कानपुर प्रेस क्लब पोलखोल : महामंत्री के बयान में सच को छिपाने की कोशिश

कानपुर प्रेस क्लब के वर्तमान स्वयंभू महामंत्री अवनीश दीक्षित ने अपने और अपने साथियों के अपराध को छिपाने के लिए कुछ ऐसे बयान दे दिए, जिन्होंने प्रेस क्लब की विश्वसनीयता पर ही प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिए।  

दबंगई के बल पर कानपुर प्रेस क्लब पर फ़र्ज़ी प्रपत्रों और फ़र्ज़ी चुनाव के जरिये कब्ज़े की शिकायत कानपुर के अधिकारीयों के साथ प्रदेश के डीजीपी, मुख्यमंत्री और राजयपाल से की गई थी, लेकिन उसे गंभीरता से नहीं लिया गया। डिप्टी रजिस्ट्रार फर्म सोसायटीज एवं चिट्स ने जून में ही अवनीश दीक्षित को नोटिस जारी कर सुनवाई की डेट पर जवाब देने के लिए लिख दिया था, जिस पर विगत दो डेट में सुनवाई में दीक्षित ने अपना 25 बिन्दुओं पर जवाब प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने बचाव के लिए कुछ ऐसे बयान दिए, जिन्होंने कानपुर प्रेस क्लब की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं । 

दीक्षित ने अपने जवाब में कहा है कि कानपुर प्रेस का गठन एक निर्वाचन के बाद हुआ। उपनिबन्धक कार्यालय से प्राप्त नियमावली के अनुसार ही संस्था अपने दायित्व का निर्वाहन कर रही है। हम नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने किसी भी स्तर पर नियमों का उलंघन नहीं किया है। 12 दिसम्बर 2010 को भूपेन्द्र तिवारी की अध्यक्षता में आहूत विशेष बैठक का कोरम पूरा था तथा सभी फैसले न्याय संगत थे।  

जबकि 2013 में चुनाव कराये जाने व चुनाव अधिकारी की नियुक्ति का अधिकार संस्थापक प्रबन्धकारिणी समिति को ही पंजीकृत नियमावली के अनुसार था, क्योंकि वर्तमान प्रबन्धकारिणी समिति संस्था के नवीनीकरण के लिए संस्थापक प्रबन्धकारिणी समिति की जो सूचियां 2005 से 2013 तक की प्रस्तुत की गयी हैं, उन पर वर्तमान प्रबन्धकारिणी समिति के समस्त पदाधिकारियों/ सदस्यों ने अपने – अपने हस्ताक्षर कर 2013 तक उनकी वैधता को स्वयं प्रमाणित किया है। वर्तमान प्रबन्धकारिणी समिति द्वारा पंजीकृत नियमावली के बिन्दु 5 में सदस्यता की समाप्ति शीर्षक के अनुसार 2005 से 2013 तक की संस्थापक प्रबन्धकारिणी समिति के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत करने या पारित कराने का कोई प्रमाण नवीनीकरण के लिये आपके समक्ष प्रस्तुत प्रपत्रों के साथ प्रस्तुत नहीं किया गया है। उपरोक्त से स्वतः स्पष्ट है कि संस्था के सम्बन्ध में समस्त निर्णय लेने के अधिकार संस्थापक प्रबन्धकारिणी समिति के अलावा किसी को प्राप्त नहीं थे। 

2013 में चुनाव कराये जाने और चुनाव समिति, चुनाव अधिकारी व चुनाव समिति के सदस्यों के मनोनयन का निर्णय लेने के लिये वैध संस्थापक प्रबन्धकारिणी समिति के हस्ताक्षर चुनाव कार्यक्रम के निर्धारण की कार्यवाही के प्रपत्र पर न होने से यह स्वतः स्पष्ट है कि इस प्रपत्र में अंकित कार्यवाही का कोई निर्णय वैध नहीं है। इस प्रपत्र पर चुनाव अधिकारी के हस्ताक्षर न होने और वर्तमान महामंत्री और उनके सहयोगियों के ही हस्ताक्षर, प्रपत्र के कूटरचित होने और नवीनीकरण के लिये धोखाधड़ी के इरादे से हस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा ही बनाये जाने के हमारे सन्देह को बल प्रदान करते हैं। 

