कहां मर गए बनारस के मीडियाकर्मी और पत्रकार संगठन जो अपने एक बुजुर्ग साथी को न्याय नहीं दिला पा रहे! देखें वीडियो

अपने छिने आशियाने को पाने के लिए अकेले ही दर दर भटक रहे हैं श्रीकांत तिवारी जी.

आश्वासन की चाभी पर भारी पड़ रहा है दबंगों का ताला

वाराणसी। इंसाफ की आस में 15 दिन गुजार चुके हैं सीनियर सिटीजन और वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत तिवारी। अर्जियां लिखने से लेकर थाने की परिक्रमा करने के बाद भेलूपुर पुलिस से मिली आश्वासन की चाभी से हाल-फिलहाल तक वरिष्ठ पत्रकार और सीनियर सिटीजन डॉ श्रीकांत तिवारी के केदार घाट स्थित किराये के मकान पर लगा दबंगों का ताला खुल नहीं सका है।

पुलिस के निर्देश के बावजूद दंबगों का ताला पुलिसिया आश्वासन पर भारी पड़ रहा है। बीते बुधवार को एसओ भेलूपुर के सामने थाने पर दोनों पक्षों से हुई बातचीत के दौरान ही एसओ ने दूसरे पक्ष को (जो खुद भी कुमार स्वामी मठ के भवन में बतौर किरायेदार रहता है) उसे ताला खोलने का निर्देश दिया था। डॉ तिवारी को आश्वस्त किया गया कि शाम 4 बजे तक ताला खुल जायेगा। बावजूद इसके दो दिन बीत जाने के बाद भी दरवाजे पर लटका ताला बता रहा है कि पुलिस की बात थाने तक, दबंगों का राज हर तरफ।

सूत्रों की मानें तो कुमार स्वामी मठ के जिस भवन में डा.तिवारी रहते हैं उस मठ में व्यावसायिक गतिविधियां चलाने की योजना अंदरखाने में चल रही है। श्रीकांत तिवारी के बतौर किरायेदार रहते योजना जमीनी रूप में नहीं ढल पा रही है। इसीलिए लाक डाउन के दौरान श्रीकांत तिवारी के गांव में फंसे होने का फायदा उठाकर दूसरे पक्ष ने तालाबंदी के काम को अंजाम दे डाला।

गांव से लौटने के बाद से परेशान डा. तिवारी न्याय के लिए पुलिस प्रशासन से गुहार लगा रहे हैं लेकिन आज तक उन्हें आश्वासन ही मिल रहा है। ताला खुलने के चक्कर में वो थाने का चक्कर लगा रहे हैं लेकिन कोई उम्मीद की किरण उन तक पहुंच नहीं रही है। ताला बंद करने से लेकर थाने में ताला खोलने की बात कहकर मुकर जाने वाले भारी पड़ रहे हैं।

सुनें बुजुर्ग पत्रकार साथी श्रीकांत तिवारी की पीड़ा, उन्हीं की जुबानी-

डॉ श्रीकांत तिवारी का कहना है कि उनकी हत्या भी हो सकती है। वैसे भी घाट किनारे बने मठ-मंदिरों और घरों पर कब्जे के ढेरों किस्से घाट किनारे के इलाकों में है। ताकतवर यहां हमेशा बीस पड़ा है। ऐसे में 72 साल के वरिष्ठ पत्रकार और सीनियर सिटीजन के मामले की उपेक्षा किसी बड़े हादसे का सबब बन सकता है। सवाल ये भी है कि बनारस के नौजवान पत्रकार कहां छिपे बैठे हैं, बनारस के पत्रकार संगठन कहां सो रहे हैं जो अपने एक बुजुर्ग साथी को न्याय नहीं दिला पा रहे हैं? याद रखें, आज आप चुप हैं तो कल जब आपकी बारी आएगी तो कौन बोलेगा? इसलिए कम से कम अपनी बिरादरी के जेनुइन सवालों पर तो आवाज उठाना, सड़क पर उतरकर संघर्ष करना, पुलिस-प्रशासन पर दबाव बनाने का काम करिए।

बनारस से भास्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट.

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