चार नवम्बर के बाद टूट जायेगा ‘अपना दल’

अजय कुमार, लखनऊ

अपना दल 04 नवंबर को वाराणसी में 19वां स्थापना दिवस मनाने जा रहा है। स्थापना दिवस को लेकर तैयारी भी चल रही है, लेकिन अपना दल के संस्थापक अध्यक्ष स्वर्गीय सोनेलाल पटेल की विरासत संभाले उनकी पत्नी और पुत्रियों के बीच मची राजनैतिक होड़ ने स्थापना दिवस का रंग फीका कर दिया है। कार्यकर्ता गुटों में बंट गये हैं। पारिवारिक झगड़े के कारण अपना दल के स्थापना दिवस समारोह की कामयाबी पर ग्रहण लग गया है। सोनेलाल पटेल की मौत के बाद काफी तेजी के साथ राजनैतिक क्षितिज पर उभरी उनकी तीसरे नंबर की पुत्री अनुप्रिया पटेल के खिलाफ मॉ कृष्णा पटेल ने अपनी दूसरी बेटी पल्लवी पटेल को साथ लेकर बगावती रुख अख्तियार कर लिया है।

वैसे तो घर में मनमुटाव की खबरें काफी पहले से आ रही थीं, लेकिन यह झगड़ा उस समय सड़क पर खुल कर सामने आ गया जब अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल ने अनुप्रिया की मर्जी के खिलाफ दूसरे नंबर की बेटी पल्लवी पटेल को पार्टी उपाध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी। कृष्णा पटेल यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए अनुप्रिया पटेल को महासचिव के पद से भी हटा दिय। कृष्णा पटेल का आरोप था कि अनुप्रिया अपने आप को पार्टी से ऊपर समझती हैं और उनके पति की दखलंदाजी पार्टी में काफी बढ़ गई है। अनुप्रिया के पति पार्टी में तोड़फोड़ कर रहे हैं जो पार्टी हित में नहीं है। जबकि अनुप्रिया का कहना था कि उनके खिलाफ साजिश रची जा रही है।

जो हालात बन रहे हैं उससे तो यही लगता है कि पारिवारिक कलह के कारण दो गुटों में बंटता जा रहा अपना दल कभी भी टूट का शिकार हो सकता है। इसका नजारा स्थापना दिवस के बाद दिखाई पड़ जाये तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। दरअसल, अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल  ने सभी पदाधिकारियों कौर कार्यकताओं को स्थापना दिवस कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने को कहा है, वहीं अनुप्रिया गुट की तरफ से ऐसे संकेत आ रहें हैं कि वह (अनुप्रिया) स्थापना दिवस के कार्यक्रमों से दूरी बना कर रखेंगी।

बात राजनैतिक परिपक्वता की कि जाये तो ऐसा लगता नहीं है कि अनुप्रिया के बिना अपना दल का वजूद कृष्णा पटेल बचा पायेंगी। अनुप्रिया पटेल अपने पिता के समय से राजनीति में शिरकत कर रही हैं और कई आंदोलन भी चला चुकी हैं। सोनेलाल पटेल की मौत के बाद अनुप्रिया ने ही चाहरदीवारी से बाहर निकाल कर मॉ कृष्णा पटेल को अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाया था। अनुप्रिया ने पार्टी को नई पहचान दी। 2012 में वह वाराणसी की रोहनिया सीट से विधायक चुनी गईं और इसके बाद भाजपा के साथ मिलकर उन्होंने मिर्जापुर से संसदीय चुनाव लड़ा और सांसद बन गईं।

भाजपा के साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ने जैसा अहम फैसला अनुप्रिया ने ही लिया था। अनुप्रिया के इस्तीफे से रिक्त हुई रोहनिया सीट से सोनेलाल पटेल की पत्नी चुनाव लड़ीं, लेकिन उन्हें जीत नसीब नहीं हुई। इस पर कहा यह गया कि अनुप्रिया अगर पूरा दमखम लगाती तो कृष्णा पटेल यह चुनाव जीत जातीं। इस तरह के आरोप कृष्णा पटेल ने भी अपनी बेटी पर लगाये। गौरतलब हो, पूर्वांचल की लगभग एक दर्जन लोकसभा सीटों पर अपना दल हार-जीत के समीकरण बदलने की ताकत रखता है। भारतीय जनता पार्टी 2017 के विधान सभा चुनाव भी अपना दल के साथ मिलकर लड़ना चाहती है, लेकिन फिलहाल वह दर्शक की भूमिका में नजर आ रही है।

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अजय कुमार की रिपोर्ट.

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