उप निबन्धक फर्म चिट्स एवं सोसायटीज के कार्यालय से प्राप्त प्रमाणित प्रतिलिपि की क्रमांक 5 पर संलग्न छायाप्रति का भी अवलोकन करने की कृपा करें। जिसमें स्क्रीनिंग कमेटी का कार्यवृत अंकित है, इस अभिलेख पर भी स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमैन एवं सदस्यों के हस्ताक्षर नहीं हैं। प्रबन्धकारिणी समिति की वर्ष 2011-2012 व 2012-2013 की सूची पूर्व में संलग्नक क्रमांक 6 व 7 में अंकित प्रबन्धकारिणी संमिति के किसी भी पदाधिकारी और सदस्य के हस्ताक्षर भी नहीं है। इस अभिलेख में यह भी अंकित नहीं है कि स्क्रीनिंग कमेटी का गठन और इसके चेयरमैन एवं सदस्यों का मनोनयन कब किसके द्वारा किस तिथि को किया गया था ? उपरोक्त प्रपत्र पर किसी भी पदाधिकारी और सदस्य के हस्ताक्षर न होने तथा स्क्रीनिंग कमेटी के गठन की तिथि अंकित न होने से यह भी संदेह होता है कि यह अभिलेख भी कूट रचित है और धोखाधड़ी के इरादे से बनाया गया है। 

वर्तमान महामंत्री अवनीश दीक्षित का उपरोक्त अंकित स्पष्टीकरण भी कई कारणों से असत्य और भ्रामक होने के कारण स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है। 2013 में पंजीकृत नियमावली के बिन्दु संख्या 9 में प्रबन्धकारिणी समिति के पदाधिकारियों का अधिकार व कर्तव्य शीर्षक में अंकित अध्यक्ष के अधिकार के अनुसार उप समितियों के गठन का अधिकार तत्कालीन अध्यक्ष के पास था। नवीनीकरण के लिये आपके समक्ष संस्थापक प्रबन्धकारिणी समिति की जो सूचियाॅ 2005 से 2013 तक की प्रस्तुत की गयी है उन पर वर्तमान प्रबन्धकारिणी समिति के समस्त पदाधिकारियों/सदस्यों ने अपने – अपने हस्ताक्षर कर 2013 तक उनकी वैधता को स्वयं स्वीकार व प्रमाणित किया है। वर्तमान प्रबन्धकारिणी समिति द्वारा पंजीकृत नियमावली के बिन्दु 5 में सदस्यता की समाप्ति शीर्षक के अनुसार 2012 के अध्यक्ष श्री अनूप बाजपेई के विरुद्ध कोई अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत करने या पारित कराने का कोई प्रमाण नवीनीकरण के लिये आपके समक्ष प्रस्तुत प्रपत्रों के साथ प्रस्तुत नहीं किया गया है। उपरोक्त से स्वतः स्पष्ट है कि स्क्रीनिंग कमेटी नामक उप समिति के गठन और उसके चेयरमैन तथा सदस्यों के मनोनयन का निर्णय लेने का अधिकार केवल तत्कालीन अध्यक्ष के अलावा किसी को भी प्राप्त नहीं था। 

स्क्रीनिंग कमेटी नामक उपसमिति के गठन की कार्यवाही 2012 के तत्कालीन अध्यक्ष श्री अनूप बाजपेई द्वारा किये जाने का कोई भी प्रपत्र नवीनीकरण के लिये आपके समक्ष प्रस्तुत प्रपत्रों के साथ प्रस्तुत नहीं किया गया है। उपरोक्त से स्वतः स्पष्ट है कि सक्षम अधिकारी द्वारा स्क्रीनिंग कमेटी का न तो गठन किया था और कमेटी के चेयरमैन और सदस्यों का मनोनयन भी नहीं किया था। महामंत्री ने अपने स्पष्टीकरण के बिन्दु 7 में यह अंकित कर कि जनपद के सभी पत्रकारों ने विधान को ठेंगा दिखाते हुए सभी नियमों के प्रतिकूल पदों पर बने रहने व चुनाव न कराने की धाॅधली से आजिज आकर ही स्क्रीनिंग कमेटी का गठन किया था। वर्तमान महामंत्री अवनीश दीक्षित ने उपरोक्त सत्य को स्वयं स्वीकार भी किया है। वर्तमान महामंत्री ने अपने उपरोक्त कथन को प्रमाणित करने के लिए जनपद के पत्रकारों द्वारा भी स्क्रीनिंग कमेटी के गठन की कार्यवाही का कोई भी प्रपत्र नवीनीकरण के समय आपके समक्ष प्रस्तुत न करने के कारण स्क्रीनिंग कमेटी का गठन, महामंत्री की कल्पना मात्र ही प्रतीत होता है। 

