मालिकों ने पेड न्यूज से कितना डकारा, कोई हिसाब नहीं! ईमानदारी-एथिक्स सिर्फ छोटे पत्रकारों के लिए

एथिक्स, ईमानदारी और मिशनरी पत्रकारिता सिर्फ छोटे पत्रकारों के लिए… पत्रकारिता अब अजीब पहेली है। संपादक अब खबरों के लिए कम और मालिकों के लिए ज्यादा काम करते हैं। अधिकांश अखबारों व चैनलों के संपादक विवादित हैं। स्वच्छ छवि के संपादक अब नजर नहीं आते हैं। मसलन हर अखबार का एडिशन निकालने के पीछे मालिकों …

भारत के मीडिया घराने अब पत्रकारों की बजाय मैनेजरों के हाथों में हैं!

योगी आदित्‍यनाथ ने बजरंग बली को लोकदेवता, वनवासी, गिरवासी, दलित और वंचित भी बताया, लेकिन मीडिया को बेचे जाने लायक ‘माल’ केवल ‘दलित’ शब्‍द में नजर आया…. इसके बाद शुरू हो गई पीसीआर से इस खबर और शब्‍द पर ‘खेलने’ की तैयारी… लखनऊ। क्‍या भारत का शीर्ष मीडिया पत्रकारों की बजाय मैनेजरों के हाथ में …

बड़े मीडिया हाउसों के पास है बड़े कारपोरेट घरानों का निवेश और सरकार का समर्थन : सिद्धार्थ वरदराजन

DUJ SEMINAR ON ‘DEMOCRACY IN DANGER : UNETHICAL REPORTING / ATTACKS ON INDEPENDENT JOURNALISM AND JOURNALISTS’

In a sharp counter to the BJP Sangh Parivar’s campaign, Kerala Chief Minister Pinarayi Vijayan said the state has been targeted as it champions the values of secularism, socialism and democracy. He was speaking at a function organized by the Delhi Union of Journalists in the national capital on ‘Democracy in Danger : Unethical Reporting/ Attacks on Independent Journalism and Journalists’ on 15 October at Kerala House. The Chief Minister said slogans like ‘Love Jehad’ have been used to disrupt the state’s centuries old communal harmony but the RSS will not succeed in its game plan. He slammed several media houses for ferociously targeting Kerala and congratulated those journalists who are standing up for the truth despite pressure from employers.

अमित शाह की संपत्ति और स्मृति इरानी की डिग्री वाली खबरें टीओआई और डीएनए से गायब!

Priyabhanshu Ranjan : स्मृति ईरानी भी कमाल हैं। 2004 के लोकसभा चुनाव के वक्त अपने हलफनामे में अपनी शैक्षणिक योग्यता B.A बताती हैं। 2017 के राज्यसभा चुनाव में अपने हलफनामे में खुद को B. Com. Part 1 बताती हैं। 2011 के राज्यसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने खुद को B. Com. Part 1 ही बताया था। बड़ी हैरानी की बात है कि 2004 में खुद को B.A बताने वाली स्मृति जी 2011, 2014 और 2017 में खुद को B. Com. Part 1 बताती हैं।

मीडिया हाउसों ने अमित शाह की 300 गुना संपत्ति बढ़ने वाली खबर डिलीट कर दी! (देखें मेल)

Sheetal P Singh : मीडिया दंडवत नहीं बल्कि “डागी” में बदल गया है. जी न्यूज़ चलाने वाले मैनेजमेंट को बाकायदा निर्देश मिले, जिसका उन्होंने बाकायदा पालन किया. बाद में सारे मीडिया ने किया.  निर्देश था कि काली दाढ़ी उर्फ़ अमित शाह की ३०० गुना संपत्ति वृद्धि की खबर तत्काल हर जगह (पोर्टल / टीवी आदि ) से हटा ली जाय.

खुद अपनी तारीफ लिख और इसे विज्ञापन के रूप में छपवा कर मुकेश सिंह नामक शख्स साहित्यकार बन गया!

लोग जाने कौन कौन सा रोग पाल लेते हैं. खासकर वे लोग जो पैसा तो कमा लिए हैं, पर उनके दिल की कामना पूरी नहीं हुई. किसी की इच्छा साहित्यकार बनने की होती है तो किसी की सेलिब्रिटी. ऐसे में ये लोग अपनी आरजू के लिए भरपूर पैसा बहाकर खुद से ही खुद को साहित्यकार / सेलिब्रिटी घोषित कर लेते हैं.

