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दिल्ली

हमें इस बलात्कार से अपने इस बुजुर्ग लेखक को बचाना चाहिए!

Shashi Bhooshan Dwivedi : 6 दिसंबर को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में हुए 17 वें रमाकांत स्मृति कथा सम्मान में वरिष्ठ आलोचक डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने कहा कि मैं पूरी गंभीरता से कहना चाहता हूँ कि जो लेखक इस कार्यक्रम में नहीं आते मुझे उनके लेखक होने पर संशय है। त्रिपाठी जी इस कार्यक्रम के अध्यक्ष थे लेकिन उन्होंने कहा कि मैं इस कार्यक्रम का अध्यक्ष बनना नहीं चाहता था लोगों ने जबरन बना दिया (ऐसा वे पिछले 5 -7 कार्यक्रमों में कह चुके हैं। अर्थ यह कि आयोजक लोग इस बुढ़ापे में उनके साथ बलात्कार कर रहे हैं। हमें इस बलात्कार से अपने इस बुजुर्ग लेखक को बचाना चाहिए।) अध्यक्ष त्रिपाठी जी जब अपना अध्यक्षीय वक्तव्य देने लगे और पुरस्कृत कहानी पर बात करने लगे तो लगा कि उन्होंने कहानी पढ़ी ही नहीं है.

Shashi Bhooshan Dwivedi : 6 दिसंबर को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में हुए 17 वें रमाकांत स्मृति कथा सम्मान में वरिष्ठ आलोचक डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने कहा कि मैं पूरी गंभीरता से कहना चाहता हूँ कि जो लेखक इस कार्यक्रम में नहीं आते मुझे उनके लेखक होने पर संशय है। त्रिपाठी जी इस कार्यक्रम के अध्यक्ष थे लेकिन उन्होंने कहा कि मैं इस कार्यक्रम का अध्यक्ष बनना नहीं चाहता था लोगों ने जबरन बना दिया (ऐसा वे पिछले 5 -7 कार्यक्रमों में कह चुके हैं। अर्थ यह कि आयोजक लोग इस बुढ़ापे में उनके साथ बलात्कार कर रहे हैं। हमें इस बलात्कार से अपने इस बुजुर्ग लेखक को बचाना चाहिए।) अध्यक्ष त्रिपाठी जी जब अपना अध्यक्षीय वक्तव्य देने लगे और पुरस्कृत कहानी पर बात करने लगे तो लगा कि उन्होंने कहानी पढ़ी ही नहीं है.

उन्होंने पन्ना पलटकर कहानी से एक जुमला उठा लिया जिसमे सुबह की चाय का जिक्र था। बस त्रिपाठी जी इसी पर खेल गए। बोले -वाह, सुबह की चाय ! सुबह की चाय बड़ी अच्छी चीज़ है। सुबह की चाय मिल जाय तो दिन बड़ा अच्छा गुजरता है। पत्नी अगर खुश हो तो सुबह की चाय कैसे देती है और नाराज़ हो तो कैसे देती है आदि आदि।(काश इस कहानी में चाय के साथ पकौड़े और मिठाइयों का भी जिक्र होता तो त्रिपाठी जी और भी बढ़िया बोलते। त्रिपाठी जी के वक्तव्य से लग रहा था कि खाली चाय से बात नहीं बनी ) वैसे त्रिपाठी जी ने कहानी के विषय में जो कहा उससे मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि अपने उज्जवल भविष्य के लिए युवा कथाकारों को पाक कला में निष्णात होना चाहिए।

इसके आलावा इस कार्यक्रम को परिकथा के संपादक शंकर ने अपनी चरम मूर्खता से ‘महीनता'(?) के शिखर पर पहुंचा दिया था। उन्होंने जो कुछ अंड बंड बोला उसका सार यही था कि यह हिंदी कहानी का स्वर्ण काल चल रहा है। जैसा शानदार लिखा जा रहा है वैसा प्रेमचंद भी कभी नहीं लिख सकते थे, बाजारवाद से हिंदी साहित्य को बहुत फायदा हुआ है, बाजारवाद के कारण ही साहित्य को आज इतने लेखक और पाठक मिले हैं, प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना 1975 में हुई थी। आदि आदि। (उनके वक्तव्य पर मेरा मन किया कि वहीँ उन्हें पचास जूते मारूं या अपना सर फोड़ लूँ क्योंकि घूस के पैसे से साहित्यिक विवेक नहीं आता) और हाँ इस कहानी के निर्णायक असगर वजाहत ने अपने निर्णायक वक्तव्य में जो लिखा है उसमे भी उन्होंने इस कहानी के विषय में कुछ नहीं लिखा बल्कि यह बताया है कि कैसे लेखिका सलामी बल्लेबाज़ है और कैसे बैटिंग बॉलिंग करती है। असगर साहब का यह वक्तव्य भी हिंदी साहित्य के इतिहास में दर्ज किया जायेगा।

साहित्यकार और पत्रकार शशि भूषण द्विवेदी के फेसबुक वॉल से.

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