पेजव्यू बढ़ाने के लिए देवर-भाभी, भाई-बहन, बाप-बेटी जिनको भी साथ लिटाना पड़े, लिटा दो!

गूगल एनालिटिक्स पर अच्छा पेजव्यू देखने के लिए सभी न्यूज़ वेबसाइटों में होड़ मची रहती है। जब सामान्य तौर पर अच्छा पेजव्यू नहीं आता तो डिजिटल टीम के छोटे कर्मचारियों पर दवाब बनाया जाता है। उन्हें ट्रैफिक लाने के लिए खबरों से इतर कुछ उट-पतांग की ख़बरों को परोसने के लिए कहा जाता है। उन पर हर तरह का दवाब बनाया जाता है।

मीटिंग में पेजव्यू को‌ लेकर तरह तरह के सुझाव दिए जाते हैं, जब सामान्य तौर पर खेल, मनोरंज‌न, आटो-टेक, ट्रेंडिंग स्टोरी से भी पेजव्यू गिरता हुआ दिखाई देता है। तब सही मायनों में संपादकों की नींद उड़ती है। साथ ही साथ जीना हराम होता है, टीम में काम कर रहे अन्य कर्मियों का। उनसे तरह तरह के सुझाव मांगे जाते हैं। मीटिंग में दवाब बनाया जाता है,किस तरह से वायरल हो रहे फर्जी पोस्ट पर स्टोरी बनाएं।

कोशिश रहती है, और कहा भी जाता है, देवर-भाभी, भाई-बहन, बाप-बेटी, जिसको स्टोरी में साथ लिटाना पड़े लिटाओ, इस पर या उस पर स्टोरी कैंचीदार हेडिंग के साथ स्टोरी बनाओ। इन दिनों कुछ ऐसा ही प्रयोग या यूं कहें तो पेजव्यू उठा‌ने के लिए पत्रिका वेबसाइट में कुछ इसी तरह की ख़बरों को परोसा जा रहा है।

पत्रिका वेबसाइट के कर्मी न चाहते हुए भी ऐसी ख़बरों को परोसने के लिए मजबूर हैं। अगर वो ऐसा नहीं करते हैं, तो उन पर दवाब बनाया जाता है PLI का। यह एक तरह का इंसेंटिव है, जिसको पत्रिका टोटल सीटीसी में शामिल करके ज्वाइनिंग के समय बताता है। समय समय पर बास के साथ मतभेद होने पर इसी PLI पर कैंची भी चलाया जाता है।

कुल मिलाकर PLI काटने के पीछे यही तर्क दिया जाता है आखिरी महीने के मुताबिक, नंबर आफ स्टोरी या PV अच्छा नहीं रहा। अमूमन कर्मचारियों का‌ PLI के नाम पर 2-3 हजार रुपये काट लिया जाता है। और तो और, ज्वाइनिंग के समय अक्सर लोगों को गुमराह किया जाता है। न ज्वाइनिंग के समय आफर लेटर दिया जाता है और न अप्वाइंटमेंट लेटर। ज्वाइनिंग के समय तीन साल का भौकाली कान्ट्रैक्ट दिखाया जाता है। कहा जाता है तीन वजहों से हटकर अगर आप नौकरी छोड़ते हैं तो आपको तीन महीने की सैलरी पत्रिका को देना पड़ेगा।

तीन वजहों में जो छूट दी जाती है, वो इस प्रकार है, (1) अगर महिला‌ कर्मचारी है और उसकी शादी हो जाती है, वो नौकरी नहीं करना चाहती। (2) सरकारी नौकरी पुरुष/महिला कर्मचारी को लग जाती है। (3) कोई घरेलू विपत्ति आन पड़ी हो। पुरुष कर्मियों के लिए दो वजहों में नौकरी छोड़ने पर राहत है। लेकिन अगर इन सब में कोई कर्मी तीन साल से पहले इन वजहों से हटकर किसी अन्य कारणों से नौकरी बदलता है या छोड़ता है तो उसे रिलिविंग लेटर या अन्य कोई प्रमाण पत्र नहीं दिया जाता। चूंकि, यहां ये भी साफ‌ कर दूं कि ज्वाइनिंग के समय भी कुछ नहीं दिया जाता।

यही हाल इंक्रीमेंट का भी है। अधिकांश कर्मचारियों को इंक्रीमेंट का रसगुल्ला दिखाकर पप्पू बनाया जाता है, जो बास के अगारी-पिछारी रहे, उनका कुछ हो जाए तो बात अलग। लेकिन जब तक काम करते हैं, निचोड़ कर लिया जाता है। कुल मिलाकर एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान होने के नाते कर्मचारियों की पालिसी को लेकर मैनेजमेंट की तरफ से कोई पारदर्शिता नहीं है।

सबसे बुरा हाल नोएडा पत्रिका आफिस का है। यहां एडिटोरियल में काम करने वाले कर्मी जब अपनी किसी भी तरह की समस्या मैनेजमेंट के सामने रखते हैं, वो लोग हाथ खड़े कर के जयपुर की ओर इशारा कर देते हैं। वो यहां बेशक बैठे हैं लेकिन कुछ कर नहीं पाते। इसी छीछालेदर में कर्मचारी हर रूप में शोषित होते रहते हैं।

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