रंजन गोगोई कांड : आंख मूंदकर किसी को भी अपना नायक मत बनाया करो!

Deepak Goswami : रंजन गोगोई वही हैं न जिन्होंने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस की थी और अप्रत्यक्ष तौर पर दीपक मिश्रा पर सरकार समर्थक होने के आरोप लगाए थे. फिर वे आपकी नजर में क्रांति के अगुवा कहलाए थे. अब देखो वे स्वयं ही सरकार के द्वारा उपकृत करके राज्यसभा भेजे जा रहे हैं. इसलिए तो मैं हमेशा कहता हूं कि आंख मूंदकर किसी को भी अपना नायक मत बनाया करो. अक्सर जो दिखता है, वो होता नहीं. और जो होता है, वो दिखता नहीं.

Samarendra Singh : न्याय या धंधा! जज या धंधेबाज! अब भी कुछ भ्रम बचा है क्या? सबकुछ खुल्ले में हो रहा है। ये सब देश के लोकतंत्र की, देश की कह कर ले रहे हैं। वतन का खुलेआम सौदा हो रहा है। सरेआम नीलामी चल रही है। नेता लोग दुम दबाए एसी कमरों में बंद हैं। बीच बीच में किसी गली के कुत्ते की तरह बैठे बैठे भौंक लेते हैं। और हम सब यानी पब्लिक हवन करने में, भजन कीर्तन में व्यस्त हैं। तो क्या राम राज इसी को कहते हैं? क्या राम राज में इसी तरह खुलेआम इंसाफ का सौदा होता है?

Pankaj Shukla : एक नज़र इधर भी… काफी दबाव के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दिल्ली में हुए सिख नरसंहार मामले की जांच के लिए रंगनाथ मिश्र के नेतृत्व में एक सदस्यी आयोग का गठन किया था। रंगनाथ मिश्र ने 1987 में अपनी रिपोर्ट में कांग्रेस को क्लीन चिट देते हुए इसका सारा दोष दिल्ली के तत्कालीन उप राज्यपाल तथा पुलिस कमिश्नर के मत्थे मढ दिया था।

रंगनाथ मिश्र की उसी रिपोर्ट के बाद से उनके करियर को मानो पंख लग गया था। कांग्रेस पर किए गए इसी उपकार की बदौलत उन्हें न केवल सुप्रीम कोर्ट का 34वां मुख्य न्यायाधीश बनाया गया बल्कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का पहला चेयरमैन भी बनाया गया। इतना ही नहीं बाद में कांग्रेस सरकरा ने उन्हें अनुसूचित जाति जनजाति तथा अल्पसंख्यक आयोग का भी अध्यक्ष बना दिया गया। इतना ही नहीं सेवानिवृत्ति के बाद मिश्रा जी को कांग्रेस ने राज्यसभा में भी भेजा, और अंततः मिश्रा जी भी खुलकर सामने आना सही समझा और बकायदा कांग्रेस ज्वाइन कर ली.

(इसका मतलब यह नही कि गोगोई साहब के मनोनयन पर बहस गलत है, यह तथ्य उन लोगों के लिए सामने रखा है जो गोगोई को राज्यसभा भेजे जाने की खबर मिलने पर छाती पीट रहे हैं, गोगोई साहब को धिक्कार भेज रहे हैं.

इस पोस्ट को पढ़कर एक बड़े भाई ने फोन करके अच्छी मांग रखी, उनका कहना है कि मंदिर मामले में फैसला लेने वाले गोगोई के साथी जज साहबान की क्या गलती है, उन्हें भी तो कुछ दो-अरे राज्यसभा ना सही राज्यों में ही कही कुछ मिले. 🙂

पत्रकार दीपक गोस्वामी, समरेंद्र सिंह और पंकज शुक्ल की एफबी वॉल से.

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