क्या एएनआई वाले खबर के नाम पर पैसा लेते हैं?

ANI न्यूज़ एजेंसी खबरें बनाने के लिए भी पैसा लेती है… इसका खुलासा कल सहारनपुर में उनके एक रिपोर्टर ने कर दिया.. दरअसल ANI ने सहारनपुर में अभी अमित विश्वकर्मा नाम के एक रिपोर्टर को नियुक्त किया है.. कल कुछ व्यपारियों ने अपनी समस्या बताते हुए उससे खबर बनाने की प्रार्थना की…

पैसे देकर पुलिस वालों के खिलाफ मजेदार विज्ञापन छपवा लिया और फंस गए अखबार के संपादक जी

उज्जैन के एक सांध्य दैनिक के संपादकों के खिलाफ पुलिस अधिकारियों की छवि खराब करने समेत कई धाराओं में हुआ मुकदमा… उज्जैन में एक सांध्य दैनिक अखबार ने एक विज्ञापन प्रकाशित किया. इस विज्ञापन में उज्जैन में सट्टा व्यापार के सफल संचालन के लिए उज्जैन सटोरिया संघ ने मध्य प्रदेश पुलिस का आभार जताया है. विज्ञापन में बाकायदा एमपी पुलिस के डीजीपी ऋषि कुमार शुक्ला, एडीजी मधुकुमार और उज्जैन एसपी मनोहर एस. वर्मा की तस्वीर भी प्रकाशित की गई है. इस विज्ञापन को देखकर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी परेशान हो गए. बाद में पुलिस ने अखबार के प्रधान संपादक और कार्यकारी संपादक के खिलाफ मुकदमा लिख दिया.

विपक्ष के हर मुद्दे और आरोप पर जवाब देने के लिए न्यूज चैनल एड़ी-चोटी का जोर लगा देते हैं!

Ashwini Kumar Srivastava : भाजपा को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती… विपक्ष के हर मुद्दे और आरोप पर जवाब देने के लिए मीडिया ही एड़ी-चोटी का जोर लगा देता है… अब देखिये, जैसे ही मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ईवीएम पर अपने आरोपों को दोहराया, ऐन उसी वक्त टीवी चैनलों पर ईवीएम को अभेद्य साबित करने के लिए होड़ मच गयी…

सारे न्यूज़ चैनल भाजपा के जरखरीद गुलाम बन गए हैं!

Dayanand Pandey : कि पेड न्यूज़ भी शरमा जाए…. आज का दिन न्यूज़ चैनलों के लिए जैसे काला दिन है, कलंक का दिन है। होली के बहाने जिस तरह हर चैनल पर मनोज तिवारी और रवि किशन की गायकी और अभिनय के बहाने मोदियाना माहौल बना रखा है, वह बहुत ही शर्मनाक है। राजू श्रीवास्तव, सुनील पाल आदि की घटिया कामेडी, कुमार विश्वास की स्तरहीन कविताओं के मार्फ़त जिस तरह कांग्रेस आदि पार्टियों पर तंज इतना घटिया रहा कि अब क्या कहें।

TOI का पेड न्यूज : इससे ज्यादा बिकी हुई राजनीतिक खबर आज तक नहीं पढी

Chandan Srivastava : कुछ पैसे लेकर The Times of India ने आज एक पेड न्यूज अयोध्या विधानसभा से बसपा प्रत्याशी के समर्थन में छापी है। इस पेड न्यूज में मतदाताओं के बयान कुछ इस प्रकार छपे हैं-

मीडिया में एकाधिकार और मीडिया हाउसों का कारपोरेट घरानों द्वारा अधिग्रहण भी पेड न्यूज की कैटगरी में शामिल

पेड न्यूज अर्थात प्रायोजित समाचार। इस गम्भीर मसले पर अंकुश लगाने के लिए  सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप पर भारत निर्वाचन आयोग द्वारा देश में राजनैतिक दलों या व्यक्तिगत रूप से चुनाव लड़ने वाले अभ्यर्थियों द्वारा सभी विज्ञापनों के मीडिया के जाने के पहले पूर्व दर्शन, संवीक्षण तथा सत्यापन के लिए एक समिति का गठन किया गया है जिसका नाम है ‘‘मीडिया प्रमाणन और अनुवीक्षण समिति’’ जिसे संक्षेप में एम0सी0एम0सी0 के नाम से कहा जा सकता है। पेड न्यूज पर नियंत्रण के लिए इस समिति के गठन के निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए। 

अखिलेश यादव संग साइकिल चलाते राहुल कंवल का चमचई भरा इंटरव्यू पेड न्यूज़ ही तो है!

