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सुख-दुख

आतंक के खेल में एक मासूम के जिंदा पकड़े जाने का मीडिया टेरर

कुछ मित्रों ने जिंदा पकड़े गए आतंकवादी यानी कसब पर मेरी राय जाननी चाही है. मैंने मना किया तो कहने लगे कि लिखने से डरते हैं. अब ये हाल भी नहीं है कि कोई मुझे कुछ कहकर उकसा ले. पर अगर आप सुनना ही चाहते हैं तो लीजिए सुनिए….

कुछ मित्रों ने जिंदा पकड़े गए आतंकवादी यानी कसब पर मेरी राय जाननी चाही है. मैंने मना किया तो कहने लगे कि लिखने से डरते हैं. अब ये हाल भी नहीं है कि कोई मुझे कुछ कहकर उकसा ले. पर अगर आप सुनना ही चाहते हैं तो लीजिए सुनिए….

इक रोज चैनलों पर विस्फोटक ब्रेकिंग चली. भारत ने पाकिस्तान से आए एक जिंदा आतंकवादी को पकड़ा है. उत्सुकता जगी तो चैनल बदल-बदल कर देखने लगा कि माजरा क्या है. देखा कि लम्बे कद का एक छरहरा युवक, जिसने हल्की दाढ़ी रख रखी है, खुद को पाकिस्तान से आया आतंकवादी बता रहा है. मीडिया के कैमरों को देखकर उसे जरा भी डर नहीं लग रहा. वह बताता है कि यहां हिन्दुओं को मारने आया है। सब कुछ बहुत शांत और स्थिर स्वभाव से. उसके चेहरे पे कोई शिकन नहीं. भारतीय अफसरों के शिकंजे में आए उस आतंकवादी को मीडिया वाले घेरे हुए हैं और सवाल दाग रहे हैं. वह भी बड़े आराम से उन सवालों के जवाब दे रहा है, जैसे कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही हो!

हिन्दी-अंग्रेजी के सारे चैनल देशभक्ति में डूब जाते हैं. बड़ी ब्रेकिंग और बड़े सवाल दागने शुरु कर दिए जाते हैं. अब कैसे बचेगा पाकिस्तान, पाक का नापाक चेहरा सामने आया, अब क्या कहेगा पाकिस्तान, जिंदा पकड़ा गया नापाक हरकत करने आया पाक आतंकी, जैसे जुमले खूब चिल्ला-चिल्ला कर हवा में बिखेर दिए जाते हैं, जो टीवी स्क्रीन से निकलकर भारत के करोड़ों घरों में गूंज रहे होते हैं.

पहले तो मैं हैरान हुआ कि आखिर ये क्या और कैसे हुआ? जिंदा आतंकी कैसे पकड़ा गया. क्या कहीं पे कोई हमला हुआ है या फिर बॉर्डर पार करते हुए पकड़ा गया है? लेकिन जब पूरा मामला जाना-समझा तो मुस्कुरा दिया और फिर टीवी बंद कर दिया. पता नहीं, फिर चैनलों पर क्या-क्या तमाशा हुआ होगा उस दिन.

और कल रात तो ‘आज तक’ नामक एक चैनल ने हद ही कर दी. उसकी ब्रेकिंग बताने लगी कि ‘आज तक’ पाकिस्तान में आतंकी कसब का घर ढूंढने में कामयाब रहा है और टीवी स्क्रीन पर कसब-2 का वह तथाकथित घर दिखाया जाने लगा. रात में शूट किया गया एक पुराना सा मकान बाहर से दिखाया जा रहा था, जिसे -आज तक- चैनल कसब का घर बता रहा था.

ये सब देखकर बहुत कोफ्त होने लगी कि भारतीय मीडिया ये सब कर क्या रहा है. क्या मीडिया और इसके सम्पादकों का अपना कोई निर्णय या विवेक इस देश में नहीं रह गया है.? या फिर आतंकवाद जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय भी बस टीआरपी और रीडरशिप के खेल बनकर रह गए हैं. बहुत देर तक ये सोचता रहा कि कोई तो पत्रकार होगा जो इस पूरे वाकये को अलग नजर से देख रहा हो!!! पर ऐसा कुछ दिखा नहीं.

भारतीय अफसरों के हाथ आया जिंदा आतंकवादी कसब एक ऐताहासिक घटना है क्योंकि उसे आतंकवादी हमले के पहले ही दबोच लिया गया. और भारतीय मीडिया यानी अखबारों और टीवी चैनलों के पत्रकारों से उस आतंकवादी का मुस्कुराकर सहजता से बात करना उससे भी बड़ी ऐतिहासिक घटना है जो अब तक इस देश में पहले नहीं देखी गई.

