अपनी नाकामी छिपाने के लिए गांधी-जगजीवन की निंदा करते हैं दलित!

-इं राजेन्द्र प्रसाद-

आज गाँधी की निंदा और उनके विरुद्ध अपशब्दों का प्रयोग करने वाले दलित नेताओं और उनके युवा अनुयायियों की संख्या बढ़ रही है। वे अपनी सभी समस्याओं के निदान में बाधक पूना-पैक्ट को मानते हैं। कुछ लोग जोर-शोर से ऐसा ही दुष्प्रचारित भी करते हैं। ऐसे लोगों में से अधिकतर पूना-पैक्ट की धाराओं को न तो जानते हैं और न जानने-समझने की चेष्टा करते हैं। उनका एकमात्र काम दलितों के बीच गाँधी की निन्दा करना होता है। आज गाँधी की निन्दा की बजाय गाँधी के समग्र कार्यों की समीक्षा की जानी चाहिए। साथ ही दलित अपने कथनी-करनी का भी आकलन करें। तभी हम गाँधी का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन कर सकते हैं। अन्यथा यह एकतरफा गैर-जिम्मेदाराना वक्तब्यों के अलावा और कुछ नहीं है।

गाँधी की आलोचना सकारात्मक होनी चाहिए, केवल विरोध के लिए नहीं, बल्कि कुछ करने के लिए। योजनाएं बनाकर कार्य करने और समाज में उपलब्धि प्राप्त करने के लिए। सिर्फ अपनी अकर्मण्यता को छुपाने के लिए, अपनी दायित्वहीन प्रवृत्ति को ढंकने के लिए गाँधी की आलोचना करना दलित समाज को नीचे ले जाएगा। यह उसी प्रकार की बात होगी, जिस प्रकार बड़ी जाति वाले अपने सभी दोषों को छोटी जाति वालों के मत्थे मढने का कार्य करते हैं। हमें इसका आत्म अवलोकन करना चाहिए।
    
यह सत्य है कि दलितों के राजनीतिक प्रतिनिधि पाँच वर्ष के लिए सवर्णों की इच्छा पर ही चुने जाते हैं। इसलिए सवर्णों का दबाव उनपर रहता है। माना कि वोट के लालच या भय से ये गुलामीगिरी करते हैं। अधिकतर बेशर्मीपूर्वक दलित हित के विरुद्ध कार्य करते हैं। लेकिन दलितों के प्रशासनिक प्रतिनिधियों पर ऐसा कोई दबाव नहीं होता है। वे एक बार नियुक्त होने के बाद सेवानिवृत्ति तक कार्यरत रहते हैं। वे सामान्यतः 30-40 वर्ष तक कार्यरत रहते हैं। फिर क्यों वे अपने समाज के हितों के प्रतिकूल कार्य करते हैं? कुछ अपवाद जरूर है, पर अधिकतर ऐसे ही हैं। सवर्णों के काम उनके भय अथवा प्रलोभन में ये कर देते हैं। उनके गलत कार्यों को भी करने में नहीं हिचकिचाते हैं। लेकिन ये दलितों के सही कामों को करने में भी कई कई बार आगा पीछा सोचते हैं। प्रशासनिक प्रतिनिधियों पर पूना पैक्ट का कोई दखल नहीं है। इसमें कम्यूनल अवार्ड को जस का तस स्वीकार किया गया था। फिर भी दलित अधिकारी दलितों को न्याय नहीं दे पाते हैं। कारण क्या है?

यह एक ज्वलंत प्रश्न है जिस पर विचार करने की आवश्यकता है। कहीं तो कोई बुनियादी खराबी है। ये 30-40 साल तक सेवारत सरकारी सेवक क्यों नहीं अपने कलम की धार तेज कर पाते हैं? ये बाबा साहब के ‘पे बैक टू सोसाईटी’ के वसूलों पर अमल क्यों नहीं करते हैं? क्या दलितों का भला करने की जिम्मेदारी सिर्फ विधायिका की बनती है और कार्यपालिका केवल अपने परिवार की मौज मस्ती के लिए है? जब आरक्षित वर्ग की कार्यपालिका जिसमें प्रोन्नति में भी आरक्षण दिया गया है, लोभ या भयवश कार्य करती है, तब यह कैसे कहा जा सकता है कि पृथक निर्वाचन से चुने गए प्रतिनिधि भी लोभ, भय या दबाव में नहीं रहेंगे? अथवा वे अपने उपजाति के लिए अन्य अनुसूचित उपजातियों के हितों की अवहेलना नहीं करेंगे। आज क्यों अनुसूचित जातियों और जनजातियों के केवल चार-पाँच उपजातियों का ही प्रतिनिधित्व हो पाया है? शेष उपजातियां उपेक्षित ही हैं। समाज इस पर मुखर क्यों नहीं हो रहा है?
     
