दो बड़े अंग्रेजी अखबारों के संपादक दिवाकर अस्थाना और पीआर रमेश ट्रांसफर-पोस्टिंग के खेल में जुटे हैं! (देखें सुबूत)

टाइम्स आफ इंडिया के एक संपादक हैं, दिवाकर अस्थाना. ये हर किसी को ‘बाबू’ कह कर बुलाते हैं. एक रोज (31 मई, शाम चार बजे) इन्होंने गलती से एक मैसेज टाइम्स आफ इंडिया के पत्रकारों के लिए बने ह्वाट्सअप ग्रुप पर पोस्ट कर दिया. इस मैसेज की शुरुआत भी बाबू संबोधन से हुई थी लेकिन आगे जो कुछ लिखा गया था, उसे पढ़कर ह्वाट्सअप ग्रुप से जुड़े सारे पत्रकारों की आंखें फटी की फटी रह गई.

मैसेज का लब्बोलुआब ये था कि संपादक जी एक आईआरएस अधिकारी अनुपम सुमन को बता रहे थे कि तुम्हारे लंदन पोस्टिंग के बाबत हम और इकानामिक टाइम्स के ब्यूरो चीफ पीआर रमेश वित्त मंत्री अरुण जेटली से मिले थे. जेटली जी से तुम्हारी लंदन पोस्टिंग को लेकर चर्चा हुई. असल में आईआरएस अधिकारी अनुपम सुमन इन दिनों निजी वित्त पोषित पढ़ाई पर लंदन में हैं और चाहते हैं कि उनकी पोस्टिंग भी यहीं हो जाए, इनकम टैक्स की ओवरसीज यूनिट (ITOU) में.

आईआरएस अधिकारी अनुपम सुमन 2004 बैच के हैं. टीओआई के एक्जीक्यूटिव एडिटर दिवाकर अस्थाना के इस मैसेज के टाइम्स आफ इंडिया वाले पत्रकारों के ग्रुप में पोस्ट होते ही हड़कंप मच गया. जब तक किसी ने अस्थाना का ध्यान इस गलती की ओर दिलाया, तब तक काफी देर हो चुकी थी और लोग स्क्रीनशाट लेकर मैसेज को दूसरों तक पहुंचाने फैलाने में जुट गए थे. इस मैसेज के सार्वजनिक हो जाने के बाद चर्चा तेज हो गई कि क्या संपादक लोग अब दलाल बनकर रह गए हैं? क्या इनका काम अब ट्रांसफर-पोस्टिंग कराना भर रह गया है?

इस मैसेज को नीरा-बरखा टेप वाले प्रसंग के क्रमिक विकास के तौर पर देखा जा रहा है और माना जा रहा है कि भारतीय बाजारू पत्रकारिता में कोई सुधार आने की जगह इसका रूप धीरे धीरे दिन प्रतिदिन ज्यादा बाजारू और घटिया होता जा रहा है. इस मैसेज से तो यह साफ है कि अंग्रेजी के दो बड़े संपादक लोगों का असल काम ट्रांसफर पोस्टिंग है, वे चौथे खंभे के लिए जन सरोकार के तहत पत्रकारिता कतई नहीं कर रहे हैं. टाइम्स आफ इंडिया के संपादक दिवाकर अस्थाना ने जो मैसेज आईआरएस अफसर को भेजना चाहा था और गलती से टीओआई जर्नलिस्ट्स के आंतरिक ग्रुप में भेज दिया, वह इस प्रकार है-

Babu, met FM along with Ramesh regarding ITOU. He called Dash and in the presence of FM, the latter agreed that CBDT has wrongly held that you are in deputation when you are actually on study leave. It was also clarified in the presence of FM, that your fellowship has not been funded by government. Dash told FM that Arun ji had spoken directly with CBDT chief and , therefore, he was not in the loop. He also told FM that the matter is no longer with finance ministry as the CBDT has referred it to the foreign service board under MEA. Upon this , I said that FM, being the competent authority, can overturn the decision of CBDT. Dash said that we can scrap the entire ITOU panel as recalling the name for just London station may not look good. Upon this FM said ok and told us ‘chalo’. What do you think of it.

मैसेज का स्क्रीनशाट देखें…

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टाइम्स आफ इंडिया वालों ने चित्रा सिंह को लेकर इतना बड़ा झूठ क्यों छाप दिया!