लेकिन ना जाने क्यों, मुझे मामला इतना सीधा और सरल नहीं दिख रहा. मुझे इसमें एक नहीं, कई पेंच नजर आ रहे हैं. मुंबई हमले में पकड़े गए आतंकवादी कसब और दूसरे आतंकवादी घटनाओं के मामले में कड़वे अनुभव से गुजरे भारत से जब पाकिस्तान बार-बार ये सवाल दाग रहा हो कि कसब पाकिस्तानी है, इसका सबूत दो तो फिर हाथ आए आतंकी कसब के मामले में भारत सरकार का इतना गैरजिम्मेदाराना और बचकाना रवैया कैसे हो सकता है? एक जिंदा आतंकी पकड़ा जाए और भारत सरकार के आईबी और RAW के अफसर उसे थाली में सजाकर मीडिया के सामने परोस दें, ये बात हजम नहीं हो रही. इतना संवेदनशील और गंभीर मामला और केंद्र-राज्य सरकार की इतनी बचकानी हरकत? कसब को मीडिया से बात करने के लिए खुला छोड़ दिया! और फिर पूरे देश के टीवी चैनलों पर मीडिया से बात करता वो आतंकी छा गया. पूरे देश में पाकिस्तान के खिलाफ भावना भड़क गई, पूरा माहौल बना दिया गया. और इस पूरी आपाधापी में मीडिया के जिम्मेदार सम्पादकों ने थोड़ी देर के लिए भी आराम से बैठकर ये नहीं सोचा कि ये सब क्या हो रहा है, क्या दिखाया जा रहा है. क्या मीडिया को इस मामले में टूल की तरह इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा?

अपराध और आतंकवाद के कवरेज की थोड़ी समझ रखने वाला कॉमन सेंस का पत्रकार भी ये बता देगा कि अपराधियों और आतंकवादियों को टीवी मीडिया के बाइट्स के लिए उपलब्ध नहीं कराया जाता. हत्या-रेप जैसे अपराध में भी पुलिस आरोपी का मुंह कपड़े से ढंक देती है और पूरी कोशिश करती है कि मीडिया वाले उस आरोपी से बात ना कर पाए. उसे बचाकर निकाल ले जाती है. 

लेकिन इस मामले में तो देश ने पाकिस्तान से आए एक जिंदा आतंकवादी को पकड़ा था, भारत-पाकिस्तान रिश्तों में चल रही मौजूदा कड़वाहट के इस दौर में क्या भारत और आईबी-रॉ-पुलिस के अफसरान ये अफोर्ड करने की हालत में थे कि हाथ आए इस आतंकी को बातचीत के लिए मीडिया को सुलभ करा दिया जाए. ऐसे मामलों में तो तुरंत उसे गोपनीय जगह ले जाया जाता है, जहां उससे आईबी-रॉ और संबंधित विभाग के अधिकारी पूछताछ करते हैं क्योंकि वह जिंदा आतंकवादी कई संवेदनशील खुलासे कर सकता है.

फिर कसब के मामले में ऐसा क्या हुआ? उसका चेहरा ढांकना और पहचान छुपाना तो दूर, उल्टे उसकी बातचीत बड़े आराम से किसी सेलिब्रिटी की तरह मीडिया से कराई गई. और हंसता-मुस्कुराता वह आतंकवादी जो बोल रहा था, उसे देश के सामने जस के तस परोसा जा रहा था. क्या ये सबकुछ इतना आसाना था, जितना हो रहा था या फिर कोई और कुछ और चाह रहा था और उसी के मुताबिक सब कुछ हो रहा था? या हुआ.

ऐसे कई सवाल मेरे मन में उठे और उठ रहे हैं. आखिर कसब को मीडिया के सामने चारा बनाकर क्यों लाया गया? कई सवाल हैं जो अनसुलझे हैं, और जिनका जवाब दिया जाना चाहिए. कल रात -आज तक- पर कसब का पाकिस्तान स्थित तथाकथित घर जब EXCLUSIVE दिखाया जा रहा था तो चैनल के एग्जीक्यूटिव एडिटर संजय ब्रागटा फोन लाइन पर थे. वह बड़ी शान से बता रहे थे कि कैसे उनके रिपोर्टर को कसब का घर ढूढने में नाकों चने चबाने पड़े, तब कहीं जाकर ये घर मिल पाया, जिसका शॉट हम दिखा रहे हैं. अति उत्साह में संजय ब्रागटा ये भी बोल गए कि जब उनके रिपोर्टर ने आतंकवादी कसब के घर का दरवाजा खटखटाया तो अंदर 3-4 लोग थे, जिन्होंने कैमरा देखते ही दरवाजा बंद कर लिया! संजय ब्रागटा के अनुसार अंदर हो सकता है कि आईएसआई के लोग होंगे या फिर लश्कर के लोग!