अखिलेश यादव के साथ साईकिल चलाते हुए ‘आज तक’ के राहुल कंवल का आधा घंटे का चमचई भरा इंटरव्यू करना क्या पेड न्यूज़ में नहीं आता? साईकिल पर ही बैठे हुए डिंपल यादव का इंटरव्यू करना भी। गोमती रिवर फ्रंट का भी प्रचार। [वैसे गोमती रिवर फ्रंट बहुत सुंदर बना दिख रहा है।]

मीडिया ने बसपा और मायावती जैसी कद्दावर ताकत को चुनावी लड़ाई से बाहर कर दिया!

Ashwini Kumar Srivastava : अद्भुत है मीडिया और उसमें काम कर रहे तथाकथित पत्रकार। वरना बसपा और मायावती जैसी कद्दावर ताकत को ही इस बार के चुनाव में लड़ाई से बाहर कैसे कर देता! वैसे मुझे तो इसका कोई आश्चर्य नहीं है। क्योंकि एक दशक से भी ज्यादा वक्त तक दिल्ली और लखनऊ में देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थानों में बतौर पत्रकार नौकरी करने के बाद मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि ख़बरें और सर्वे कैसे बनाये-बिगाड़े जाते हैं। इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण भी मैं अपने ही निजी अनुभव से आगे बताऊंगा। लेकिन सबसे पहले बात बसपा और मायावती की करते हैं।

हिंदुस्तान अखबार में ‘पेड एडिटोरियल’ : कथित अच्छे दिनों में पत्रकारिता के भयंकर बुरे दिन!

 

आज के दैनिक हिन्दुस्तान में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने एक लेख लिखा है। हिन्दी में उनके नाम के साथ छपा है। इस सूचना के साथ कि ये उनके अपने विचार हैं। एडिट पेज पर प्रकाशित इस लेख के साथ अमित शाह की जो फोटो लगी है वह छोटी है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भी फोटो लगाई गई है जो लेखक की फोटो से बड़ी है। वैसे ही जैसे मैं नैनीताल पर कुछ लिखूं तो मेरी फोटो रहे ना रहे, नैनी झील की फोटो बड़ी सी जरूर लगेगी। अगर मेरी तुलना गलत नहीं है तो फोटो छपना और उसका बड़ा छोटा होना भी गलत नहीं है।

राज्यसभा में गूंजा ‘पेड न्यूज’ मुद्दा, खबर और विज्ञापन में अंतर करने के लिए नियम बनाने की मांग

राज्यसभा में लगभग सभी सदस्यों ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर पेड न्यूज के मुद्दे पर गंभीर चिंता जताई और इससे निपटने के लिए नियम बनाये जाने की मांग की। राज्यसभा सदस्यों ने मंगलवार को ‘पेड न्यूज’ पर चिंता जताई और इस मुद्दे को सुव्यवस्थित बहस के लिए उठाने का फैसला किया है। भारतीय जनता पार्टी के नेता विजय गोयल ने शून्य काल में यह मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि पेड न्यूज से मीडिया की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है। कांग्रेस नेता आनंद शर्मा, जनता दल (युनाइटेड) के नेता शरद यादव और के.सी. त्यागी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता सीताराम येचुरी सहित विभिन्न दलों के नेताओं ने दलगत भावना से ऊपर उठकर उनका समर्थन किया।

यह अखबार मालिक रोज सड़क पर बैठ कर प्रेस कार्ड की दुकान चलाता है

बनारस में एक सज्जन हैं जो ‘दहकता सूरज’ नामक अखबार के मालिक हैं. बुढ़ापे में जीवन चलाने के लिए ये अब रोज सुबह सड़क पर बैठ जाते हैं और दिन भर अपने अखबार का प्रेस कार्ड बेचते रहते हैं. रेट है पांच सौ रुपये से लेकर हजार रुपये तक. ये महोदय खुद को पत्रकार संघ का पदाधिकारी भी बताते हैं. कई लोगों को इनके इस कुकृत्य पर आपत्ति है और इसे पत्रकारिता का अपमान बता रहे हैं लेकिन क्या जब बड़े मीडिया मालिक बड़े स्तर की लायजनिंग कर पत्रकारिता को बेचते हुए अपना टर्नओवर बढ़ा रहे हैं तो यह बुढ़ऊ मीडिया मालिक अपना व अपने परिवार का जीवन चलाने के लिए अपने अखबार का कार्ड खुलेआम बेच रहा है तो क्या गलत है?

टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादकों ने तो शर्म भी बेच दी

Dhiraj Kulshreshtha : आज टाइम्स ऑफ इंडिया में संपादकीय पेज पर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का लीड आर्टिकल छपा है…..यह आर्टिकल अखबार और राजनेता दोनों की गिरावट का बेहतरीन नमूना है… ‘अ रिवोल्यूशन इन सब्सिडीज’ यानि आर्थिक सहायता में क्रांति…के हैडिंग से छपा यह लीड आलेख सरकार के विभिन्न विभागों की संयुक्त सालाना रिपोर्ट से ज्यादा कुछ नहीं है…जिसे वसुंधरा राजे नहीं बल्कि नौकरशाह तैयार करते हैं, और जनसंपर्क विभाग विज्ञप्ति के रूप में जारी करता है….पर बहुप्रतिष्ठित अखबार के संपादकजी क्या कर रहे हैं…अगर सेटिंग (मार्केटिंग) के तहत इस विज्ञप्ति को छापना ही था, तो अखबार के किसी भी पेज पर छाप सकते थे।

फेसबुक अपनी तरफ से कर रहा मेरा प्रचार, मैंने एक पैसा खर्च नहीं किया : बरखा दत्त

बरखा दत्त के स्पांसर्ड फेसबुकी पेज के बारे में भड़ास4मीडिया पर छपी खबर को लेकर ट्विटर पर बरखा दत्त ने अपना बयान ट्वीट के माध्यम से जारी किया. उन्होंने लोगों के सवाल उठाने पर अलग-अलग ट्वीट्स के जरिए जवाब देकर बताया कि उनकी बिना जानकारी के फेसबुक उनके पेज को अपने तरीके से प्रमोट कर रहा है. उन्होंने बताया कि फेसबुक की तरफ से उनके पास फोन आया था जिसमें ट्विटर की तरह एफबी पर भी सक्रिय होने के लिए अनुरोध किया गया. तब मैंने उन्हें कहा कि कोशिश करूंगी. ऐसे में एक भी पैसा देने का सवाल ही नहीं उठता. बिलकुल निराधार खबर भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित हुई है. 

पैसे वाली पत्रकार हैं बरखा दत्त, फेसबुक लाइक तक खरीद लेती हैं!

Yashwant Singh : बरखा दत्त इन दिनों फेसबुक पर खूब सक्रिय हो गई हैं. उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर इस बाबत लिखा भी है. साथ ही कई कहानियां किस्से विचार शेयर करना शुरू कर दिया है. बरखा समेत ज्यादातर अंग्रेजी पत्रकारों की प्रिय जगह ट्विटर है. लेकिन सेलेब्रिटी या बड़ा आदमी होने का जो नशा होता है, वह फेसबुक पर भी ले आता है, यह जताने दिखाने बताने के लिए यहां भी मेरे कम प्रशंसक, फैन, फालोअर, लाइकर नहीं हैं. सो, इसी क्रम में अब ताजा ताजा बरखा दत्त फेसबुक पर अवतरित हुई हैं और अपने पेज पर लाइक बढ़ाने के लिए फेसबुक को बाकायदा पैसा दिया है. यही कारण है कि आजकल फेसबुक यूज करने वाले भारतीयों को बरखा दत्त का पेज बिना लाइक किए दिख रहा है. पेज पर Barkha Dutt नाम के ठीक नीचे Sponsored लिखा है.

