साल के बच्चे के सर पर हथौड़ा मारकर उसे खत्म करते दिखाया जाता है. फिल्मांकन ऐसा मानो कोई खेल चल रहा हो. बैकग्राउंड म्यूजिक भी ऐसा जैसे कोई जश्न चल रहा हो और उस विभत्स दृश्य के बाद दर्शकों के ठहाके. ऐसे में ये पड़ताल करना ज़रूरी है कि फिल्मकार दिखाना क्या चाहता है.

Reyazul Haque : In simple Hindi: Raman Raghav 2.0 is quite a failure. It is a bad movie. It doesn’t realizes that if you take reason out from the violence, you will only end up reconciling with the understanding that normalises it. Especially in a case where you are dealing with violence perpetrated both by state and non state actors. Proposing the ‘feel to kill’ as a sole motive force for the murders renders it as mindless, and makes unrecognisable the dynamics, power relations and interests in the structure of violence of bodies representing the state. State is not a mindless body, and to think that it works mindlessly is insisting to stay blissfully ignorant.

Even in the case of an individual, such complexity cannot, and must not, be ruled out. In every case, violence has a history and a reason. Without it, one cannot even feel the presence of the violence and therefore cannot maintain records and confess. So, RR2.0 takes a nosedive. But one thing film does remarkably: it takes on how schezophrenic our society has been fashioned that it does not expect someone to speak truth and believes in, even demand, the falsity.

सोशल एक्टिविस्ट रेयाजुल हक के उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ पठनीय कमेंट्स इस प्रकार हैं :

Pujita : Rezayul much that i agree with the conclusion that the film is a nosedive – i have one disagreement. Which is that while the two are not exactly mirror images of each other, (considering their position within social networks), it is actually quite close to the cogito-madness debates (the famous Descartes-Foucault-Derrida debate) in that madness is engraved within cogito, but closer to the film is that violence is sovereign and inexplicable. Reason and knowledge is itself violence.

Reyazul Haque : Yes Pujita. Violence is sovereign and inexplicable, but then how we will take those two (in fact three) women being subjected to it. Why they cannot do enough violence against Raman or the cop? There is a structure of sovereignty too, I think, that gives it a shape and scope (space?). Without it violence will become intangible and unrecognisable (even it is engraved in cogito). No?

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