उपरोक्त बिन्दु में अंकित तथ्यों से यह स्पष्ट हो चुका है कि सक्षम अधिकारी और तत्कालीन अध्यक्ष अध्यक्ष श्री अनूप बाजपेयी द्वारा स्क्रीनिंग कमेटी का गठन नहीं किया गया है और जनपद के पत्रकारों द्वारा स्क्रीनिंग कमेटी के गठन का कोई प्रमाण अब तक वर्तमान महामंत्री द्वारा प्रस्तुत नहीं करने के कारण यह भी स्पष्ट हो चुका है कि स्क्रीनिंग कमेटी का गठन महामंत्री की कल्पना मात्र ही है। यह प्रश्न फिर भी बना हुआ है कि स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमैन श्री अंशुमान तिवारी ने दिनांक 19.10.2012 को प्रेस क्लब में कार्यवृत्त जारी करने हेतु क्या वास्तव में कोई बैठक की थी ? और स्क्रीनिंग कमेटी ने कोई कार्यवृत्त भी क्या वास्तव मे ही जारी किया था ? कार्यवृत्त पर श्री अंशुमान तिवारी के ही हस्ताक्षर न होने और वर्तमान कार्यकारिणी के पदाधिकारियों और सदस्यों के ही हस्ताक्षर होने से इस प्रपत्र को नवीनीकरण के लिये धोखाधड़ी के इरादे से हस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा ही बनाये जाने के हमारे सन्देह को बल मिलता हैं। 

उपरोक्त बिन्दु में अंकित तथ्यों से यह स्पष्ट हो चुका है कि स्क्रीनिंग कमेटी का गठन वर्तमान महामंत्री अवनीश दीक्षित की मात्र कल्पना ही है। यह प्रश्न तो अब भी बना हुआ है कि स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमैन श्री अंशुमान तिवारी ने दिनांक 19.10.2012 को प्रेस क्लब में कार्यवृत्त में स्मृति पत्र के बिन्दु 4 में अंकित उद्देश्यों को किस आधार पर अतिकृमित कर ? किसके आदेश ? और किस अधिकार से केवल 3 वर्ष पूर्व पंजीकृत दैनिक समाचार पत्रों के वेतन भोगी पत्रकारों को ही सदस्यता प्रदान करने का निर्णय लिया ? उपरोक्त के सम्बन्ध वर्तमान महामंत्री के बिन्दु दो में अंकित स्पष्टीकरण में कुछ भी नहीं है। कार्यवृत्त पर श्री अंशुमान तिवारी के ही हस्ताक्षर न होने और वर्तमान कार्यकारिणी के पदाधिकारियों और सदस्यों के ही हस्ताक्षर होने से इस प्रपत्र को भी नवीनीकरण के लिये धोखाधड़ी के इरादे से हस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा ही बनाये जाने के हमारे सन्देह को बल मिलता है। 

वर्तमान महामंत्री का कहना है कि उनके द्वारा क्रमांक 8 में समविष्ट स्मृति पत्र के किसी भी तथ्य को अतिक्रमित नहीं किया गया है। वर्तमान कार्यकारिणी पत्रकारों के हर दुःख सुख में सदैव सहभागी है। संस्था के महामंत्री व अन्य पदाधिकारी कानून व समाज का हमेशा ध्यान और सम्मान रखते हैं। कभी भी कोई फरेब, हिंसा व कूट रचना जैसा अमानवीय कृत्य कारित नहीं किया है। दीक्षित ने स्पष्टीकरण के बिन्दु संख्या 4 में अंकित कथन में स्मृति पत्र के बिन्दु संख्या 4 में अंकित उद्देश्यों को उनकी काल्पनिक स्क्रीनिंग कमेटी के स्वहस्ताक्षरित कार्यवृत्त दिनांक: 19.10.2012 में अतिक्रमित करने के कारणों का कोई युक्ति युक्त स्पष्टीकरण अंकित नहीं किया है। वर्तमान महामंत्री का बिन्दु संख्या 4 में अंकित कथन भ्रामक होने के कारण स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है। 

एसआर न्यूज़ से साभार

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