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मैं आपको भारत के लोक सेवा प्रसारक ‘दूरदर्शन’ की हकीकत बताता हूं

दूरदर्शन केंद्र जयपुर में कैजुअल स्टाफ के हितों की रक्षार्थ… यूं तो हम सभी जानते हैं कि अधिकतर प्राइवेट कम्पनियों में कार्यरत मजदूरों का शोषण होता ही है परन्तु अगर सरकार के किसी संस्थान, विभाग में ऐसा हो तो बात खटकने की है। स्थिति बदतर तब होती है कि जब आर्थिक व सामाजिक  शोषण के साथ साथ संविधान विरूध्द कार्य शुरू हो जायें। मैं आपको भारत के लोक सेवा प्रसारक “दूरदर्शन” की हकीकत बताता हूं।

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दूरदर्शन केंद्र जयपुर में कैजुअल स्टाफ के हितों की रक्षार्थ… यूं तो हम सभी जानते हैं कि अधिकतर प्राइवेट कम्पनियों में कार्यरत मजदूरों का शोषण होता ही है परन्तु अगर सरकार के किसी संस्थान, विभाग में ऐसा हो तो बात खटकने की है। स्थिति बदतर तब होती है कि जब आर्थिक व सामाजिक  शोषण के साथ साथ संविधान विरूध्द कार्य शुरू हो जायें। मैं आपको भारत के लोक सेवा प्रसारक “दूरदर्शन” की हकीकत बताता हूं।

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दूरदर्शन केंद्रों में कार्य करने के लिए एक तो व्यवस्था है प्रशासनिक अधिकारियों व कर्मचारियों की। इसी तरह अभियांत्रिकी में भी अधिकारी व कर्मचारी कार्यरत हैं। इनके सहयोग या सीधे अर्थों में यू कहें कि इनका पूरा काम करने के लिए अनियमित कर्मचारियों की व्यवस्था भी है। अब अनियमित कर्मचारी को ऱखने की जो व्यवस्था है उसमें आते है आकस्मिक कलाकार जो कि असाइनमेंट आधार पर बुक किये जाते हैं। दूरदर्शन के जयपुर केन्द्र की हम बात करते हैं। दूरदर्शन केंद्र जयपुर में भी ऐसे ही अनियमित कर्मचारी, आकस्मिक कलाकार काम करते हैं।

उल्लेखनीय है कि प्राइवेट कम्पनियों में भी अगर कोई कैसे भी काम करता है तो उसकी हाजिरी, उपस्थिति जरूर होती है जबकि दूरदर्शन केंद्र जयपुर में इनकी कोई उपस्थिति नही की जाती और ना ही कोई हस्ताक्षर रहीं करने दिये जाते हैं। ये निम्न पदों पर निम्न काम करते हैं –

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1. पोस्ट प्रोडक्शन असिसंटेंट – इन्हें किसी कार्यक्रम के पोस्ट प्रोडक्शन के लिये बुक किया जाता है परन्तु इनके कार्य की प्रकृति वीडियो एडिटर की है, इन्हें प्रति असाइनमेंट 1980 रुपये दिये जाते हैं तथा एक कलैण्डर माह में अधिकतम 7 असाइनमेंट्स दिए जाते हैं।

2. वीडियो असिसंटेंट – इन्हें किसी कार्यक्रम में रिकोर्डिंग के लिए कैमरा सहयोग के लिये बुक किया जाता है इनके कार्य की प्रकृति कैमरामेन  की है, इन्हें प्रति असाइनमेंट 3300 रुपये दिये जाते हैं तथा एक कलैण्डर माह में अधिकतम 7 असाइनमेंट्स दिए जाते हैं।

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3. ग्राफिक असिस्टेंट  – इन्हें किसी कार्यक्रम के ग्राफिक पार्ट में सहयोग के लिये बुक किया जाता है लेकिन इनसे न्यूज व प्रोग्राम में स्क्रोल लिखने, नाम सूपर करने आदि कार्य करवाये जाते है, इन्हें प्रति असाइनमेंट 1650 रुपये दिये जाते हैं तथा एक कलैण्डर माह में अधिकतम 7 असाइनमेंट्स दिए जाते हैं।

4. रिसोर्स पर्सन – इन्हें किसी कार्यक्रम हेतु रिसोर्सेज जुटाने व सहयोग के लिए बुक किया जाता है परन्तु इनके कार्य की प्रकृति चपरासी के समान है, इन्हें प्रति असाइनमेंट 1650 रुपये दिये जाते हैं तथा एक कलैण्डर माह में अधिकतम 7 असाइनमेंट्स दिए जाते हैं।

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अब बात करते हैं पोस्ट प्रोडक्शन असिस्टेंट पद की। यूं तो इन आकस्मिक कलाकारों को एक कलैण्डर माह में अधिकतम 7 असाइनमेंट्स दिए जाते हैं। माह मार्च 2015 तक इनके रिकोर्ड में कार्य करने की अवधि 7 दिन दिखाई जाती थी और माह अप्रैल 2015 से इनके कार्य करने की अवधि 7 असाइनमेंट दिखाई जाती है जबकि इन लोग से पूरे माह 30 दिन कार्य करवाया जाता है। यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि अवधि का मतलब समय में आना चाहिये। 7 असाइनमेंट से अवधि साबित ही नही होती है। अब अगर कोई  इसके विरुध्द कुछ भी बोलता है या माँग करता है तो चूंकि आकस्मिक नियुक्ति होने के कारण उसे हटा दिया जाता है।

अब एक तो उनसे सात दिन का पैसा देकर पूरे महीने काम लिया जाता है जो कि आर्थिक शोषण है। उसके पश्चात भी उन लोगों को चार महीने पाँच महीने तक पेमेंट नही दिया जाता यह कहकर कि बजट नही है। या अन्य कोई कारण बताकर जिससे कार्मिक दबाव में बने रहें। इस संदर्भ में दो लोगों ने आवाज उठाई और जयपुर केन्द्र का प्रतिनिधित्व करते हुए पीएमओ, मंत्री, महानिदेशालय को इस बारे में सबने मिलकर पत्र लिखा व दिल्ली में महानिदेशक, दूरदर्शन से मिलकर आये।

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इससे जयपुर केंद्र के उच्चाधिकारी बौखलाकर उन्हें तरह तरह की धमकी देने लगे व दोनों को अकस्मात् निकाल दिया गया। तथा नवम्बर 2016 से फरवरी 2017 तक का उनका मानदेय भी नही दिया गया है। यह सब न्यायसंगत नहीं है तथा संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित आर्थिक न्याय व व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करने ( जो कि व्यक्ति के मूल अधिकारों में भी शामिल है) के प्रावधान को भी प्रभावित करता है। इसी क्रम में समान कार्य समान वेतन की अवधारणा भी प्रभावित हो रही है एवं इन सभी लोगों को विकट वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है।

उन दो लोगों के लिए जब बाकी के साथी खड़े हुए तो उन सभी से उच्चाधिकारियों ने जबरन नौकरी से हटाने की धमकी देते हुए एक पेपर पर यह लिखवा लिया गया कि हम यहां सीखने के लिए आते है और हमें दूरदर्शन केंद्र जयपुर में कार्य करते हुए कोई समस्या नही है पूर्व में लिखित पत्र भी झूठें हैं तथा हमें भ्रमित कर पत्र लिखवा लिया गया। इसके विरोध में व सच्चाई का साथ देने के लिए जब पोस्ट प्रोडक्शन असिस्टेंट्स ने पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए तो उन्हें नौकरी से हटा दिया गया।

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उनका इस तरह से हटाना औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 सेक्शन 25 (F) व औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 सेक्शन 25 (G) के प्रावधान को भी प्रभावित करता है। आप सोच सकते हैं कि ये सरकारी विभाग भी कैसे काम करते हैं। क्या ये मज़दूर इस देश के लोग नहीं हैं? क्या मज़दूर कोई गलत माँग कर रहे हैं? आप गंभीरता से सोचेंगे तो पता चलेगा कि भारत का लोक सेवा प्रसारक “दूरदर्शन” जो कि लोक कलाकारों व लोक सेवा के लिये काम करने हेतु बना है अगर वह इसी तरह कार्य करता रहा तो उसका इस देश और यहाँ की गरीब जनता से कुछ भी लेना-देना नहीं है।  उसका  लोकहित में कार्य करना सिर्फ ढ़ोल पीटना है। वास्तव में वह गरीबों और मजदूरों के शोषण का एक केंद्र है। वर्तमान में वे असहाय आकस्मिक कलाकार पोस्ट प्रोडक्शन असिस्टेंट्स – आठ लोग बेरोजगारी के इस समय में दर दर की ठोकरें खाने पर विवश हैं।

गिरीश शास्त्री व समस्त पोस्ट प्रोडक्शन असिस्टेंट्स (कैजुअल स्टाफ)
दूरदर्शन केंद्र, जयपुर
मोबाइल- 9461858766
ईमेल- [email protected]

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मूल खबर…

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