एक जूनूनी फारेस्ट गार्ड की कुर्बानी की सच्ची कहानी पर आधारित है फिल्म ‘वन रक्षक’

अजित राय-

कोरोना का संकट और वन रक्षक के सबक… यह समय आक्सीजन बचाने का है। आक्सीजन आता है पेड़ों से और दुनिया भर में विकास कार्यों के लिए पेड़ काटे जा रहे हैं। इसमें व्यापारी, राजनेता, सरकारी आफिसर सब शामिल हैं। एक नई बिरादरी पैदा हुई है जिसे वन माफिया कहते हैं। यदि हम सचेत नहीं हुए तो वह दिन दूर नहीं जब हमें अपने थैले में सांस लेने के लिए आक्सीजन की बोतल लेकर चलना पड़ेगा जैसे कि हम पानी की बोतल लेकर चलते हैं। जल, जंगल और हवा यानि पर्यावरण को बचाने के लिए दुनिया भर में आंदोलन हो रहे हैं। पवन कुमार शर्मा की नई फिल्म ‘वन रक्षक’ का नायक चिरंजीलाल चौहान ( धीरेन्द्र ठाकुर) बार बार कहता है कि यदि पर्यावरण को नहीं बचाया गया तो एक दिन धरती पर से हमारा जीवन खत्म हो जाएगा।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक (1989) पवन कुमार शर्मा की हिमाचली/हिंदी फिल्म ‘ वन रक्षक ‘ ऐसे समय में आई है जब सारी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है। कोरोना संकट के कारण लोगों की सांसें फूल रही है और आक्सीजन की कमी के कारण लोग मर रहे हैं। पवन कुमार शर्मा ऐसे अकेले फिल्मकार है जो हिमाचल प्रदेश में लगातार फिल्में बना रहे हैं। ‘ वन रक्षक ‘ उनकी तीसरी फिल्म है। इससे पहले उनकी दो फिल्में ‘ ब्रीणा’ और ‘ करीम मुहम्मद’ अपने अछूते विषय वस्तु के कारण चर्चित रही है।

हिमाचल प्रदेश में एक जूनूनी फारेस्ट गार्ड ( वन रक्षक) की कुर्बानी की सच्ची कहानी पर आधारित इस फिल्म का सिनेमाई मुहावरा ईरानी सिनेमा जैसा है और कुछ कुछ सामुदायिक सिनेमा जैसा जिसके लिए अलग से अभिनेताओं की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि अतिथि भूमिकाओं में यशपाल शर्मा, आदित्य श्रीवास्तव, राजेश जैस आदि को देखकर खुशी होती है। फिल्म के नायक चिरंजीलाल चौहान की भूमिका में बिहार के मधुबनी जिले से आए धीरेन्द्र ठाकुर और उनकी संगिनी बनी आंचल कुमारी की भूमिका में फलक खान की यह पहली ही फिल्म है। बाकी कलाकार हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के जंजैहली गांव के साधारण नागरिक है जहां इस फिल्म की शूटिंग हुई है।‌

चालीस साल की उम्र में फिल्म के नायक चिरंजीलाल चौहान का जीवन एक दिन अचानक बदल जाता है जब उसे फारेस्ट गार्ड की नौकरी मिल जाती है। इससे पहले वह परचून की दुकान चलाता था और अच्छी कमाई कर लेता था। उसके लिए यह नौकरी आजीविका से अधिक उसका वनों को बचाने का जूनून है। कालेज की पढ़ाई के दौरान उसे अपने इस जूनून की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी जब उसे लेडी प्रिंसिपल ने ही साजिश करके न सिर्फ कालेज से निकाल दिया था, साथ ही ऐसा इंतजाम कर दिया था कि उसे कहीं भी प्रवेश न मिल पाए और उसकी पढ़ाई हमेशा के लिए छूट गई थी। चिरंजीलाल कालेज के बगल में बनने वाली उस नई बिल्डिंग का विरोध कर रहा था जिसके लिए दो हजार पेड़ों को काटा जाना था। वह इस बात का भी विरोध कर रहा था कि पर्यावरण संरक्षण एक रस्म अदायगी बन कर रह गया है। उसका आईएएस अफसर बनने का सपना उसी समय टूट गया था।

फारेस्ट गार्ड की ट्रेनिंग के दौरान उसे अपनी ही तरह की जूनूनी लड़की आंचल कुमारी ( फलक खान) से दोस्ती हो जाती है जो धीरे धीरे प्यार में बदल जाती है। आंचल कदम कदम पर उसकी मदद करती है, हिम्मत बढ़ाती है और अपनी सूझ-बूझ से उसे साजिशों से बचाती है। आंचल का पूरा परिवार बादल फटने की दुर्घटना में मारा जा चुका है। ट्रेनिंग आफिसर अजय सिंह ( आदित्य श्रीवास्तव) को चिरंजीलाल से बड़ी उम्मीदें हैं। वह हमेशा उसकी हिम्मत बढ़ाता है। चिरंजीलाल बचपन में ही अपने पिता को खो चुका है। बंदूक से खेलते हुए उसके चाचा ने उसके पिता को मार डाला था और उसकी मां को मजबूर किया गया था कि वह पुलिस को सच न बताए। ट्रेनिंग के बाद जिस इलाके में चिरंजीलाल की पोस्टिंग होती है वहां वन माफिया सक्रिय है और वनो की अवैध कटाई धड़ल्ले से जारी है। अपने इकलौते बेटे को युद्ध में खो चुका बूढ़ा चपरासी देसराज ( राजेश जैस) ही उसका एकमात्र साथी है।

चिरंजीलाल, आंचल और देसराज एक ओर अपने अपने अकेलेपन से लड़ रहे हैं तो दूसरी ओर वन माफिया गठजोड़ के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। वे गांव वालों के साथ मिलकर दो हजार एकड़ में बनने वाले मनोरंजन पार्क परियोजना के लिए लाखों पेड़ों को कटने से बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। डिस्ट्रिक्ट फारेस्ट आफिसर ( यशपाल शर्मा) अप्रत्यक्ष रूप से उनकी मदद करता है। अंततः सरकार को जनता के विरोध के सामने झुकना पड़ता है और इस विनाशकारी परियोजना को रद्द करना पड़ता है। जिस दिन चिरंजीलाल और आंचल की शादी होनी है, उसी दिन रहस्यमय तरीके से चिरंजीलाल गायब हो जाता है। तीन दिन बाद उसका शव जंगल में एक पेड़ से लटका हुआ मिलता है।

पवन कुमार शर्मा ने न्यूनतम उपादानों में यह फिल्म बनाई है और प्रदीप एम गुप्ता का छायांकन फिल्म को मूल कथ्य से भटकने नहीं देता। कहानी, पटकथा और संवाद जीतेंद्र गुप्ता ने लिखा है। शुभा मुद्गल के साथ साथ हंसराज रघुवंशी, कुलदीप शर्मा और शक्ति सिंह जैसे हिमाचल प्रदेश के लोकप्रिय गायकों ने फिल्म में गीत गाए हैं। क्लोज अप शाट्स जान बूझकर बहुत कम रखे गए हैं जिससे फिल्म के सारे चरित्र जंगल, पहाड़, झरने, गांव और शहर से घुल-मिल जाते हैं। यह एक अलग तरह का सिनेमाई अनुभव है जो बिना किसी धूम धड़ाम के धीरे धीरे दर्शकों को अपने साथ लेकर आगे बढ़ता है। हिंसा और तनाव फिल्म के दृश्यों में नही है, समुचे पर्यावरण में है।

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