सरकारी सेवाओं में आरक्षण के कारण एक निश्चित संख्या में हिस्सा भी दलितों को मिला। उनके सरकारी सेवा में रहने, पद-प्रतिष्ठा पाने का उन्हें लाभ अवश्य मिला पर उनके पद-प्रतिष्ठा का कोई ज्यादा असर समाज के निचले हिस्से की बेहतरी पर नहीं दिखता है। जो थोड़ा बहुत बदलाव नजर आता है वह वयस्क मताधिकार के ‘एक व्यक्ति: एक मत: एक मूल्य’ की वजह से है जो बाबासाहब और गाँधीजी का दिलवाया हुआ अमूल्य हथियार है। यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा हथियार है, उसे दिलवाने में अम्बेडकर और गाँधी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। क्योंकि उस समय सवर्णों के कई लोग षिक्षित और जमीन-जायदात वालों को ही वोट के अधिकार देने की वकालत की थी, साइमन कमीशन के आने पर सबके लिए वयस्क मताधिकार का विरोध किया था। पर गाँधी ने उन्हें समर्थन नहीं दिया।

डॉ0 अम्बेडकर ने इसी वोट के अधिकार के बल पर दलितों-पिछड़ों को राजसत्ता प्राप्त करने और जातिविहीन समाज के निर्माण का आह्वान किया था और कहा था कि स्वतंत्र भारत में हम शासक होंगे। लेकिन क्या उनके अनुयायी ऐसा कर रहे हैं? यह इसी वोट के अधिकार का प्रतिफल है कि आज अम्बेडकर के धुरविरोधी भी जोर शोर से उनका यशोगान कर रहे हैं। सियासी दल एक दूसरे से बढ़ चढ़ कर अम्बेडकर के प्रति अपनी निष्ठा और भक्ति प्रदर्शित कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि पहले अधिकतर दलितों को वोट नहीं देने दिया जाता था। उनके नाम पर जबरन दूसरे वोट दे देते थे। लेकिन निर्वाचन आयोग की सख्ती, पहचान पत्र की अनिवार्यता एवं तकनीकी विकास  और जागरुकता की वजह से दलित अब अधिकतर जगह अपने मताधिकार का प्रयोग करने लगे हैं। जिससे अब दलित का वोट सबके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। सवर्ण राजनीतिज्ञ और विभिन्न राजनीतिक दल दलित वोट की उपेक्षा नहीं कर सकते हैं। दलितों को यह षक्ति वोट के अधिकार से मिली है। इस वयस्क मताधिकार की शक्ति ने सारे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों को प्रभावित किया है। इसने दलितों -पिछड़ों की शक्ति को उत्तरोत्तर आगे बढाया है। इसी शक्ति के चलते दलित वर्ग से महामहिम राष्ट्रपति,उप राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीष बनाए गए।

जिस प्रकार दलित प्रतिनिधि सवर्णों से भय खाते हैं, उसी प्रकार संगठित दलितों से सवर्णों के प्रतिनिधि भी भयभीत रहते हैं। दलितों के वोट के कारण संगठित दलितों के काम करने को सवर्ण प्रतिनिधि उसी तरह तत्पर रहते हैं, जिस तरह दलित प्रतिनिधि सवर्णों के काम करने के लिए तत्पर रहते हैं। इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि दलित समुदाय की सभी उपजातियाँ संगठित हों और अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठावें, अपने दायित्व के प्रति मुखर हों।

गाँधी की निंदा करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि दलितों के प्रतिनिधि दलित सरोकारों के मामले में तू-तू, मैं-मैं को छोड़कर उसे हल कराने में इमानदारीपूर्वक पहल करें। आज के दलितों के लिए यह आवष्यक है कि वे केवल गाँधी की निंदा करने, उन्हें भला-बुरा कहने की बजाय अपने बौद्धिक, सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिनिधियों के कार्यकलापों की विवेचना करें। सरकार के कार्यों की समीक्षा करें। अपने कमियों को सुधारने के लिए रणनीति बनावें, दबाव समूह का कार्य करें। उस पर अमल करें। डॉ0 अम्बेडकर के मूल मंत्र ‘‘शिक्षित बनो, संगठित होओ, संघर्ष करो’’ और ‘पे बैक टू सोसाइटी’ पर चलें तो समाज का ज्यादा भला होगा।

