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सुख-दुख

मेरा दोस्त IMT जो “हरफनमौला” पुस्तक का मुख्य पात्र है, चुपचाप चला गया, एक रात…

सत्य पारीक, जयपुर-

जो गोली से नहीं हारा वो सांसो से हार गया , तब कहा जाएगा ” वो तेरे प्यार का गम ” यानी मेरी अधूरी किताब का हीरो आई एम टी बगैर अपने शुरुआती जीवन की चर्चा के अंतर्ध्यान हो गया। जिसने मुझे कहा था कि हम आपस में इस पर चर्चा करेंगे । क्योंकि वह मेरे सम्पर्क में जयपुर आने के बाद आया था । उससे पहले के उसके जीवन के बारे में मैं कम जानकारी रखता हूं । जिसे पूरी करना चाहता था आपस में बात करके , जो अब क़भी नहीं होगी । जी हां मैं चर्चा कर रहा हूं ईशमधु तलवार की जिसे में आई एम टी कहकर पुकारा करता था , वह हमेशा की तरह रात्रि को दोस्तों की सजी महफ़िल में अपने प्रिय दानसिंह के संगीत से सजे गीत सुनाकर घर गया , सोने से पहले सहित्य प्रेम के कारण पुस्तक पढ़ता हुआ गहरी नींद सो गया ।

अलवर शहर में छोटे छोटे पत्रों से पत्रकारिता शुरु की , बाद में तीन मित्रों ने मिलकर अपना अखबार निकाला । जिसमें सफलता कम मिली इसलिये पत्रिका से जुड़ गए । जब जयपुर से नवभारत टाईम्स का प्रकाशन शुरू हुआ तो जयपुर आ पहुंचे। तीन दशक से भी ज्यादा समय उन्होंने देश प्रदेश के लगभग सभी बड़े छोटे अखबारों में गुजारा। बीच में कुछ माह के लिये चंडीगढ़ जनसत्ता में गए वहां का वातावरण जमा नहीं इरशाद कामिल जैसे गीतकार के सम्पर्क में आए और दोस्त बन गए । फिर वापस राजस्थान लौट कर नवज्योति में काम करने लगे । लेकिन वहां भी ज्यादा टिकाव नहीं हो सका ।

राजस्थान का लोक अगर महान साहित्यकार विजयदान देथा की कहानियों में बोलता है तो ईशमधु तलवार की जुबान से वही बरसता था। यों तो पत्रकारिता में लगभग हर क्षेत्र में उन्होंने हाथ अजमाया और नाम कमाया पर दिल फिल्म, संगीत और साहित्य मे रमा रहा। जब भी उनकी कलम इन विषयों पर चली तो लोगों की नजरें न हट पाईं। शानदार संगीतकार और जयपुर के दान सिंह को मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री जो मुकाम न दे सकी वो ईशमधु तलवार ने उन पर ” वो तेरे प्यार का गम ” किताब लिखकर दे दिया।

गुमनामी के अंधेरे में डूब चुके किसी महान शख्सियत को समाज में कैसे पुनर्स्थापित किया जाता है ये तलवार ने कर दिखाया। कुछ दिन पहले ही उनका उपन्यास रिनाला खुर्द छपकर आया तो धूम मच गयी। इसी उपन्यास के जरिए चाई जी का कैरेक्टर इतना मशहूर हुआ कि लोग उनसे मिलने पर उनका हालचाल पूंछते थे। पाकिस्तान पर लिखे किसी भी अन्य उपन्यास के मुकाबले रिनाला खुर्द लोगों को अलग नजरिया देता है।

जिंदगी की तमाम जिम्मेदारियां निपटा एक बेहतरीन परिवार को व्यवस्थित कर इन दिनों ईशमधु तलवार पूरी तरह से साहित्य में डूबे हुए थे। हालांकि बहुत अपनों के इसरार पर उन्होंने विश्ववार्ता से जुड़ना मंजूर किया था और पाक्षिक पत्रिका में लगातार राजस्थान की राजनीति, सरकार व अन्य विषयों पर लिख रहे थे। विश्ववार्ता पत्रिका में उनका ही नाम राजस्थान ब्यूरो चीफ के तौर पर जाता था। इन सब के बाद साहित्य के मोर्चे पर एक एक्टिविस्ट की तरह सक्रिय थे।

राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव के तौर उनकी सक्रियता देश भर में मिसाल बन गयी थी। हर दिन उनके खींसे में कोई न कोई कार्यक्रम होता और देश भर के साहित्यकारों को उन्होंने राजस्थान पहुंचा दिया था। साहित्यकारों से जुड़े स्थलों की यात्रा हो या उनके उपन्यासों के पात्रों की खोज, तलवार साहब बच्चों सरीखे उत्साह के साथ लग जाते थे। रांगेय राघव के उपन्यास का पात्र सुखराम नट को उन्होंने कुछ दिन पहले राजस्थान के एक गांव में खोजा डाला और उस पर एक लेख भी लिखा।

ईशमधु तलवार का जिक्र पत्रकारिता की राजनीति के लिए न हों तो बहुत कुछ अधूरा रहेगा। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार यूनियन से लेकर जयपुर के पिंक सिटी प्रेस क्लब का अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने कामयाबी के झंडे गाड़े। कुछ साल पहले आईएफडब्लूजे के पुनर्गठन के वो सूत्रधार रहे और आखिरी दिन तक वही आधार स्तंभ थे। पत्रकार संगठन से उन्होंने बहुत से नए लोगों को जोड़ कर उन्हें निखारा और नेतृत्व सौंपने लायक बनाया । उनकी बनाई गई परम्पराओं को जीवित रख कर ही दिंवगत आत्मा को शांति प्रदान कर सकते हैं …..

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