पत्रकार अमरेंद्र किशोर की लिखी फिल्म ‘होली काऊ’ की धूम कान फिल्म फेस्टिवल में

देश भर में गोरक्षा के नाम पर मची हिंसा पर आधारित डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘होली काऊ’ इस साल के कान फिल्म फेस्टिवल में बहुत चर्चित रही है। ख़ास तौर पत्रकार अमरेंद्र किशोर की लिखी इस फिल्म की पटकथा की जमकर तारीफ़ की है विदेशी फिल्म समीक्षकों ने। उल्लेखनीय है कि अभी हाल के वर्षों में देश के हिंदी पट्टी राज्यों में किसान और गृहस्थ के दरवाजे से बूचड़खाने तक गायों के पहुंचाने के अवैध कारोबार को लेकर जमकर हिंसक वारदातें हुई हैं। इस कारोबार में शामिल लोगों को महज शक के आधार पर भीड़ द्वारा घेर कर उनकी ह्त्या करने का सिलसिला जारी है। होली काऊ उन्हीं दरिंदे कहानियों का ऐसा संकलन है जिसे देखकर ढेर सारे सवालों से दर्शक घिर जाते हैं।

अभी हाल ही में मध्यप्रदेश के सिवनी जिले की घटना का जिक्र करते हुए फिल्म के निर्माता-निर्देशक सूरज कुमार कहते हैं कि ‘गोमांस रखने के शक में सिवनी में महिला समेत तीन लोगों की पेड़ से बांधकर मारपीट की गई। ऐसे वारदातों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा बल्कि दुधारू पशुओं के कारोबारियों को ‘गोमांस व्यापारी’ चिन्हित करती भीड़ पहले से कहीं ज्यादा हिंसक होती दिख रही है।” वह आगे बताते हैं कि यही क्रोध रक़बर खान-पहलु खान-मुहम्मद जुनैद-इम्तयाज खां- मोहमद मजलूम-मोहम्मद अखलाख और कासिम जैसे कुछ नामों की ऐसी फेहरिस्त बनाता है जिसके बहाने हिंसक हो चुके देश के मनमिजाज को समझा सके। अभी हाल ही में गोरक्षा के नाम पर इंसानों की सरेराह हत्या पर आधारित उनकी यह डाक्यूमेंट्री फिल्म यूरोपीय मुल्कों में चर्चा में है।

‘हौली काऊ’ फिल्म शुरू से अपना प्रभाव दिखाने में सफल है जबइंसानियत पर हावी हो रहे पाशविकता के मामले में विनायक दामोदर सावरकर गाय को माँ का दर्जा दिए जाने पर ऐतराज जाहिर करते हैं कि ‘गाय की देखभाल करिये, लेकिन पूजा नहीं।’ सावरकर ने गोमांस के राष्ट्रवाद को लेकर कितना बड़ा सवाल उठाया है कि ‘ऐसा क्यों है कि गाय का मूत्र और गोबर तो पवित्र है जबकि अंबेडकर जैसे व्यक्तित्व की छाया तक अपवित्र?’ इतना ही नहीं इस फिल्म ऐसे किसी एक घटना का जिक्र नहीं किया गया है बल्कि देश भर की भीड़ द्वारा मची हिंसा को बहुत बेबाकी से दिखाने का साहस सूरज कुमार ने किया है।