दलितों का प्रबुद्ध वर्ग सबसे ज्यादा असंगठित है। वह अम्बेडकर के वसूलों के विरुद्ध आचरण करता है। वह चाहता है कि बाबासाहब के समानता और संघर्ष के मंत्र को दूसरे समझें और आचरण करें। जबकि यह काम उन्हें सबसे पहले स्वयं करना है। जिस दिन यह बौद्धिक वर्ग अपने सुख की परवाह किए बगैर संगठित होकर संघर्ष की ओर बढेगाा, सवर्ण अपने फायदे और पूर्वाग्रह को छोड़ने पर मजबूर हो जाएगा। सामाजिक परिवर्तन की गति तीव्र होगी। आज दलित समुदाय के सेवानिवृत्त कर्मियों की संख्या बहुत बढी है जो सामाजिक कार्यों की बजाय अधिकतर घरों में ही रहते हैं। उन्हें दायित्व के प्रति सक्रिय होना होगा।

उन्हें यह समझना चाहिए कि सतत् परिश्रम और मितव्ययिता के व्यवहार से मनुष्य को जीवन में सफलता मिलती है। बहता हुआ पानी और गुजरता हुआ समय लौटकर नहीं आता है इसलिए उन दोनों का समय पर सदुपयोग हमेशा किया जाना चाहिए। संविधान ने हमें अपने अधिकारों के साथ ही उसे प्राप्त करने तथा अत्याचारों के प्रतिकार के कई उपाय मुहैय्या कराए हैं। यही संवैधानिक तरीके हमें सामाजिक-आर्थिक न्याय,  खाद्य, आजीविका, षिक्षा आदि के अधिकार प्राप्त करने के माध्यम हैं, उसका लाभ लेने के लिए हमें लोगों को जागरुक बनाने और  सामूहिक रूप से संघर्ष करने की जरूरत है।

हमें केवल 1932 के गाँधी को कोसने और उनकी निंदा में व्यर्थ समय गवाने से कोई लाभ होने वाला नहीं है। बल्कि इससे अन्य लोगों कि यह टिप्पणी सुननी पड़ती है कि दलित बैठे बिठाए सब कुछ खाने के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। ये बयानवीर हैं, कर्मवीर नहीं। ये आजीवन विकलांग ही बने रह कर खैराती बनना चाहते हैं। अब दलितों को कोई मदद न करे।  मान्यवर कांशी राम का यह कथन भी प्रासंगिक और विचारणीय है कि हमें पृथक निर्वाचन की माँग की बात पर एक मिनट का भी समय बर्बाद नहीं करना चाहिए क्योंकि जब ब्रिटिश राज में बाबासाहब जैसे व्यक्ति इसे नहीं प्राप्त कर पाए तो इस हुकुमत में इस पर सोचना भी व्यर्थ है। हमें संघर्ष कर इस लायक बनना है कि हम हुक्मरान बने। हम दाता बनें, याचक नहीं बनें।

सन् 1932 के कम्युनल अवार्ड में पृथक निर्वाचन की आरक्षण व्यवस्था 10 वर्ष के लिए थी। यह सच है कि 1932 में गाँधी के पूना आमरण अनशन ने दलितों के लिए संयुक्त निर्वाचन पद्धति को निश्चित किया। किन्तु इसने अम्बेडकर के कद को बहुत ही ऊँचा किया। अम्बेडकर के मंच को विश्वव्यापी प्रसिद्धि मिली। अम्बेडकर देश-विदेश में अछूतों और वंचित तबकों के निर्विवाद नेता बने, सामाजिक क्रान्ति के योद्धा कहे गए। साथ ही वे राष्ट्रीय नेताओं की अग्रिम पक्ति में एक महत्वपूर्ण स्थान बनाए। गाँधी ने सवर्ण हिन्दुओं की अन्तरात्मा को झकझोरा और अछूतों के प्रति उनके द्वारा किए जा रहे पापों को प्रायश्चित करने के लिए प्रेरित किया। सवर्णों में आत्म शुद्धि आंदोलन चलाया। गाँधी के आह्वान पर उस समय अछूतों के उद्धार के लिए कुछ हिन्दुओं ने अपना जीवन समर्पित किया। उनका कहना था कि हिन्दू समाज को हमने गंदा किया है, हम उसे साफ करेंगे। जिससे अछूतों के प्रति देशभर में एक सकारात्मक वातावरण बना। स्थिति में बहुत जगह परिवर्तन आया। 