ये सब देख-सुनकर मुझे खुद के पत्रकार होने पे शर्म आने लगी. इन मूर्खों को क्या बोलें? अरे संजय जी, भारत ने अगर पाकिस्तान से आए आतंकी कसब को जिंदा पकड़ रखा है तो अब तक क्या पाकिस्तान में कसब का घर ऐसे ही खुला छोड़ दिया गया होगा कि आपका रिपोर्टर जाए और घर के दृश्य कैमरे में कैद करके आपको भेज दे! और जब आपका रिपोर्टर कैमरा हाथ मे लिए दरवाजा खटखटाएगा तो कैमरा देखकर अंदर मौजूद आईएसआई या फिर लश्कर के लोग (आप ही के कहे मुताबिक) डरकर क्या दरवाजा बंद कर देंगे? या फिर आप लोगों को कैमरे से शूट करता देख आपके रिपोर्टर पर ही दनादन गोलियां बरसा देंगे. क्या वे इंतजार करेंगे कि इसे शूट करके आपका रिपोर्टर भारत भेजे, जिसे आप अपने चैनल पर EXCLUSIVE चलाकर वीर-गाथा का बखान करेंगे? हद हो गई है बेशर्मी की भी. मुझे नहीं मालूम कि कल रात ये वीर गाथा चलाने के बाद आज तक चैनल ने दुबारा भी इस खबर को चलाया है या नहीं. या फिर अपनी गलती का एहसास होने पर खबर को ड्रॉप कर दिया है, या फिर अभी भी आज तक चैनल कसब का असली घर दिखाने की अपनी खबर पर कायम है.

मेरा सवाल यही है कि कहीं जाने-अनजाने भारतीय मीडिया किसी अनजान ताकत के हाथों खेल तो नहीं गया?

कई सवाल हैं, जिनके जवाब मिलने अभी बाकी हैं. मसलन.

1. ये बात बहुत मुश्किल से हजम होती है कि कड़ी ट्रेनिंग पाया एक आतंकवादी इतनी आसानी से दो भारतीय सिविलियन के हत्थे चढ़ जाएगा. और भारतीय अफसरों के हवाले हो जाएगा. भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के हाथ आने से पहले वो सायनाइड या इस जैसे किसी जहर का इस्तेमाल कर खुदकुशी क्यों नहीं कर लेगा, जैसा आमतौर पर ऐसे मामलों में होता है ताकि उससे कुछ उगवाया ना जा सके.

2. अगर फिर भी वह जिंदा बच गया तो वह भारतीय मीडिया से बात क्यों करेगा? ये क्यों बताएगा कि वह पाकिस्तान से आया है वगैरह-वगैरह. इन आतंकवादियों की ट्रेनिंग फौज जैसी ही होती है और उन्हें ये अच्छी तरह बताया जाता है कि अगर पकड़ लिए गए तो किसी भी हाल में मुंह नहीं खोलना है. चाहे थर्ड डिग्री या 10 डिग्री का टॉर्चर कर लो. फिर ये आतंकवादी कसब इतना घुलमिल कर भारतीय मीडिया को क्या-क्या और क्यों बता रहा था? क्या ये सब प्लान्ड था और वह पकड़े जाने के लिए ही सिखाकर भेजा गया था और उसे बताया गया था कि पकड़े जाने पर क्या-क्या बोलना है?? खासकर उसका ये बयान कि —मैं यहां हिंदुओं को मारने आया था—. ऐसी भड़कीली बात कहकर वह और पाकिस्तान में बैठे उसके आका भारतीयों को क्या संदेश देना चाहते हैं और भारतीय मीडिया ने बिना सोचे-समझे उसके सारे बयानों को क्यों जस का तस प्रसारित किया? इससे किसका फायदा हुआ? या हो रहा है?

3. आपको याद होगा कि अभी एक-दो दिन पहले तक भारतीय और पाकिस्तानी मीडिया में गीता नामक एक भारतीय लड़की की कहानी खूब चल रही थी जो 14-15 साल पहले पाकिस्तान चली गई थी और जिसे एक पाकिस्तानी परिवार हिफाजत से अपने यहां रखे हुए हैं. दोनों तरफ की मीडिया ने मसाला लगाकर इस स्टोरी को चलाया कि गीता को भी एक –बजरंगी भाईजान– चाहिए. गीता का इंटरव्यू करने गए पाकिस्तानी पत्रकार तक रोते हुए टीवी पर दिखे. सुषमा स्वराज के निर्देश पर पाक स्थित भारतीय राजदूत गीता से मिलने भी गए और भारत के झारखंड में उसके घर का पता ढूंढने की कोशिश की. बजरंगी भाईजान की मुन्नी की तरह गीता भी बोल नहीं सकती है, सो मीडिया के इस स्टोरी में काफी मसाला मिला. दोनों तरफ की जनता गीता को लेकर इमोशनल हो गई और भारतीय-पाक चैनलों ने गीता की स्टोरी खूब चलाई. दोनों देश की जनता में एक आपसी प्यार-भाईचारा पनप रहा था. लेकिन तभी, तभी