७३ मिनट की इस फिल्म ‘होली काऊ’ में प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो० डीएन झा प्राचीन हिन्दू समाज द्वारा उत्सवों में गोमांस परोसने का हवाला देते हैं। वह बेबाकी से कहते हैं कोई मुझसे आकर पूछे कि हिन्दू प्राचीनकाल में गोमांस खाते थे या नहीं। प्रख्यात समाजविज्ञानी प्रो० सुरेंद्र सिंह जोधका फिल्म में खेतिहर समाज में गाय के आर्थिक महत्त्व की ओर सबका ध्यान खींचते हैं। उनके मुताबिक ‘हरित क्रांति के बाद मशीन पर निर्भर हो चुका किसान बैल रखकर क्या करता। बूढ़ी और लाचार गाय केलिए हमारे यहाँ किस तरह की संवेदना है ?’ वह सपाट अंदाज में कहते हैं क़ि ‘मुसलमान और अनुसूचित जाति का एक ख़ास तबका परंपरागत तौर से गोमांस खाते हैं। और, गाय हिन्दू सेंटीमेंट से जुडी है तो विवाद होना लाजिमी है। लेकिन गाय राष्ट्रीय पशु नहीं है।’ जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय के प्रो० जोधका कैटल इकॉनमी में गाय और बैल की मांग की ओर इशारा करते हैं। प्रो० डीएन झा और प्रो० जोधका के ऐसे व्यक्तव्यों से इस डाक्यूमेंट्री फिल्म के बहाने जिस बहस की शुरुआत होती है, उसे आज गाय के नाम पर हिंसक होता समाज स्वीकार करेगा ? लेकिन सूरज कुमार ने किसी एक पक्ष का सच और उसके तर्क को रखने के बजाये बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद् के प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का मौक़ा दिया है जो लोग अपनी हिंसात्मक गतिविधियों को जायज और वाजिब बताते हैं। इस वजह से यह डाक्यूमेंट्री शुरू से अंत तक संतुलित रही है।

एक ठोस रिसर्च के आधार पर लिखे गए सधे स्क्रिप्ट के साथ दृश्यों का ईमानदार संयोजन इस डाक्यूमेंट्री में देखते ही बनता है। इस कारण समाज के हर पक्ष को शामिल कर समय और दर्शकों के साथ न्याय करने का एक ईमानदार प्रयास है। फिल्म में सोशल मीडिया के क्लिपिंग्स का सहारा जरूर लिया गया है लेकिन पीड़ितों का पक्ष कैमरे के आँखों से जानने का जोखिम सूरज कुमार ने उठाया है। सूरज ने इस फिल्म को बनाने के क्रम में झारखंड-हरियाणा और राजस्थान के दुर्गम इलाकों में अपनी कैमरा टीम के साथ जाने का जोखिम उठाया है। लेकिन वह ईमानदारी से अपनी बात रखते हैं कि “मुझे इस फिम से कोई पोलिटिकल माइलेज नहीं लेना था। अन्यथा मैं इसे लोकसभा चुनाव के कुछ महीने पहले रिलीज़ कर सकता था।”

देश के ज्वलंत सच को उठाती यह फिल्म विवादों को दरकिनार कर जिन वास्तविकताओं को प्रस्तुत करने में सफल रही है उसकी तारीफ़ विदेशी मीडिया में जमकर हो रही है। यहाँ तक कि विदेश की प्रसिद्द फिल्म पत्रिका ‘वेरायटी’ में इसकी सार्थक उपस्थिति का जिक्र किया गया है। यह फिल्म मूल रूप से अंग्रेजी में है, जिसका हिंदी संस्करण भी उपलब्ध है। फिल्म के संपादन और पार्श्व संगीत का अपना एक अलग प्रभाव है। “यह फिल्म किसी आरोप का हथकंडा नहीं है बल्कि यह देश के उस शर्मनाक सच्चाई का लिखित प्रमाण भी है” सूरज कहते हैं। इस फिल्म में जहाँ प्रधानमंत्री के उस चेतावनी को शामिल किया गया है, जब वह अपील करते दीखते है कि ‘इन नकली गौ रक्षकों से बचिए’– प्रधानमंत्री के इस तरह के गुहार के बावजूद एक ख़ास तरह की आस्था रखनेवाले समाज का वह सच उभर कर सामने आता है जहां वह ‘जंगल न्याय’ को अपना चुका है। हिंसा को लेकर उसका यह अपनापन देश के भयावह भविष्य का संकेत भी है। तभी तो पत्रकार मार्क टुली ने इस फिल्म में साफ़ शब्दों में कहा है, ‘मोदी के आने के बाद गाय को लेकर हिंसा बढ़ी है।’
सूरज कुमार ने इस फिल्म के बहाने आधुनिक भारत में घृणा से लबालब अपराधों के घृणित रूपक को बेहद संजीदगी से पेश किया है। देश में आज के माहौल में बनी ऐसी फिल्म एक ऐसा जोखिम है जिसकी प्रशंसा करना भी भारतीय मीडिया के बूते की बात नहीं है।

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