बीईए जैसी संस्‍थाओं को अब भंग कर दिया जाना चाहिए

Abhishek Srivastava : 14 सितंबर को समाचार चैनलों पर दो दिलचस्‍प हेडलाइनें चल रही थीं। एक में बताया जा रहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस को गोवा के मसले पर ‘फटकार’ दिया है। संवैधानिक व्‍यवस्‍था कहती है कि राज्‍यपाल सबसे पहले सबसे बड़ी पार्टी को बुलाएगा सरकार बनाने के लिए। सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस की याचिका पर उससे पूछा है कि उसने अपनी लिस्‍ट राज्‍यपाल को पहले क्‍यों नहीं दी। सब इसे सुप्रीम कोर्ट की ‘’डांट’ या ‘फटकार’ बताकर चला रहे थे। आजतक पर रिपोर्टर अहमद अज़ीम ने डांट-फटकार की कोई बात नहीं कही, लेकिन ऐंकर सईद लगातार ‘डांट-फटकार’ बोले जा रहे थे।

दूसरी हेडलाइन यह है कि कोयम्‍बटूर में संघ की बैठक में तय होगा उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री का नाम। संविधान कहता है कि चुना हुआ विधायक दल अपने नेता का चयन करेगा। समाचार चैनल इसे भी भूल गए हैं। पूरे उत्‍साह से बताया जा रहा है कि मोहनजी भागवत कोयम्‍बटूर में तय करेंगे कि कौन होगा विधायक दल का नेता और मुख्‍यमंत्री। अब यह बताने की कोई ज़रूरत नहीं कि भागवतजी कौन हैं। चैनलों ने उन्‍हें जनता का बाइ डिफॉल्‍ट प्रधान प्रतिनिधि मान लिया है।

टीवी के एक संपादक होते थे एन.के. सिंह। अपनी मेज़ पर वे हमेशा संविधान की एक प्रति रखते थे। इंटरव्‍यू में पत्रकारों से संविधान से जुड़े सवाल करते थे। वे आजकल ब्रॉडकास्‍ट एडिटर्स असोसिएशन (बीईए) के महासचिव बताए जाते हैं। टीवी चैनलों को संवैधानिक मूल्‍यों के दायरे में खबर दिखाना और असंवैधानिक खबरों से परहेज़ करना वे नहीं सिखा पाए। बीईए ने 31.08.2013 को आखिरी प्रेस रिलीज़ जारी की थी। ऐसी संस्‍थाओं को अब भंग कर दिया जाना चाहिए।

मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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