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सुख-दुख

इंडिGo का बुरा हाल.. पराठे बनवाकर लखनऊ के लिए निकले संपादक को झेलना पड़ा फ्लाइट कैंसिल का दंश

सुधीर मिश्रा-

टर्मिनल.. कुछ ऐसे अनुभवों से गुजरा कि आज हॉलीवुड की मशहूर फिल्म द टर्मिनल याद आ गई। पंद्रह दिन पहले दिल्ली से लखनऊ आने जाने का फ्लाइट टिकट बुक कराया था। आम तौर पर लखनऊ की यात्रा ट्रेन से ही करना बेहतर होता है लेकिन क्रेडिट कार्ड के पॉइंट्स का फायदा उठाने के लिए इंडिगो के एयर टिकट ले लिए। फ्लाइट 27 दिसंबर को रात साढ़े नौ बजे की थी।

एक दिन पहले ही यानी कल शाम फोन आया कि फ्लाइट कैंसिल हो गई। पैसे वापस ले लें या कोई दूसरी फ्लाइट ले लें। मैने उनके विकल्प देखे और 27 दिसंबर की पौने छह वाली फ्लाइट बुक कर ली। सोचा थोड़ा जल्दी पहुंच जाएंगे।

दोपहर को कुक से बढ़िया भरवा पराठे बनवाए और श्रीमती जी से कहा शाम को खाना मत बनाना, मैं यहां से बनवाकर ला रहा हूं। पांच बजे बोर्डिंग टाइम था तो मैं एक घंटा पहले चार बजे टर्मिनल टू पर लाइन में लग गया। जैसे ही मेरा नंबर आया तो पता चला कि मेरी फ्लाइट कैंसिल है। मुझे काटो तो खून नहीं। एयर लाइंस ने मुझे कोई इत्तला नहीं दी थी और लखनऊ में सारे दोस्तों के साथ टाइम फिक्स था और फिर पराठे भी तो पैक थे। घर वालों का शाम का खाना तो मेरे साथ था।

पता करने एयरलाइंस के काउंटर पहुंचा तो वहां अच्छी खासी भीड़ थी। वहां बैठे सज्जन ने कहा कि अब आज की कोई फ्लाइट नहीं मिल सकती। अगर आप कहें तो कल की कोई फ्लाइट बुक कर दूं। मेरा गुस्सा तो सातवें आसमान पर था लेकिन मैंने मन को शांत रखा और विंडो से हटकर एयरपोर्ट देखने वाले अपने साथी रिपोर्टर कुणाल को फोन किया। उसने इंडिगो पीआरओ से बात कराई। एक मेल आईडी भी दिया। मैने अपनी परेशानी उस id पर सभ्य भाषा में मेल कर दी।

आश्चर्य की बात यह थी कि मेरी फ्लाइट कैंसिल बताई जा रही थी पर इंडिगो की बाकी फ्लाइट्स जा रहीं थी, बोर्ड पर उनका डिटेल भी आ रहा था। पीआरओ टीम हेल्प नहीं कर पा रही थी। उनके पास इस बात का जवाब नहीं था कि मौसम और कोहरे का असर कुछ फ्लाइट्स पर ही क्यों है जबकि उसी वक्त में उसी एयरलाइंस की दूसरी फ्लाइट्स जा रही हैं। अपने सूत्रों से पता चला कि कोहरे में विमान उड़ा पाने की दक्षता सारे पायलट्स की नहीं होती। इसकी एक खास ट्रेनिंग होती है और वह काफी महंगी होती है। एयर एयरलाइंस सारे पायलट्स घने कोहरे में फ्लाइट नहीं उड़ा सकते।

बहरहाल इधर इंडिगो के काउंटर पर भीड़ बढ़ती जा रही थी। मैं भी वहीं डट गया। यह सोचकर कि दूसरों की परेशानी समझी जाए। कई लोग रो रहे थे, कुछ बेहद परेशान और गुस्से में थे और विदेशी तो समझ ही नहीं पा रहे थे कि यहां हो क्या रहा है।

अमृतसर से लंदन जा रहे एक दंपति की तो लंदन की फ्लाइट ही छूट गई क्योंकि सुबह छह बजे की उनकी फ्लाइट दिल्ली दोपहर एक बजे पहुंची। उनके पास न दिल्ली में ठहरने का कोई इंतजाम था और न ही ज्यादा पैसे। ऐसे ही दुख तकलीफ हर यात्री के थे। इस बीच मैंने कोशिश की कि लखनऊ मेल या एसी स्पेशल ट्रेन ही मिल जाए तो उधर निकल जाऊं पर वहां भी आफत मची थी। इस बीच मैं यात्रियों की परेशान के वीडियो बनाने लगा तो विंडो पर बैठे युवक ने कहा के आप कल दोपहर वाला टिकट ले लीजिए। मैने कहा कि तब तक के लिए आप मुझे होटल दें। उसने ऊपर बात की तो मुझे और कुछ अन्य यात्रियों को होटल भेजने का इंतजाम किया गया।

एयरलाइंस की कैब से ही शाम सात बजे के करीब वसंतकुंज में होटल ग्रैंड में छोड़ा गया। इस फाइव स्टार होटल में मैं करीब बीस साल पहले तब रुका था जब यह ग्रैंड हयात हुआ करता था। रिसेप्शन पर मुझसे कहा गया कि पहले आप डिनर ले लें तब तक वहां की औपचारिकता पूरी होगी। मैं डिनर करने होटल के रेस्त्रां चला गया।

आम तौर पर शाम को दो सूखी रोटी और सूखी सब्जी खाता हूं। सेहत दुरुस्त रखने के लिए पर आज गुस्सा खाने पर उतरा। सूप से लेकर डेजर्ट और चाइनीज से लेकर कॉनिनेंटल तक सारी डिशेज टेस्ट कीं। खाने पीने का कार्यक्रम करीब एक घंटे तक चला। तब तक एयरलाइंस से फोन आ गया। आप चाहें तो साढ़े नौ वाली फ्लाइट से जा सकते हैं। मुझे तुरंत याद आया कि घर के लिए पराठे बनवाकर रखे हैं मैने, फ्लाइट भी मिल रही है। तुरंत हां बोला, होटल से कैब ली और पौने नौ बजे टर्मिनल टू के गेट नंबर चार पर पहुंच गया।

एक इंडिगो कर्मी मेरा इंतजार कर रहा था। उसने ताबड़तोड़ तेजी से मेरा सिक्योरिटी क्लीयरेंस कराया और मेरा सामान लेकर साथ में फ्लाइट के भीतर तक लेकर गया और सॉरी बोलते हुए बाय बाय किया। कोहरा भयंकर था। दिल्ली और लखनऊ दोनों जगह पर फ्लाइट उड़ी और सिर्फ 45 मिनट में लखनऊ आ गई। एयरहोस्टेस ने थैंक यू बोला मैंने जवाब में कहा कि मेरा धन्यवाद कैप्टन को दीजिए जो इस कोहरे में फ्लाइट सही सलामत लाए।

बहरहाल लखनऊ आया, घर पहुंचे और पराठे का डिब्बा खुला, फिर समझ आया कि दाने दाने पर लिखा होता है, खाने वाले का नाम। शायद इन पराठों की किस्मत ऐसी थी कि इतनी मुसीबत के बाद भी मैं लखनऊ आ ही गया।

लेखक नवभारत टाइम्स दिल्ली के संपादक हैं.

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