खबर पढ़ाने के चक्कर में खबरों के साथ जो बलात्कार आजकल अखबार वाले कर रहे हैं, वह हृदय विदारक है. टाइम्स आफ इंडिया वालों ने छाप दिया कि सिंगर चित्रा सिंह ने 26 साल बाद का मौन तोड़ा और गाना गाया. टीओआई में सचित्र छपी इस खबर का असलियत ये है कि चित्रा सिंह ने कोई ग़ज़ल / भजन नहीं गया. उन्हें मंच पर बुलाकर सिर्फ सम्मानित किया गया था. लेकिन खबर चटखारेदार बनाने के लिए छाप दिया कि चित्रा ने गाना गाया.

पढ़िए आप भी टीओआई में छपी झूठी खबर….

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टीओआई के राजशेखर झा बताएं, किसके कहने पर नजीब-आईएस वाली ख़बर प्‍लांट की थी?

जेएनयू के लापता छात्र नजीब के बारे में टाइम्‍स ऑफ इंडिया में इसके पत्रकार राजशेखर झा ने फर्जी खबर प्‍लांट की. इस खबर में बताया गया कि दिल्ली पुलिस ने जांच में पाया है कि नजीम यूट्यूब और गूगल पर आईएस (इस्लामिक स्टेट) के बारे में वीडियो आदि खोज देखा करता था, साथ ही वह आईएस की कार्यप्रणाली, विचारधारा, भर्ती आदि के बारे में अध्ययन करता था. खबर में बताया गया कि दिल्ली पुलिस ने नजीब की लैपटाप के जांच के बाद यह जानकारी हासिल की है. उधर, इस खबर के छपने के बाद दिल्ली पुलिस ने खंडन भेज दिया कि उसने ऐसी कोई जांच लैपटाप की नहीं की और न ही ऐसा कोई नतीजा निकला है.

फर्जी खबर की सच्‍चाई सामने आने के बाद सोशल मीडिया में टीओआई के राजशेखर झा के खिलाफ अभियान चला. फिर भी इस शख्स ने माफी नहीं मांगी. हां, जो उससे सवाल पूछता था उसे वह ट्विटर पर ब्‍लॉक किए जा रहा था. बाद में राजशेखर झा ने अपना फेसबुक एकाउंट बंद कर दिया. अपने ट्विटर एकाउंट की सेटिंग ऐसी कर ली कि केवल वेरिफाइड यूजर्स ही उसके एकाउंट तक पहुंच सकते थे.

नजीब को पुलिस अब तक खोज नहीं पाई है. पुलिस को खुद टाइम्‍स ऑफ इंडिया की खबर का खंडन देना पड़ा है. मान लीजिए कि नजीब (कोई और नाम सुविधा के लिए चुन सकते हैं) अगर मौजूद होता और इस अखबार में बिलकुल 21 मार्च वाली खबर छपती कि वह इस्‍लामिक स्‍टेट के बारे में गूगल और यूट्यूब पर खोजता था और उसके नेताओं के भाषण सुनता था, तब कैसा नज़ारा होता? दिल्‍ली पुलिस को उसे गिरफ्तार करने में घंटा भर भी नहीं लगता. उसके खिलाफ़ साक्ष्‍य गढ़ लिए जाते. एक खबर दूसरी खबरों का आधार बन जाती और बड़े-बड़े हर्फों में करार दिया जाता कि आइएस का दिल्‍ली मॉड्यूल जेएनयू से ऑपरेट करता था.

यह कितना खतरनाक हो सकता है, उसे बताने की ज़रूरत नहीं. हम दिल्‍ली के कश्‍मीरी पत्रकार इफ्तिखार गीलानी का हश्र देख चुके हैं जिस मामले में कई पत्रकारों ने गलत रिपोर्टिंग कर के आतंक के मामले में उन्‍हें जेल की हवा खिलवा दी थी. नीता शर्मा ने पुलिस की थ्यूरी के हिसाब से खबर प्‍लांट कर गीलानी को दोषी बना दिया था, जिसकी थर्ड डिग्री सज़ा गीलानी को भुगतनी पडी. इस पत्रकारिता जगत में गीलानी आज भी दिल्‍ली के आइएनएस बिल्डिंग वाले रुफी मार्ग इलाके में दिन-भर दौड़भाग करते पाए जाते हैं जबकि नीता शर्मा सर्वश्रेष्‍ठ रिपोर्टर का तमगा हासिल कर के अपने पाप से मुक्‍त हो चुकी हैं.