यह देखिए हरियाणा के मुख्यमंत्री की खबर हिन्दुस्तान टाइम्स, दिल्ली में विज्ञापन की शक्ल में

Sanjaya Kumar Singh : यही अच्छे दिन हैं क्या। पर किसके लिए? ना खाउंगा ना खाने दूंगा तो ठीक है। पर जायज पैसे भी नहीं देंगे और अपनी मर्जी से दान के पैसे उड़ाएंगे – यह कैसे ठीक हो सकता है। यह देखिए हरियाणा के मुख्यमंत्री की खबर हिन्दुस्तान टाइम्स, दिल्ली में विज्ञापन की शक्ल में। यह खबर है और खबर के रूप में छप सकती थी, छपनी चाहिए थी और छपवाने के लिए जारी की जानी चाहिए थी। नहीं छपती तो इसमें ऐसा कुछ नहीं है कि पैसे खर्च कर विज्ञापन के रूप में छपवाया जाए। चंदे के पैसे विज्ञापन में उड़ाने का कोई मतलब नहीं है।

भाजपा की महिला विधायक ने चुनाव के दौरान हर पत्रकार को भिजवाया था 11 हजार रुपये का लिफाफा

राजस्थान के अनूपगढ़ से बीजेपी विधायक शिमला बावरी ने दावा किया है उन्होंने 2013 विधानसभा चुनाव से पहले अनूपगढ़ क्षेत्र के हर पत्रकार को ‘रुपयों का लिफाफा’ भिजवाया था. ये लिफाफे अनूपगढ़ के साथ-साथ घड़साना रावला के पत्रकारों को भी भेजे गए थे. शिमला बावरी ने बताया कि तीन पत्रकारों ने यह कहते हुए पैसे लौटा दिए कि चुनाव जीतने के बाद वे इसे ले लेंगे. इस कार्यक्रम में एसडीएम, नगरपालिका चेयरमैन ईओ समेत कई लोग मौजूद थे.

पंजाब केसरी के मालिक का हाल देखिए, मोदी के सामने हाथ बांधे डरते कांपते खड़े हैं!

ये हैं बीजेपी के सांसद और पंजाब केसरी अखबार के मालिक. क्या हाल है बिकी हुई मीडिया का, खुद ही देखिये.  जब अख़बारों / चैनलों के मालिक / संपादक लोग अपनी पूरी उर्जा लोकसभा / राज्यसभा की सीट और पद्मभूषण आदि के लिये खर्च करते हुए इस चित्र में दिखाई मुद्रा में जा पहुंचें हों तब मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खम्भा कैसे माना जा सकता है? ये तो सत्ता के चारणों की मुद्रा है.

आशीष खेतान के लिखे पेड न्यूज पर ‘तहलका’ को तीन करोड़ रुपये मिले थे!

इन दिनों आम आदमी पार्टी के नेता आशीष खेतान जब तहलका मीडिया हाउस में पत्रकार हुआ करते थे तो उन्होंने एस्सार कंपनी के पक्ष में पेड न्यूज लिखा था. इस पेड न्यूज के एवज में तहलका को तीन करोड़ रुपये मिले थे. ये आरोप लगाए हैं ‘आप’ के बागी नेता प्रशांत भूषण ने. उन्होंने पार्टी नेता आशीष खेतान पर सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा कि 2 जी मामले में खेतान ने एस्सार के समर्थन में लेख लिखा था, जिसके एवज में तहलका को तीन करोड़ रुपए मिले थे.

Paid news in India and underpaid media employees

Whenever India runs an electoral battle, the ‘paid news’ syndrome in radio and television continues to haunt the general populace, as well as the election authority. A number of cases are already registered against various political parties for allegedly bribing some selected media houses of the largest democracy in the world or for facilitating campaign related favourable coverage in expenses of cash (or kind).

दस-दस हजार रुपये लेकर अमर उजाला और दैनिक जागरण के रिपोर्टरों ने छपवाई झूठी खबर!

एटा (उ.प्र.) : जिले के मिरहची थाना क्षेत्र के गाँव जिन्हैरा में 70 वर्षीय एक व्यक्ति की बीमारी के चलते स्वाभाविक मौत हो गई, लेकिन अमर उजाला और दैनिक जागरण ने तो कमाल ही कर दिया। स्वाभाविक मौत को मौसम के पलटवार से फसल बर्बाद होने के सदमे से किसान की मौत होना दर्शा दिया। ऐसा करना उनकी कोई मजबूरी नहीं थी बल्कि इस तरह से खबर प्रकाशित करने के एवज में दस-दस हज़ार रुपये मिले थे। धिक्कार है, ऐसी पत्रकारिता पर! मीडिया पर कलंक हैं ऐसे पत्रकार!