आज इतने सुरक्षात्मक कानूनों और जागरूकता के बावजूद दलित बहुत जगह असहाय स्थिति में हैं। तब 90 वर्ष पूर्व, जब उनके सुरक्षा के कानून नहीं थे तब दलित कितने  दयनीय हालत में रहे होंगे? यह कल्पना की जा सकती है। समय के साथ तथा अपने अनुभवों के आधार पर गाँधी बहुत बड़े संषोधनवादी थे। अपनी पुरानी मान्यताओं को बदलने में देर नहीं करते थे। इसलिए गाँधी के पूर्व और बाद के विचारों और कार्यों में विरोधाभाष दिखाई पड़ता है। गाँधीजी द्वारा सन् 1932 के पहले जातिप्रथा और वर्णव्यवस्था को मानना और फिर कुछ वर्ष के बाद 1942 के आस पास अर्न्तजातीय विवाहों जिसमें एक पक्ष हरिजन हो, का जबरदस्त समर्थक बनना, उनमें से एक था। इस समय उन्होंने किसी भी ऐसे वर-वधु को आशीर्वाद नहीं दिया, जिसने सजातीय शादी किया। अपने परिवर्तित विचारों को गाँधी सत्य का प्रयोग कहते थे। गाँधी से प्रेरित होकर उस समय सवर्णों के अधिकतर प्रबुद्ध लोगों ने अपने से छोटी जातियों के पुरुष-महिला से अन्तर्जातीय विवाह किया था। उतना अन्तर्जातीय विवाह तो दलितों की विभिन्न उपजातियों ने भी आपस में नहीं किया। जबकि बाबासाहब ने जाति तोड़ो और एक अनुसूचित जाति बनों का आह्वान किया था।

गाँधी की हत्या सनातनियों ने क्यों की? पहला अनुसूचित जातियों का पक्ष लेने से वे अन्दर अन्दर गाँधी से चिढ़े हुए थे। उनके अन्दर आक्रोश था, पर दबा हुआ था। दूसरा कारण जब गाँधी ने मुसलमानों के हितों का पक्ष लेना शुरू किया तो वह आक्रोश एक आकार लिया और सुनियोजित तरीके से उनकी हत्या कर दी। आज गाँधी की स्थिति गाँव के पंचायती करने वाले और शादी ब्याह के उस अगुआ की तरह है जो दोनों पक्षों का काम बनवा देता है लेकिन बाद में दोनो पक्षों का अप्रिय बन जाता है। उस व्यक्ति से दोनों पक्ष रुष्ट रहता है, उससे गाली सुनता है। आजादी के बाद गाँधी की भूमिका को उनकी हत्या के बाद उनके अनुयायियों ने न केवल सीमित कर दिया बल्कि उसे धीरे-धीरे दफनाने का भी कार्य किया। गाँधी के नाम पर गाँधीवादी कुछ दिन मलाई खाते रहे, पर कब तक खाते। अत्याचारों के खिलाफ दलितों का गुस्सा गाँधीवादियों के साथ सवर्णों पर होना चाहिए, न कि गाँधी पर। दलित उत्पीड़न के विरुद्ध जाने माने गाँधीवादी या गाँधीभक्त संघर्ष के लिए आगे नहीं आ रहे हैं, जिसका कारण गाँधीवादी आज गाँधी के सद्धान्तों को अपने से अलग कर दिए हैं। वे छद्म- गाँधीवादी बन कर गाँधी का पाठ कभी-कभी अपने निजी फायदे के लिए करते हैं ।