चकोलेबाज़ के नाम से एक ट्वीट आया है जिसमें गरीब मुसलमानों की जिंदगी बरबाद करने का आरोप कुछ पत्रकारों पर लगाया गया है. नीता शर्मा का भी उसमें नाम है. नीता शर्मा ने गीलानी की जिंदगी बरबाद की तो नजीब के मामले में टाइम्‍स ऑफ इंडिया के राजशेखर झा ने बहुत गंदा काम किया है.

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TOI MUST APOLOGISE FOR FALSE NAJEEB STORY

The Delhi Union of Journalists is shocked that a leading daily like the Times of India should have discredited itself by publishing a malicious and misleading report on the missing JNU student Najeeb. The DUJ demands that the TOI issue an immediate apology for maligning a boy who is ‘missing and unable to defend his reputation.

The TOI report alleged that Najeeb had been surfing the Internet for information on the Islamic State and ways to join it.  It claimed that he had watched many videos on the Islamic State and was “watching a video of the speech of an IS leader on the night of October 14, just before he had a scuffle with ABVP members…” The story by TOI reporter Rajshekhar Jha was published both on the front page and page three on March 21, 2017.

This kiteflying story was attributed to unnamed police sources and claimed the police had received “a report on the browsing history of Najeeb’s laptop from Google and YouTube”.  The following day Deputy Police Commissioner Madhur Verma denied that any report had been received from Google and YouTube and said “investigation conducted so far has not revealed anything to suggest that Najeeb had accessed any site relating to IS”. Special Commissioner of Police and Delhi police spokesperson Dependra Pathak also rubbished the TOI story in his statement to Hindustan Times.

It is apparent that the story was meant to discredit Najeeb and find an alibi for the Delhi Police’s inability to trace the missing boy. The story went into great detail on reported Police moves to search for him.

Jha’s clearly motivated story also went into allegations about Najeeb’s medical history, claiming he had been on drugs for obsessive compulsive disorder, sleeplessness, depression, fits, panic attacks and agoraphobia.  Najeeb’s family has previously denied that he was on such medication but the TOI chose to repeat all this in great detail.

The TOI published the false story on its front page with the heading “Najeeb saw IS videos, websites” on March 21, 2017 and another report on page three with a three-column bold headline “Najeeb searched for information on IS”.  However, the retraction it was forced to publish after criticism on social media was carried as a single column item on page 5 with the neutral headline, “Police deny Najeeb report” on March 22, 2017. This was merely a verbatim report of a statement by DCP Verma.

The Delhi Union of Journalists demands an apology by the TOI for its irresponsible and false reports. It also demands that the story be removed from its website immediately.

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TOI का पेड न्यूज : इससे ज्यादा बिकी हुई राजनीतिक खबर आज तक नहीं पढी

Chandan Srivastava : कुछ पैसे लेकर The Times of India ने आज एक पेड न्यूज अयोध्या विधानसभा से बसपा प्रत्याशी के समर्थन में छापी है। इस पेड न्यूज में मतदाताओं के बयान कुछ इस प्रकार छपे हैं-

‘लड़के की सच्चाई से हम बहुत प्रभावित हैं। पिछले साल पीस पार्टी को वोट दिए थे लेकिन इस बार हाथी को देंगे।‘

‘उसका मुसलमान होना उसके जीत की गारंटी है।‘

हमें उनके मुसलमान होने से कोई मतलब नहीं। हमारा वोट हाथी को ही जाता है।‘

और अंत में प्रत्याशी का बयान है-

‘यहां एससी मतदाताओं की संख्या 80 हजार है और मुसलमान की 60 हजार। यदि इन दोनों का 70% वोट भी हमें मिलता है तो एससी का 55 हजार और मुसलमान का 30 हजार वोट होगा। जिससे हमारी जीत सुनिश्चित है।‘

इससे ज्यादा बिकी हुई राजनीतिक खबर मैनें तो आज तक नहीं पढी है। यदि आपने पढी हो तो बताईएगा।

लखनऊ के पत्रकार और वकील चंदन श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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टाइम्स आफ इंडिया में प्रिंट मीडिया मालिकों के पक्ष में छपे संपादकीय का जवाब डीयूजे ने भी भेजा

A Reply to The Times of India

On the eve of the budget session and state elections the newspaper industry has made out a case for financial sops, including exemptions from the forthcoming Goods and Services tax, and higher government advertisement rates. The pretext is the losses it claims it faces as a result of paying journalists and other employees fair wages. This is a case of killing two birds with one stone: make a killing by getting more money from the government and by denying employees the dues ordered by the Majithia Wage Board.

