गौरीशंकर गुप्त का न रहना : वे जीवन भर किसी नौकरी में रहे बिना केवल लेखन के सहारे जीवनयापन करते रहे!

गौरीशंकर गुप्त

गौरीशंकर गुप्त का पिछले दिनों बनारस में निधन हो गया। वे 87 वर्ष के थे। स्थानीय अखबारों में छोटी खबरें छपी थीं। मुझे भी पता नहीं चल पाता अगर उनके बेटे ने बनारस के मेरे घर से मेरा फोन नंबर लेकर मुझे फोन नहीं किया होता। मैं गुप्त जी के संपर्क में रहने की कोशिश करता रहता था, जब कभी बनारस जाता उनसे मिलता।

अपने दादा पराड़कर जी पर होने वाले समारोहों में या कुछ वर्षों पूर्व जब राष्ट्रीय दूरदर्शन ने पराड़कर जी पर ‘क्रांतिकारी पत्रकार’ वृत्तचित्र का निर्माण किया था तो वे मेरे आग्रह पर आए थे और कई संस्मरण सुनाए थे। वे मेरे लिए एक सेतु की तरह थे। दादा जी से जुड़ी कई जानकारियां मुझे किताबों में नहीं मिलतीं, उनके पास होती थीं।

उनसे मैंने कई बार यह समझने की कोशिश की कि पराड़कर जी बनारस में किन-किन घरों में, कब-कब रहे। वे एक बार मुझे राजमंदिर का घर दिखाने भी ले गए। पराड़कर जी के दौर के पत्रकारों में कुछ वर्षों पूर्व दिवंगत हुए पारसनाथ सिंह जी भी थे लेकिन अक्सर पटना रहने के कारण उनसे मेरा संपर्क नहीं हो सका था। गुप्त जी से मिल लेना या फोन पर बात कर लेना आसान होता था। उनका जाना मेरे लिए उस सेतु का टूट जाना है जिसके सहारे मैं अक्सर पराड़कर जी तक पहुंच जाया करता था।

लेकिन एक और बात थी जो मुझे प्रभावित से अधिक आश्चर्य में डालती थी। वह थी उनका जीवन भर किसी नौकरी में रहे बिना केवल लेखन के सहारे जीवनयापन करने की जिद। वे पराड़कर जी के समय तो किशोर थे, उसके बाद के दौर के पत्रकारों के लगातार संपर्क में रहे लेकिन कभी नौकरी नहीं की। लगातार लिखते रहे, कभी कहीं से किसी लेख का मनीआर्डर आ जाता, कभी कहीं से कोई चेक। बाद में जब थोड़ी दिक्कतें आईं तो कोई लेखक या संस्थान आर्थिक सहायता की पहल भी कर देते। बच्चे बड़े हुए तो जिम्मेदारियां थोड़ी कम हुईं लेकिन खत्म नहीं हुई।

उत्तर प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग से साहित्यकारों-कलाकारों को मिलने वाली दो हजार रुपए मासिक पेंशन में आने वाली दिक्कतों को कई बार मैंने भी दूर कराने का प्रयास किया था लेकिन बस ये ही छोटी-मोटी आय उनकी थी, हौसला अधिक था और लेखन पर विश्वास भी। मुझे नहीं लगता कि आज बिना नौकरी किए, इस विश्वास के सहारे जीवन यापन किया जा सकता है, शरद जोशी या गौरीशंकर गुप्त जैसे हौसले वाले बिरले ही होते हैं!

एक और बात जो गुप्त जी के साथ रही। साहित्यकारों, पत्रकारों और साहित्यप्रेमी पुराने राजनेताओं को पत्र लिखने और चित्र खिंचवाने का उन्हें बहुत शौक था। उनके पास ऐसे पत्रों और चित्रों का विशाल संग्रह है जो साहित्य और पत्रकारिता की अमूल्य निधि हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि अब इनका कोई उपयोग हो सकेगा।

उन्होंने कई बार अपने लेखों में इन पत्रों का उपयोग किया लेकिन कोई व्यवस्थित किताब नहीं आ सकी। अकेले बच्चन के पत्रों पर पुस्तक तैयार हो सकती है। यूं तो कुछ किताबें उन्होंने लिखीं जिनमें ‘पत्रकारिता बृहत्रयी’, ‘स्वतंत्र पत्रकारिता’, ‘बापू और उनकी दिनचर्या’, ‘गांधी गीता’ प्रमुख हैं। अक्सर खुद ही छपवाते, किसी बड़े प्रकाशक तक उनकी पहुंच नहीं हो सकी। मेरी इच्छा थी कि उनके संस्मरणों के सहारे पराड़कर जी पर कोई व्यवस्थित पुस्तक तैयार कर सकूं। कुछ रिकार्डिंग भी की लेकिन इस काम के न हो पाने की पीड़ा अब जीवन भर मेरे साथ रहेगी!

वरिष्ठ पत्रकार आलोक पराड़कर की फेसबुक वॉल से.

Tweet 20
fb-share-icon20

भड़ास व्हाटसअप ग्रुप ज्वाइन करें-

https://chat.whatsapp.com/JcsC1zTAonE6Umi1JLdZHB

भड़ास तक खबरें-सूचना इस मेल के जरिए पहुंचाएं- bhadas4media@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *