नेपाल के भूकंप पर भारतीय मीडिया का मृत्यु-प्रहसन, सोशल मीडिया में तीखी प्रतिक्रिया

नेपाल के भूकंप पर ख़बरों को भारतीय टेलीविज़न चैनलों ने जिस तरह पेश किया है, उससे सोशल मीडिया में तीखी प्रतिक्रिया है। रवीश कुमार लिखते हैं – ”नेपाल में ट्वीटर पर #gohomeindianmedia ट्रेंड तो कर ही रहा था और उसकी प्रतिक्रिया में भारत में भी ट्रेंड करने लगा है। मुझे इसकी उम्मीद बिल्कुल नहीं थी मगर कुछ तो था जो असहज कर रहा था। टीवी कम देखने की आदत के कारण मीडिया के कवरेज पर टिप्पणी करना तो ठीक नहीं रहेगा, लेकिन जितना भी देखा उससे यही लगा कि कई ख़बरों में सूचना देने की जगह प्रोपेगैंडा ज्यादा हो रहा है। ऐसा लग रहा था कि भूकंप भारत में आया है और वहां जो कुछ हो रहा है वो सिर्फ भारत ही कर रहा है। कई लोग यह सवाल करते थक गए कि भारत में जहां आया है वहां भारत नहीं है। उन जगहों की उन मंत्रियों के हैंडल पर फोटो ट्वीट नहीं है जो नेपाल से लौटने वाले हर जहाज़ की तस्वीर को रीट्विट कर रहे थे। फिर भी ट्वीटर के इस ट्रेंड को लेकर उत्साहित होने से पहले वही गलती नहीं करनी चाहिए जो मीडिया के कुछ हिस्से से हो गई है।”

नेपाल में आए भूकंप के बाद भारत के ‘ऑपरेशन मैत्री’ की जहां तारीफ हुई है, वहीं दूसरी ओर भूकंप की कवरेज और रिपोर्टिंग के तरीकों को लेकर भारतीय मीडिया भूकंप पीड़ित नेपाली लोगों के निशाने पर है । रविवार को पूरे दिन टि्वटर पर #GoHomeIndianMedia ट्रेंड करता रहा। इसमें इस हैशटैग के साथ भारतीय मीडिया पर असंवेदनशील रिपोर्टिंग का आरोप लगाते हुए तीखी टिप्पणियां की जा रही हैं। नेपाल के साथ-साथ अन्य सोशल मीडिया यूजर्स का कहना है कि भारतीय मीडिया एकतरफा कवरेज कर रही है। इन लोगों ने आरोप लगाया है कि भारतीय मीडिया की रिपोर्टिंग भारत सरकार के राहत और बचाव के इर्द-गिर्द है। खबर लिखे जाने तक इस हैशटैग से 65000 से ज्यादा बार रिट्वीट किया जा चुका है।

एक यूजर ने ट्वीट किया, ‘भारतीय मीडिया और उसके लोग ऐसे व्यवहार कर रहे हैं, मानो वे कोई पारिवारिक धारावाहिक शूट करने आए हों।’ वहीं एक दूसरे यूजर ने ट्वीट किया कि एक बड़े अंग्रेजी चैनल का रिपोर्टर एक महिला से पूछता है कि क्या उसका कोई मरा है? और उसके हां कहने के बाद वह यह सवाल दस बार करता है।

रवीश कुमार ने लिखा कि #gohomeindianmedia के संदर्भ में कहा जा रहा है कि नेपाल में कुछ लोग भारतीय पत्रकारों की रिपोर्टिंग से नाराज़ हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया के जग सुरैया और अजित निनान ने एक कार्टून भी बनाया जिसमें प्रधानमंत्री मोदी सुपरमैन की मुद्रा में खड़े हैं और उनके पीछे कई देशों से लौटे जहाज़ हैं। कार्टून में कहा गया है कि क्या आपको नहीं लगता कि हर मदद की तस्वीर देना कुछ ज्यादा नहीं हो रहा है। गीतकार और लेखक नीलेश मिसरा ने भी लिखा कि यह कुछ ज्यादा हो रहा है। भारत का प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है मगर उसका रीयल टाइम महिमामंडन ठीक नहीं है। तो मीडिया को लेकर आलोचना हमारे यहां भी हो ही रही थी। एक मई को मैंने इसी जगह पर एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था ‘काम कम फोटो ज्यादा’। उस लेख का संदर्भ हमारी राजनीति के फोटोग्रस्त हो जाना था लेकिन उसमें नेपाल भूकंप के संदर्भ में सूचनाओं की सीमाओं का भी ज़िक्र था। इन सबके ज़रिये समझने का प्रयास था कि कैसे हमारी डेमोक्रेसी कोरियोक्रेसी में बदलती जा रही है। सरकारी प्रवक्ता दिन रात इसी प्रकार की तस्वीरें ट्वीट कर रहे थे जैसे वहां मदद का काम सिर्फ भारत सरकार कर रही है। वायुसेना के जहाज़ों से चढ़ते-उतरे सामानों की तस्वीरें लगातार ट्वीट की जा रही थीं। पूरी त्रासदी को मदद के लिए पहुंचाए जा रहे रसद की गिनती में बदल दिया गया। कितनों को बचाया गया और कितने चक्कर जहाज़ ने लगाए ये सब ट्वीट हो रहा था।

किसी ने लिखा कि इंडियन मीडिया ने आईआईएन की डिग्री वालों को अपने यहां जर्नलिस्ट बना रखा है। एक ने लिखा कि आपने पीड़ित को अस्पताल पहुंचाने की एक सीट पर कब्जा कर लिया। बहुतों ने यह आरोप लगाया कि बजाय जिंदा बचे लोगों तक या ऐसे जगहों तक पहुंचने के, जहां अभी भी राहत सामग्री की जरूरत है, भारतीय मीडिया भूकंप पीड़ितों से सवाल कर रही है और उनके फुटेज दिखा रही हैं। कुछ नेपाली लोगों ने हालांकि बैलेंस बनाते हुए ट्विटर पर लिखा कि सिर्फ इंडियन मीडिया ही नहीं बल्कि जो भी उनके देश की संप्रभुता का ख्याल रखे बिना कुछ भी लिखेंगे, वह उनके खिलाफ हैं।

हिमाल साउथ एशियन के संपादक कनक मणि दीक्षित ने बीबीसी को बताया कि नेपाल में भारत के हिंदी न्यूज़ चैनल बहुत देखे जाते हैं और उन्हें देखकर नेपाल के लोगों को लग रहा है कि भूंकप को लेकर काफ़ी हो-हल्ला मचाया जा रहा है।

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