मीडिया में एकाधिकार और मीडिया हाउसों का कारपोरेट घरानों द्वारा अधिग्रहण भी पेड न्यूज की कैटगरी में शामिल

पेड न्यूज अर्थात प्रायोजित समाचार। इस गम्भीर मसले पर अंकुश लगाने के लिए  सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप पर भारत निर्वाचन आयोग द्वारा देश में राजनैतिक दलों या व्यक्तिगत रूप से चुनाव लड़ने वाले अभ्यर्थियों द्वारा सभी विज्ञापनों के मीडिया के जाने के पहले पूर्व दर्शन, संवीक्षण तथा सत्यापन के लिए एक समिति का गठन किया गया है जिसका नाम है ‘‘मीडिया प्रमाणन और अनुवीक्षण समिति’’ जिसे संक्षेप में एम0सी0एम0सी0 के नाम से कहा जा सकता है। पेड न्यूज पर नियंत्रण के लिए इस समिति के गठन के निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए। 

पेड न्यूज पर संविधान की सर्वोच्च संस्था यानि संसद के निर्देश पर संसद की सूचना प्रौद्योगिकी सम्बंधी अस्थायी समिति द्वारा गहरी जांच की गयी। इसके रिपोर्ट के अध्ययन से समाचारी दुनिया का जो स्याह पक्ष उभर कर आया है वह अत्यन्त चिंतनीय है। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े विभिन्न बिन्दुओं पर सहज ही ध्यान जाता है जिन पर गम्भीर चिंतन-मंथन की आवश्यकता है। अन्यथा लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का वजूद ही खतरे में पड़ सकता है। एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया कि पेड न्यूज के बारे में हम जितना जानते हैं वह बहुत कम है। इसका फैलाव अत्यन्त व्यापक है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि सन् 2004 से ही पेड न्यूज का चलन जारी है। जबसे मीडिया में पेड न्यूज का चलन हुआ है तबसे लगातार मीडिया अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है।

सर्वविदित है कि स्वतन्त्रता दैार की पत्रकारिता ऋषिप्रज्ञा से अनुप्राणित मनीषी पत्रकारों की तपस्या और बलिदान की महागाथा है। राष्ट्रीयता, राष्ट्रभाषा, लोकमंगल और पारदर्शी प्रमाणिकता के आदर्शो से संचालित उस पत्रकारिता के द्वारा ही अखबारो, पत्रिकाओं और पत्रकारों का समाज मे सम्मान और विश्वास स्थापित हुआ था। आज पेड न्यूज मे पड़ी मीडिया द्वारा समाज मे यह अज्ञान फैलाना कि ”वह जमाना दूसरा था, तब लड़ाई साम्राज्यवाद/अंग्रेजों से थी अब स्वराज है, इसलिए मीडिया को अब सरकार पर अधिक निगरानी रखने की जरूरत नहीं है”, वास्तव में पेड न्यूज को उचित ठहराने की कुटिल चाल है और उन राष्ट्र निर्माताओं के पुण्य चरित्र का अपमान भी, जिन्होंने अपनी पत्रकारिता की साधना से करोड़ो लोगों में उत्कट देश भक्ति का ज्वार पैदा किया था।

स्वतन्त्रता का जन्मसिद्ध अधिकार और सामाजिक बोध को जोड़कर पत्रकाारिता के सहारे दुनिया की सबसे ताकतवर ब्रिटिश हुकुमत को चुनौती दी थी। सच्चाई यह है भी कि जिसे साम्राज्य विरोधी संघर्ष कहकर एक दायरे मे सीमित कर दिया जा रहा है। वह संघर्ष अपने आप मे सम्पूर्ण था। उसमे राजनीतिक आजादी का जो सपना था वह एक मार्ग था। लक्ष्य था पूरी स्वतन्त्रता को पाने की जिसमे आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, अध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर की नींव पर नये ज्ञान के समाज की बुलन्द इमारत खड़ी की जा सके।

पेड न्यूज के बावत देश के अनेक वरिष्ठ पत्रकार एक मत है कि यह समझना भूल होगी कि सिर्फ चुनाव में ही प्रायोजित समाचार (पेड न्यूज) चलता व चलाया जाता है। अब यह अंशकालिक न होकर पूर्णकालिक हो चुका है। इसलिए अब इसके प्रकार को भी जानना और समझना जरूरी हो गया है। पेड न्यूज के कई प्रकार हैं। पहला चुनाव के दौरान का लेन-देन, दूसरा मीडिया और नेताओं की सांठ-गांठ,  तीसरा कारपोरेट घराने और राजनीतिकों का गठजोड़, चौथा एकाधिकारी घरानों की अपनी मनमानी, पांचवा प्रकार जो अभी नया है जिस पर अभी चर्चा भी कम हो रही है वह है गैर मीडिया घरानों का इस क्षेत्र मे खिलाड़ी बनकर उभरना, खासकर 2014 से मीडिया में जो अधिग्रहण के क्रम चल रहे है वे इसके उदाहरण हैं।

पहला अधिग्रहण टीवी18 के नेटवर्क का हुआ जिसे मुकेश अंबानी ने 28 मई 2014 को अंजाम दिया। इस रिपोर्ट में बड़े मीडिया कारपोरेट घरानों के तमाम ऐसे उदाहरण हैं जो लोकतन्त्र को बीमार बनाने की क्षमता रखते हैं। जाहिर है कि गैर मीडिया कारपोरेट घराने इस लिए मीडिया में आ रहे हैं कि वे सत्ता को अपने चंगुल मे फंसा सकें। पेड न्यूज का यह विस्तार है जिस पर चिन्ता किया जाना स्वाभाविक है। यह रिपोर्ट आंख खोलने वाली है कि भारत सरकार के पंजीयन कार्यालय मे एक लाख से अधिक पत्र-पत्रिकाएं पंजीकृत है किन्तु रिपोर्ट के अनुसार कुछ ही चुनिन्दा मीडिया घराने ही हैं जो छाये हुए हैं। वे केवल बाजार पर ही नहीं छाये हुए हैं बल्कि उनका प्रभाव विस्तार अनन्त दिखता है।

पत्रकारिता अधिकतम पारदर्शिता का पर्याय है। पेड न्यूज ने उसे गुफाओं के अज्ञात रहस्य में बदल दिया है। जब मीडिया को अपने बारे में ही बहुत कुछ छिपाना हो तो कैसे यह उम्मीद की जा सकती है कि वह स्वतन्त्र और निष्पक्ष खबरें देगा। यही वह मूल सवाल है जो पेड न्यूज से जुड़ा है और जिस पर यथा शीघ्र अंकुश लाजिमी है। रिपोर्ट में ही है कि क्या एक ही मीडिया घराने को अखबार, चैनल, इन्टरनेट, रेडिया आदि सभी प्रकार के जनसंचार माध्यमों को चलाने का अधिकार होना चाहिए? अगर इसकी इजाजत दी जाती है तो एक ओर जहां एकाधिकार के खतरे बढ जाते है वहीं दूसरी ओर विविधता का लोप हो जाना स्वाभाविक है। रिपोर्ट से पेड न्यूज के खतरनाक चेहरे को देखा समझा जा सकता है। आवश्यकता है ठोस कदम उठाने की तभी लोकतन्त्र की सांस को टूटने से बचाए रखना सम्भव हो पायेगा।

शिवेन्द्र पाठक
स्वतंत्र पत्रकार
गाजीपुर
मो0नं0- 9415290771
pathakgzp92@gmail.com

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