अम्बेडकर ने वंचित लोगों में आत्म सम्मान और मानव अधिकार के लिए संघर्ष करने की ज्योति जलाई। उसके बाद सामाजिक-आर्थिक न्याय का युग शुरू होता है, जिसके प्रतीक अम्बेडकर हैं। यह अभी चल रहा है। पर लगता है उनके अनुयायी कहीं उनका हश्र गाँधी जैसा न कर दें। अम्बेडकर को जितना खतरा अम्बेडकरवादियों से है उतना अन्यों से नहीं है। जिस प्रकार गाँधी को गाँधीवादी समाप्त करते जा रहे हैं, उसी प्रकार अम्बेडकर को अम्बेडकरवादी समाप्त  करने में लगे हैं। वे जितनी जोर से अम्बेडकर के नाम और सिद्धान्त  की माला का जाप करते हैं,उतना ही ज्यादा उनके सिद्धान्तों को तिलांजलि भी देते जा रहे हैं।  उनके कथनी और करनी की खाईं चौड़ी से चौड़ी होती जा रही है। अम्बेडकर की महानता और उनके नाम का इस्तेमाल हमें उनके मिषन को आगे बढाने में किया जाना चाहिए, अपनी अकर्मण्यता को ढकने और नए महंथ या नए पंडा बनने के लिए नहीं ।

गांधी के कार्यों के दूसरे पहलू का अध्ययन किया जाना भी जरूरी है। उल्लेखनीय है कि 1 मई 1946 को डॉ0 अम्बेडकर ने वायसराय की कार्यकारी परिशद (मंत्रिमंडल) से त्याग पत्र दे दिया। वायसराय लार्ड वेवल ने 13 अगस्त 1946 को काँग्रेस के नेतृत्व में अंतरिम कार्यकारी परिशद का पुर्नगठन किया। 2 सितम्बर 1946 को जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में नई अंतरिम कार्यकारी परिशद ने पदभार ग्रहण किया। जिसमें डॉ0 अम्बेडकर का स्थान जगजीवन राम ने लिया। काँग्रेस सरकार का दृष्टिकोण 1946 में संकुचित और उदार दोनों हुआ। संकुचित इस अर्थ में कि वे लोग संघर्ष, सिविल नाफरमानी और आंदोलन के खिलाफ हो गए, जबकि इसी के बल पर काँग्रेस लोकप्रिय हुई थी। उदार इस मामले में कि वे अपनी पूर्व की धारणा को बदल कर राष्ट्र निर्माण में सभी विरोधी पक्षों का सहयोग लेने को तैयार हुए।

देश 1947 में आजाद हुआ, पर यह दो टुकड़ों – भारत और पाकिस्तान में बंटा। डॉ0 अम्बेडकर 1946 में पूर्वी बंगाल से केन्द्रीय विधान सभा के सदस्य चुने गए थे। 1947 में देश के बंटवारे के बाद उनकी सदस्यता समाप्त होने वाली थी। क्योंकि डॉ0 अम्बेडकर पूर्वी बंगाल के जिस स्थान से चुनकर आए थे, वह भाग पाकिस्तान में चला गया, उनकी सदस्यता पाकिस्तान के संविधान सभा के साथ जुड़ गई। डॉ0 अम्बेडकर भारत के केन्द्रीय विधान सभा (संविधान सभा) की सदस्यता समाप्त होने वाली थी। इसी बीच बम्बई से काँग्रेस के चुने गए सदस्य डॉ0 एम0 आर0 जयकर ने सन् 1947 में केन्द्रीय विधान सभा से त्याग पत्र दे दिया।

उन्हें नए बनने वाले पूना विश्वविद्यालय (वर्तमान सावित्री बाई फूले पूना विश्वविद्यालय) के कुलपति के पद पर नियुक्त किया गया था। बम्बई के उस रिक्त स्थान से सन् 1947 में डॉ0 अम्बेडकर केन्द्रीय विधान सभा (भारतीय संविधान सभा) में निर्विरोध चुन कर आए। काँग्रेस ने डॉ0 अम्बेडकर के विरुद्ध कोई प्रत्यासी नहीं खड़ा किया, काँग्रेस ने अपने प्रत्यासी से नाम वापस करवा लिया।  इसके बाद काँग्रेस ने डॉ0 अम्बेडकर को पहले संविधान ड्राफ्टिंग कमिटी का सदस्य और फिर संविधान ड्राफ्टिंग कमिटी का अध्यक्ष और कानून मंत्री बनाया, जिसे डॉ0 अम्बेडकर ने स्वीकार किया। डॉ0 अम्बेडकर ने संविधान सभा में स्वयं यह स्वीकार करते हुए कहा था कि ‘मैं काँग्रेस का घोर विरोधी रहा हूँ इसलिए जब संविधान सभा ने मुझे प्रारूप समिति के सदस्य के लिए चुना तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था। मुझे तब और भी आश्चर्य हुआ जब मुझे उस समिति का अध्यक्ष चुना गया।’

डॉ0 अम्बेडकर को यह सब गाँधीजी के कहने पर मिला। यदि गाँधीजी नहीं चाहते तो डॉ0 अम्बेडकर को यह तीनों पद नहीं मिल सकता था। यहाँ हम कह सकते हैं कि आजादी के बाद डॉ0 अम्बेडकर दलित समाज के हित में संविधान में जो कुछ भी किए वह गाँधी और काँग्रेस के योगदान के बिना पूर्ण नहीं हो सकता था। वे जो कुछ किए वह गाँधी और काँग्रेस के सहयोग से ही कर पाए, क्योंकि वे अपने दल के एकमात्र सदस्य थे। ब्रिटिश सरकार के चले जाने के बाद अम्बेडकर दबाव बनाने की स्थिति में नहीं थे। आजादी के बाद जो कुछ दलितों को मिला, उसमें गाँधी का योगदान विशेष महत्व का है। यह गाँधी के आत्मशुद्धि आन्दोलन और अम्बेडकर के आत्मसम्मान तथा मानवाधिकार आन्दोलन के कारण सम्भव हुआ। इसमें गाँधी और अम्बेडकर के कार्य एक दूसरे के पूरक की तरह हैं, विरोधी की तरह नहीं। इसे समझा जाना चाहिए। 

जिस तरह आजादी के पूर्व लम्बे समय तक गाँधी-अम्बेडकर के बीच तीखे वाद-विवाद, कटु आरोप-प्रत्यारोप हुए, उसके बावजूद यह गाँधी का बड़प्पन था कि उन्होंने अम्बेडकर को तीनों पद दिलवा कर उदारतापूर्वक व्यवहार किया। राष्ट्र  निर्माण में  अम्बेडकर के योगदान में चार चाँद लगाया। यह गाँधी के दलित उत्थान और डॉ0 अम्बेडकर के प्रति उनके सोच को दर्षाता है। आजादी के बाद डॉ0 अम्बेडकर की जो स्थिति बनी थी ,उसमें यदि आज के नेता लोग रहते तो उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल कर रख देते। ये उन्हें पाकिस्तान में षरण लेने का उपदेश देने से भी नहीं चूकते।

बंगाल के सर जोगेन्द्र नाथ मंडल पाकिस्तान के संविधान सभा के ही सदस्य बने रहे। उनका दर्जा पाकिस्तान के प्रधान मंत्री के बाद का था। वे पाकिस्तान संविधान सभा के कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए थे। बाद में वे पाकिस्तान के कानून और श्रम मंत्री बनाए गए।  लेकिन जिन्ना की मृत्यु के बाद सन् 1950 में जब प्रधान मंत्री लियाकत अली खाँ ने संविधान के विरुद्ध पास्तिान को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की घोशणा की तो उन्होंने खिन्न होकर सरकार से त्याग पत्र दे दिया। 10 पृष्ठों का यह त्याग पत्र पढ़ा जाना चाहिए। बाबासाहब डॉ0 अम्बेडकर के सम्पर्क में 25 वर्ष के लेखक सोहन लाल शास्त्री के शब्दों में अछूतों के लिए डॉ0 अम्बेडकर ने माता की भूमिका अदा किया और गाँधी ने एक उच्च कोटि के कुशल डॉक्टर और नर्स का काम किया।

कहा जाता है कि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू देश के संविधान को बनाने हेतु विदेश के विषेशज्ञों को नियुक्त करने के लिए गाँधीजी से मषविरा करने गए थे। गाँधीजी ने कहा कि देश में ही ऐसे  व्यक्ति हैं, उसे यह काम क्यों नहीं सौंपते हो ? चर्चा के क्रम में जब गाँधीजी ने डॉ0 अम्बेडकर का जिक्र किया, तो नेहरू ने प्रतिवाद किया कि वह काँग्रेस का धुर विरोधी है, आपकी भी कटु आलोचना करता है। गाँधीजी ने प्रत्युत्तर में कहा कि इस देश को आजाद कराने में सबका योगदान है, केवल काँग्रेस का नहीं। प्रत्येक के कार्यों की आलोचनाएं होती रहती है लेकिन आलोचना ही लोकतंत्र को गतिषील बनाती है। 

हमें मिलजुल कर सबके साथ देश का निर्माण करना है। यह देश हम सबका है। शासन में सबका हिस्सा होना चाहिए। नेहरू ने गाँधीजी के आदेश का अनुपालन किया। नेहरू और पटेल ने डॉ0 अम्बेडकर से मंत्रिमंडल में षामिल होने का अनुरोध किया। वार्ताक्रम में कुछ बिन्दुओं पर गतिरोध पैदा हुआ। मतभेद वाले बिन्दू पर वार्ता हुई। आखिरकार नेहरूजी ने स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर को डॉ0 अम्बेडकर के निवास स्थान पर भेजकर उन्हें आमंत्रित किया। डॉ0 अम्बेडकर को मंत्री पद की षपथ दिलाई गई। यह सब गाँधीजी का डॉ0 अम्बेडकर के प्रति अनुराग और सदासयता का ही परिणाम था। गाँधीजी की मृत्यु के बाद काँग्रेस ने डॉ0 अम्बेडकर के साथ क्या सलूक किया? अम्बेडकर न केवल दो लोकसभा (सन् 1952 के बम्बई का आमचुनाव और 1954 के भंडारा का उपचुनाव) का चुनाव हार गए बल्कि बुद्ध की 2500वीं वर्षगांठ सन् 1956  के अवसर पर लिखी गई उनकी पुस्तक ‘बुद्ध और उनका धर्म’ को छपवाने में आर्थिक सहायता करने के उनके अनुरोध को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अस्वीकार कर दिया था।

आउटलुक पत्रिका, दिल्ली, अगस्त-सितम्बर 2012, स्वधीनता विषेशांक के एक सर्वेक्षण ‘गाँधी के बाद महानतम भारतीय की तलाष में संविधान निर्माता अव्वल’, (आजादी के बाद जय भीम,लेकिन कब आजाद होगा आम दलित)  को पढा जाना चाहिए। स्पष्टतः आधुनिक भारत में जहाँ से गाँधी की भूमिका खत्म होती है, वहीं से अम्बेडकर-जगजीवन राम की भूमिका शुरू होती है। यानी राजनीतिक आजादी के बाद सामाजिक-आर्थिक आजादी की लड़ाई आरम्भ हुई ।

बकौल मधु लिमये ‘‘अम्बेडकर और गाँधीजी के लेखों,वक्तब्यों, कार्यों और चिंतन का अध्ययन करने वालों को कभी-कभी यह बात उलझन में डालती है कि उनके विचार लगाातार बदलते रहे। जब गाँधीजी को पहले व्यक्त किए गए विचारों की याद दिलाई जाती थी तो वे प्रष्नकर्ताओं से कहते थे कि इन असंगतियों को न देखें, उनके वर्तमान मत को ही प्रमाणिक माने। यह उनके सत्य का प्रयोग है। डॉ0 अम्बेडकर के विचार भी सभी प्रष्नों पर अपरिवर्तनीय नहीं थे। जाति-संस्था के उन्मूलन और राष्ट्र की मजबूती के लिए समतामूलक समाज की स्थापना के प्रष्न को छोड़ कर अन्य प्रष्नों पर उनके विचार काफी लचीले थे।

विचारों के सातत्य,संगति तथा स्थिरता के प्रति डॉ0 अम्बेडकर का रवैया वही था जो गाँधीजी का था। एकबार डॉ0 अम्बेडकर ने इमर्सन का हवाला देकर कहा कि विचारों की स्थिरता गधे का गुण है और मुझे अपने आपको गधा बनाना अभीश्ट नहीं है। केवल सातत्य के लिए किसी भी विचारषील प्रणाली को एक ही मत से नहीं बंधे रहना चाहिए। अमूर्त सातत्य की अपेक्षा मूर्त परिस्थिति ज्यादा महत्वपूर्ण है और मनुश्य को सीखी हुई बात को भूलना भी जरूरी है। एक जिम्मेदार आदमी में पुनर्विचार करने और अपने विचारों को बदलने का साहस होना चाहिए। जरूरी बात यह है कि विचारों की अन्तिमता को बदलने के लिए अच्छे और प्रर्याप्त कारण होने चाहिए। ‘‘