We are alarmed in this context to see the Times of India, which has set itself up as a battering ram of newspaper industry interests, seek through its editorial pages to delegitimise the wage board process which has been a vital part of the protective legislation for press freedom. We also seriously object to this continuing misuse of editorial pages in the press to argue a one-sided case for newspaper industry owners.

We wish to point out that newspaper houses are increasingly splashing out on gala events and promotions, fashion shows, beauty contests and five-star award ceremonies but are unwilling to pay their employees decent wages. Instead, they are cracking down on trade unions in the industry and resorting to large scale contract employment to bypass the Wage Board. They have even questioned the need for wage fixation machinery and the Working Journalists Act itself.  By tradition the Government of India appoints a new Wage Board every ten years; it is time for the next one to be appointed but the employers refuse to honour even the previous Award.

The BJP government’s demonetisation decision of November 8, 2016, is now being misused as a pretext for cracking down on employees. We are shocked to see a number of major national newspapers and several regional players, responding with mass retrenchments of journalists and other industry workers. These retrenchments are being done in secrecy, invariably in violation of existing labour laws, in a manner that exploits the economic and financial vulnerability of workers whose livelihoods are at stake. Many of those retrenched are forced to resign and sworn to secrecy in the process, on pain of losing the measly two months’ salary they are granted as compensation.

The Times of India in its editorial page article of January 19 (“Indian newspaper industry: Red ink splashed across the bottom line”), makes a case that it is doing the readership a great favour by keeping selling price low. This goes against its boasts, propagated through its own news pages, about the affluence of its readers and their high purchasing power. It also glosses over the role it has played over the years in launching a corrosive “price war” within the newspaper industry, which has forced competition to follow suit, driven many other titles to the wall and destroyed pluralism and diversity in the press.

Managements have been pursuing profit at the cost of the integrity of the industry’s basic function of gathering news and presenting it in a credible fashion. The boom and bust cycle of the global economy has therefore impacted an industry that has in its lust for profits, chosen to depend increasingly upon advertisements, rather than seek to expand readership through quality news reporting. This does not mean that it cannot afford to pay legally mandated wages ordered by a government appointed tripartite Wage Board, headed by a retired judge, which went into the industry’s finances in great detail before ordering pay hikes. The newspaper management challenged the Justice Majithia Wage Board Award in the Supreme Court but lost. The Award has the stamp of approval of the Supreme Court. However, the majority of newspaper owners have chosen to flout the judgement and have still not paid the awarded wages, let alone arrears.

Now the Award and the notional losses caused by it are being used as an argument to get government support for the industry and shore up private profits. Media owners are feverishly lobbying for tax exemptions for newsprint which would otherwise be done away with under the impending GST regime. Media houses have thrived on this subsidy for decades. To make employees a scapegoat in this tug of war with the government is malicious and unjust.

We would draw attention to only a few instances where the Times of India seeks to mislead, contrary to the lofty purpose it embraces of educating. At some point in its spiel, it says that an (unnamed) publicly-listed newspaper company has had “revenue growth” of 4 percent compounded annually since 2011-12, while manpower costs have jumped by “over 58 percent”.

This is a deliberate effort at misleading. If the Times of India wants to make a case of unjust manpower cost escalation, it has to provide a calculation on comparable bases. In the five years since 2011-12, 4 percent compound annual growth would amount in aggregate to about 20 percent. So the comparison against the supposed 58 percent growth in manpower costs is not really as terrible as the figure of 4 versus 58 would suggest.

Secondly, we have serious reasons to question the authenticity of the figures that the Times of India presents, since the newspaper entity remains unidentified.

Thirdly, we also have reasons to doubt if the increase in manpower costs – assuming it is accurately calculated – has anything to do with the basic mission of the newspaper. We would like to see the annual report of Bennett Coleman and Co Ltd (BCCL) – publishers of the Times of India. We believe that it is imperative if the company is making a case for policy intervention, that it should adopt this element of transparency.

From a document extracted from the public record, we know that BCCL incurred salary and wage costs of Rs. 551 crore in 2010-11, on “operating revenue” of almost Rs.4,500 crore and “other income” of about Rs. 300 crore. Manpower costs in other words, amounted to just over 11 percent of total revenue for the company.

Breaking down the “manpower cost” component reveals that Rs. 102 crore out of the total, i.e., close to 20 percent, is absorbed in remunerations to just 40 employees. This list of 40 includes only four whose function could be identified as journalism.

BCCL have taken on themselves the mission of arguing for press freedom as a public good.