पाकिस्तान से आया एक आतंकी कसब जिंदा गिरफ्तार होता है और पूरा भारत, पाकिस्तान के खिलाफ हो जाता है. उधर पाकिस्तान में भी पूरा माहौल भारत के खिलाफ बन जाता है. कई चैनल दोनों देशों की सेना से रिटायर हो चुके अफसरों को पैनल में बिठाकर उनसे आग उगलवाते हैं और चैनल पर ही भारत-पाक जंग की तारीख बना देते हैं.

यानी गीता की स्टोरी ने दोनों देशों के रिश्तों पर जो मरहम का काम किया था, वह अचानक से काफूर कर दिया जाता है. भारतीय और पाकिस्तानी टीवी चैनलों से अचानक गीता की इमोशनल स्टोरी गायब हो जाती है और दोनों देश की जनता WAR MODE में आ जाती है या ले आई जाती है.

मेरा सवाल है कि इससे फायदा दोनों देशों में किसे हो रहा है? कसब का जिंदा पकड़ा जाना क्या वाकई भारतीय खुफिया एजेंसियों के लिए एक नायाब कामयाबी है? शायद नहीं. तभी तो पूर्व आईबी प्रमुख और नैशनल सिक्योरिटी एडवाइजर रहे एमके नारायणन ने कल एक टीवी चैनल से कहा कि उन्हें नहीं लगता कसब की गिरफ्तारी से भारतीय खुफिया अफसरों को कोई नई और संवेदनशील जानकारी हाथ लगे. हो सकता है कि उसे यही सब कहने-करने के लिए सिखाकर पाकिस्तान द्वारा भेजा गया हो. कसब के बयानों और बातों को सीरियसली नहीं लिया जा सकता.

तो कुछ समझे आप. नारायणन जैसे वरिष्ठ और शानदार अफसर भी कसब की गिरफ्तारी को लेकर बहुत ज्यादा आश्वस्त नहीं हैं कि ये सब क्या और कैसे हुआ? और मीडिया जाने-अनजाने इस पूरे घटनाक्रम में यूज होता रहा. किसी भी पत्रकार और सम्पादक ने ये सोचने-समझने की जहमत नहीं उठाई कि आखिर जिंदा पकड़े गए एक आतंकवादी को क्यों मीडिया ट्रायल के लिए थाली में सजाकर पेश कर दिया गया है? इससे किसका फायदा हो रहा है, इस स्टोरी की तह तक जाने की कोशिश फिलहाल तो किसी ने नहीं की है. भविष्य में हो सकता है कि Indian Express जैसा अखबार इसमें कोई खोजी खबर लाए. बाकियों से तो मुझे ज्यादा उम्मीद नहीं.

पत्रकारिता की पढ़ाई और ट्रेनिंग में पहली शिक्षा यही दी जाती है कि ऐसे मामलों में पुलिस और सरकार की थ्योरी पर विश्वास ना करें. अपनी तहकीकात करें और ऐसे मामलों को बढ़ा-चढ़ाकर ना दिखाएं-लिखें. लेकिन पूरा का पूरा भारतीय मीडिया कसब के मामले में राष्ट्रवादी हो गया. पहले भी ऐसे कई मामले हुए हैं, जहां पुलिस और सरकारी एजेंसियों की थ्योरी गलत साबित हुई है. माना कि इस दफा कसब पाकिस्तान से आया आतंकी है लेकिन उसे इतनी आसानी से बाइट-इंटरव्यू के लिए भारतीय मीडिया के सामने क्यों और कैसे पेश किया गया, ये बड़ा सवाल है, जो अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से लेकर हर खास-ओ-आम पूछेगा.

बहरहाल पुलिस और आंतक के इस खेल में कैसे कई दफा मासूम लोग आतंकवादी बना-बता दिए जाते हैं, जो बाद में कोर्ट से छूट जाते हैं, कसब का जिंदा पकड़ा जाना ऐतिहासिक है. कई मामलों में.

सच्ची-मुच्ची !

वरिष्ठ पत्रकार नदीम एस अख्तर के एफबी वाल से

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3 Comments

3 Comments

  1. Indian

    August 19, 2015 at 9:35 pm

    Kya aap Pakistan k patrakar ho Janab.

  2. Indian

    August 19, 2015 at 9:37 pm

    Kya aap Pakistan k patrakar ho janab?

  3. rajesh

    August 9, 2015 at 2:00 pm

    वाह रे मासूम…. आप भी बड़े मासूम जान पड़ते हैं….

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