डॉ0 अम्बेडकर ने आरक्षण की माँग वंचित तबके के सषक्तिकरण के लिए तात्कालिक रूप से किया था। यह सदा के लिए नहीं था। आरक्षण अम्बेडकर का लक्ष्य नहीं था। डॉ0 अम्बेडकर का लक्ष्य था ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद का अंत कर जातिविहीन समाज और समाजवाद की स्थापना करना। लेकिन उनके दलित अनुयायी उनके सिद्धान्तों की बलि चढाकर केवल आरक्षण रूपी मलाई खाने में व्यस्त हैं। यही नहीं वे आपस में उपजाति का भेदभाव और जहर फैलाने से भी नहीं चूकते हैं।

ऐसे लोग मलाई खाने के बाद अपने से नीचे के व्यक्तियों से बहुत दूरी बना कर ही रहते हैं। यहाँ तक कि वे अपने पैतृक गाँव-घर से भी रिस्ता नहीं निभाते हैं। दलितों में यह जो नया मध्यम वर्ग पैदा हुआ है,वह ब्राह्मणों जैसा बौद्धिक रूप से बेइमान बन गया है। वह अधिकार बोध के तहत सिर्फ माँग करता है। संघर्ष नहीं करता है। वह कर्त्तब्य और संघर्ष की अपेक्षा दूसरों से करता है। उसे दायित्व नहीं अधिकार चाहिए। दायित्व के बिना अधिकार व्यक्ति को कर्महीन, उच्छृंखल और स्वेच्छाचारी बनाता है। यह क्रम यदि चलता रहा तो ऐसे दलितों की हालत उन ब्राह्मणवादियों से भिन्न नहीं होने जा रही है जिसकी आज सर्वत्र निन्दा होती है ।

आज दलितों का धुर गाँधी-विरोधी और उग्र-अम्बेडकर समर्थक तबका इन तथ्यों को या तो जानते ही नहीं हैं अथवा जानने पर भी अनजान बनने का प्रदर्षन करते हैं।  वे आँख मूद कर अपनी हर समस्या के लिए केवल गाँधी के 1932 के आमरण अनषन की दुदुम्भी बजाते रहते हैं। गाँधी के प्रति विद्वेशपूर्ण बातें कहने और प्रचारित करने में मसगूल रहते हैं। ऐसे लोग दलितों का कितना भला करेंगे ?

जिस तरह दलितों के बीच  गाँधी की निंदा की जाती है उसी तरह जगजीवन राम की भी दलित समाज बिना सोचे समझे निंदा में लिप्त रहता है। दलित उत्थान में  जगजीवन राम के योगदान का मूल्यांकन करने और समझने की बजाय एकतरफा उन्हें अम्बेडकर विरोधी से लेकर न जाने कितने अनुचित विषेशणों से नवाजा जाता है। जगजीवन राम के राजनीतिक विरोधियों ने उनके बारे में जो सगूफा उस वक्त छेड़ा था, उसी डफली को आज भी दलित बजा रहे हैं।

जिस प्रकार नब्बे के दसक के पूर्व घोर सवर्णवादी लोग अम्बेडकर को हिन्दू विरोधी, देशद्रोही, अंग्रेजों का पक्षधर और अन्य अपमानजनक टिप्पणियां करते थे, उसी प्रकार, कुछ अपने को प्रखर बुद्धिवादी और कट्टर दलित नेता कहलाने वाले भी जगजीवन राम के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणी करने से नहीं चूकते हैं। वे जगजीवन राम को ब्राह्मणवाद के खुषामदी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जगजीवन राम के काँग्रेसी होने को वे ऐसे प्रचारित करते हैं, जैसे उन्होंने एक बहुत बड़ा अपराध किया हो। जगजीवन राम के विरुद्ध बोलना उनलोगों ने एक फैशन बना लिया है। उन्हें जगजीवन राम के कार्यों को दाएं-बाएं, आगे-पीछे देखने की फुर्सत आज तक नहीं मिली।

ऐसे प्रखर दलित मायावती के ब्राह्मण प्रेम या गठजोड़ पर जय-जयकार करते हैं, जबकि वे पानी पी-पीकर जगजीवन राम को इसके लिए कोसते रहते हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या आज गांधी-जगजीवन की निंदा की जानी चाहिए? उत्तर होगा कदापि नहीं। तब उन दोनों की निंदा करने का मायने क्या है ? स्पष्टतः उनकी निंदा अपनी अकर्मण्यता और नाकामी को छिपाने के लिए की गई असफल कोशिश है।

लेखक इं राजेन्द्र प्रसाद बिहार अभियंत्रण सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी और सामाजिक चिंतक हैं. उनसे संपर्क 09472575206 या r.prasadee5@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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