हिलाने वाले पत्रकारों की खुद की कुर्सियां क्यों हिलने लगी?

आमतौर पर खोजी पत्रकारिता नेताओं की कुर्सियाँ हिलाती है, लेकिन पिछले सप्ताह भारतीय समाचारपत्र, ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में एक ख़बर छपने के बाद से अब पत्रकारों की कुर्सियाँ हिल रही हैं. ख़बर के मुताबिक़ कई पत्रकार एस्सार नाम की कंपनी के ख़र्चे पर टैक्सी जैसे फ़ायदे उठाते रहे हैं. आरोप मामूली हैं, लेकिन फिर भी अनैतिकता स्वीकारते हुए एक महिला और एक पुरुष संपादक ने अपने-अपने अखबारों से इस्तीफ़ा दे दिया है. एक टीवी समाचार चैनल में काम करने वाली एक और महिला पत्रकार को आंतरिक जाँच के चलते काम से हटा दिया गया है.

लॉ छात्रा से दरिंदगी की खबर दबाने पर हिंदुस्तान के छायाकार की छुट्टी, क्राइम रिपोर्टर के खिलाफ जांच जारी

दो सप्ताह पूर्व मेरठ स्थित जाग्रति विहार के अमन हॉस्पिटल में आधा दर्जन युवकों द्वारा लॉ की छात्रा से हैवानियत के मामले की खबर हिन्दुस्तान समाचार पत्र के लिए बड़ी नहीं थी। खबर को मैनेज करने वाले छायाकार राहुल राणा को प्रबन्ध तंत्र ने अपनी फजीयत से बचने के लिए जहां बाहर का रास्ता दिखा दिया है, वही क्राईम रिपोर्टर सलीम के खिलाफ जांच बैठा दी है। मेरठ के अमन हॉस्पिटल में छः दरिंदों द्वारा लॉ की छात्रा के साथ हैवानियत की थी सूचना पर हिन्दुस्तान समाचार पत्र का क्राईम रिपोर्टर सलीम अपने साथी छायाकार राहुल राणा के साथ मौके पर पहुंचा।

अजमेर से निकलने वाले दैनिक भास्कर को क्या हो गया है? जरा इस न्यूज को तो देखिए

: मंत्री के सादगी से मनाए जन्मदिन में दो हजार का जीमण? : अजमेर से निकलने वाले दैनिक भास्कर को क्या हो गया है? खबर बनाते, उसका सम्पादन करते, पेज जांचते समय कोई यह देखने वाला नहीं है कि खबर क्या जा रही है। एक-दो साल पुरानी खबरों को ज्यों की त्यों छापने से भी जब पेट नहीं भरा तो अब भास्कर ने सारे शहर की आंखों में धूल झोंकने का काम शुरू कर दिया है। रविवार, 11 जनवरी 2015 का दिन था। वसुंधरा सरकार के एक मंत्री का जन्मदिन। मंत्री ने एक दिन पहले सारे अखबारों को प्रेस नोट भिजवा दिया, मंत्री जी सादगी से मनाएंगे जन्मदिन। पत्रकारों को मंत्री ने खुद फोन किया। गद्गद पत्रकार नतमस्तक हो गए। अब जरा मंत्री की सादगी पर गौर कीजिए।

पत्रकारिता के लिए साल का आखिरी दिन चेतावनी भरा रहा, आप लोगों के मरने पर अखबारों में एक लाइन की भी खबर न छपे

: मीडिया को पुनर्जीवित करने का अभियान : मीडिया में अब मामला पेड न्यूज भर का नहीं रहा है। कई अखबार तो खबरें भी उन्हीं की छापते हैं, जो पैसा देते हैं। पूरे के पूरे अख़बार, सप्लीमेंट्स ही पेड हो गए हैं। छोटे- बड़े , कई – कई यही काम कर रहे हैं। चैनलों के ब्यूरो के ब्यूरो खुले आम नीलाम हो रहे हैं। पैसा लाओ , जो छापना है छापो; जो दिखाना है दिखाओ। राजनीतिक दल और सरकारें भी मीडिया को गुलाम बनाने पर तुली हैं। नाहक नहीं है कि प्रेस कौंसिल के चेयरमैन कह रहे हैं कि मीडिया आम अवाम की आवाज दबाने की साज़िश का हिस्सा हो गया है। इस सन्दर्भ में एक रपट…