जब पीएम ने ‘बाजारू’ कहा था तो चुप रहे, अब उनका मंत्री ‘वेश्या’ कह रहा तो आगबबूला क्यों?

Sn Vinod : “बाजारू” और “वेश्या” पत्रकार? अभी-अभी फ़रवरी में दिल्ली विधान सभा चुनावप्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मीडिया को “बाज़ारू” निरुपित किया था, तब मीडिया मौन रह गया था।दिन-भर टी वी पर ताल ठोक के विशेष या फिर बड़ी बहस में देश की धड़कन पर चर्चा करने वाले स्वघोषित महान पत्रकारों के लिए वह बहस का विषय नहीं बना था। बड़े समाचार पत्रों ने भी अनदेखी की।

अब एक समाचार चैनल के संपादक के बहाने भारत के पूर्व सेना प्रमुख तथा वर्तमान केन्द्रीय राज्य मंत्री वी के सिंह ने सीधे-सीधे पत्रकारों की तुलना वेश्या से कर दी। सिंह का समर्थन करते हुए देश के एक पूर्व न्यायाधीश व भारतीय प्रेस काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने भी,थोड़ा संयम रखते हुए,”अधिकांश” पत्रकारों को वेश्या निरुपित कर डाला। जहाँ तक मोदी की टिप्पणी का सवाल है,वह उनकी हताशा थी। तब सभी टी वी चैनल अपनी सर्वे रिपोर्ट में भाजपा के मुकाबले केजरीवाल की “आप” को काफी आगे बता रहे थे। दिल्ली चुनाव मोदी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका था। बावजूद इसके मोदी की टिपण्णी सर्वथा अवांछित-आपत्तिजनक थी। फिर भी मीडिया मौन रह गया था। लोगों ने ‘मौन’को मीडिया की स्वीकृति मान लिया था जबकि सम्पूर्ण मीडिया और सभी पत्रकारों को “बाजारू” निरुपित करना घोर आपत्तिजनक था।

अब वी के सिंह और काटजू की टिप्पणी के बाद जरुरी है कि पत्रकार बिरादरी ऐसे घृणित आरोप पर मंथन करे,निडरता पूर्वक”सच”का सामना करे। और सच ये कि आरोप पूर्णतः निराधार नहीं। प्रधानमंत्री सहित अन्य वरिष्ठ यदि हम पत्रकारों पर प्रतिकूल टिप्पणियां कर रहे हैं तो उनके पास कारण मौजूद हैं।अब बहुत हो चुका। प्रायः प्रतिदिन लग रहे ऐसे लांछन से पूरी की पूरी बिरादरी बदनाम हो रही है।समय आ गया है जब तालाब की सफाई के लिए सड़ी मछलियों को बाहर करना ही होगा। लेकिन ये आसान नहीं। मीडिया पर आज कब्ज़ा, कुछ अपवाद छोड़, सरकार संरक्षित वैसी हस्तियों का है जो इस गंदले तालाब में ही फल-फूल रहे हैं। वे सफाई कतई नहीं चाहेंगे। मेरी आशा, अपवाद स्वरुप मौजूद उन पुराने व युवा ईमानदार पत्रकारों से है जो पेशे की पवित्रता और मूल्यों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं-क़ुरबानी देने को तत्पर हैं। उन्हें चुनौती है कि क्या वे मोदी, सिंह, काटजू की टिप्पणियों के अलोक में सफाई अभियान छेड़ेंगे या मौन रह “लांछन”का विस्तार होने देंगे, लांछित ज़िन्दगी जिते रहेगे? ध्यान रहे पत्रकारिता आज पेशा तो बन गई है, लेकिन अभी भी इसके नाम के पूर्व एक शब्द “पवित्र” जुड़ा हुआ है।

वरिष्ठ पत्रकार एस. एन. विनोद के फेसबुक वॉल से.

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