We call on them to make their records public and allow a full evaluation of their record of decisions that have violated the public interest.

Failing that, we call on the Times of India to honour the basic rules of journalistic ethics and permit journalists’ unions the right to reply in its columns.

We also call on the newspaper industry to cease the campaign for a special policy dispensation from the Government that would be corrosive of workers’ rights. To argue for this dispensation just on the eve of crucial elections to a number of state assemblies, is to surrender the claim to independence and to further erode the public credibility of the press.

(SK Pande)
President

(Sujata Madhok)
General Secretary

Delhi Union of Journalists Delhi

duj.delhi@gmail.com

Press Release

पूरे मामले को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें….

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झूठ का पुलिंदा है टाइम्स ऑफ इंडिया का संपादकीय

जयपुर। सुबह-सुबह टाइम्स ऑफ इंडिया खोलते ही संपादकीय पेज के Indian newspaper industry : Red ink splashed across the bottom line शीर्षक से प्रकाशित लेख पर निगाह पड़ गई। चूंकि मसला प्रिंट मीडिया से संबंधित था, तत्काल पढ़ डाला। पूरा लेख झूठ का पुलिंदा है। प्रिंट मीडिया के मौजूदा हालात पर आंसू (घड़ियाली) बहाए गए हैं। अपने एक भी कर्मचारी को मजीठिया वेजबोर्ड का लाभ न देने वाले टीओआई ने वेजबोर्ड को लागू करने से हो रहे नुकसानों को बताया है। अखबार लिखता है कि स्थितियां इतनी गंभीर हो चली हैं कि बड़े नेशनल डेली न्यूजपेपर्स को संस्करण (हाल में हिंदुस्तान टाइम्स ने चार संस्करणों पर ताला लगाया है) बंद करने पड़ रहे हैं, स्टाफ की छंटनी हो रही है, कास्टकटिंग जारी है, खर्चे कम करने पड़ रहे हैं। लेख में अखबारों को नोटबंदी से हुए नुकसान और आगामी जीएसटी की टैक्स दरों पर चिंता जाहिर की गई है।

लेख में हास्यास्पद तो यह है कि सरकार ने वेजबोर्ड लागू कराकर प्रिंट मीडिया के जख्मों को हरा करने का काम किया है और एरियर समेत वेतन में 45-50 प्रतिशत तक वृद्धि के लिए मजबूर किया है। द हिंदू (प्रतिद्वंद्वीअखबार) और पीटीआई (समाचार एजेंसी) का उदाहरण देते हुए उनके लाभ में कमी होने की बात कही है। यह सही है कि पीटीआई (वेतन व एरियर में 173 प्रतिशत की वृद्धि हुई) ने वेजबोर्ड लागू किया है और एरियर भुगतान भी किए हैं, पर द हिंदू ने आधा-अधूरा वेजबोर्ड लागू कर ग्रेड के अधिकांश कर्मचारियों को वीआरएस के लिए मजबूर किया है।

सच्चाई तो यह है कि असम ट्रिब्यून जैसे इक्का-दुक्का अखबारों को छोड़ दें तो अधिकांश अखबारों ने मजीठिया वेजबोर्ड लागू नहीं किया है। 11 नवंबर 2011 को केंद्रीय कैबिनेट के नोटिफिकेशन और मार्च 2014 में सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बावजूद अखबारों की हठकर्मिता जारी है, जबकि वो हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई हार चुके हैं। अधिकांश अखबारों (हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के ज्यादा) ने गलत ढंग से कर्मचारियों को डरा-धमाका कर 20जे नामक कागज पर हस्ताक्षर कराएं हैं, जिसको अब वे वेजबोर्ड न देने की ढाल बना रहे हैं। भला सोचिए जिस कर्मचारी कम वेतन पर क्यों राजी होगा?

लेख में डीएवीपी की दरों को अक्टूबर 2010 के बाद से रिवाइज न करने की बात है, पर कमर्शल विज्ञापन दरों पर मौन साध लिया है। ये जगजाहिर है, टीओआई के विज्ञापन देश में सबसे ज्यादा दरों के हैं, इसके क्लासीफाइड विज्ञापन भी हजारों रुपए के होते हैं। सभी अखबारों में कमर्शियल विज्ञापनों की दरें हर साल बढ़ाई जा रही हैं। द इकोनोमिस्ट की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि भारत में प्रिंट बढ़ रहा है और फलफुल रहा है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कॉरपोरेट विज्ञापनों का 43 प्रतिशत प्रिंट को मिलता है। 2010 से 2014 के बीच अखबारों की विज्ञापन बढ़ोतरी 40 प्रतिशत रही।

यहां तक कि अखबारों ने एडवर्टोरियल के नाम पर नियमित परिशिष्ट छापकर पैसा कमाना शुरू कर रखा है। लेख में अखबार की कम कीमत (3-5 रुपए प्रति कॉपी) का रोना भी रोया है। सरकार से सस्ती दरों पर अखबारी कागज और ढेरों सुविधाएं लेने के बाद यह रोना अनुचित है। लेख में प्रिंट जर्नलिस्ट के खत्म होने और एक ही दिन में ऑनलाइन, टीवी, प्रिंट के लिए काम करने पर जोर दिया गया है। हद तो यह है कि कम वेतन में सारे मीडिया हाउस ये सारे काम एक ही कर्मचारी से लेने पर उतारू हैं। एक कर्मचारी से 12-14 घंटे तक काम लिया जा रहा है या उससे करने की उम्मीद की जा रही है।

सच्चाई तो यह है कि अखबारों का व्यापार दिन-प्रति-दिन बढ़ रहा है। टीओआई को ही लें तो यह न केवल प्रिंट मीडिया (अंग्रेजी व क्षेत्रीय भाषाओं में भी) में है, बल्कि आज मैगजीन, टीवी, रेडियो, वेब से भी अरबों रुपए कमा रहा है। यही स्थिति सारे प्रिंट मीडिया की है। दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका आदि प्रिंट, रेडिया, वेब में हैं। पत्रिका तो जल्द टीवी चैनल लाने जा रहा है। क्या यह सब धर्मार्थ हो रहा है, बिना लाभ ये विस्तार किया जा रहा है? सरकार से सस्ती दरों पर मिली जमीनों पर बने ऊंचे भवन किराए लेने का माध्यम बने हुए हैं। राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, लोकमत समेत अधिकांश अखबारों ने सरकारों से सस्ती दरों पर जमीनें ली हैं और आज उनका वाणिज्यिक इस्तेमाल हो रहा है।

हद तो यह है कि जब चंद पत्रकार और गैर पत्रकार मजीठिया वेजबोर्ड न लागू करने पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे तो अखबारों ने प्रताड़ना चक्र शुरू कर दिया (अधिकांश कर्मचारी नौकरी जाने के भय से आज भी शोषण का शिकार हैं)। राजस्थान पत्रिका ने 65 से अधिक कर्मचारियों का या तो ट्रांसफर किया है या उन्हें बर्खास्त कर दिया गया है। इनमें समाचार संपादक और उप समाचार संपादक स्तर के पत्रकार भी शामिल हैं। दैनिक जागरण में बड़ी संख्या में कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है। दैनिक भास्कर में कई कर्मचारी बाहर हैं। कई अन्य अखबारों की भी यही स्थिति है। विडंबना यह है कि कोई अखबार मजीठिया वेजबोर्ड के लिए कोर्ट पहुंचे कर्मचारी को नौकरी नहीं दे रहा है। टीओआई ने प्रिंट मीडिया का दुखड़ा तो रोया है, पर प्रताड़ित कर्मचारियों के हित में दो शब्द तक नहीं कहे।

मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि कर्मचारी वेतन पर अखबार लाभ का 4-5 प्रतिशत ही खर्च करते हैं। यदि अखबार थोड़ा-सा और दे दें तो कर्मचारियों की हालत सुधर जाती। पर, स्थिति बेहद गंभीर है। अब वेतन कम और मल्टीटास्कर कर्मचारी ज्यादा चाहिए। मीडिया के बाहर की स्थिति देखी जाए तो अन्य सेक्टरों में वेतन फिर भी ठीक है। टीओआई ने इस लेख से जो शुरुआत की है, वो जल्द अन्य अखबारों में भी दिखेगी। पहले भी इन मीडिया घरानों ने सुनियोजित तरीके से एक के बाद एक लेख वेजबोर्ड को नकारते हुए लिखे थे। मेरा तो चैलेंज है, 100 ऐसे ड्राइवर और चपरासी टीओआई दिखा दे, जिनका तीन गुना वेतन तक बढ़ा है? सुप्रीम कोर्ट में इन मीडिया घरानों के खिलाफ लड़ाई जारी है। जीत कर्मचारी की होगी, न्याय देर से सही मिलेगा जरूर।

लेखक विनोद पाठक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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