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कन्हैया के साथ उसकी दोस्त की तस्वीर को पंजाब केसरी ने अय्याशी बता दिया!

Vineet Kumar : फेसबुक टाइमलाइन पर कन्हैया के साथ उसकी दोस्त की जो तस्वीर तैर रही है, पंजाब केसरी जैसा अखबार समूह जिसे जेएनयू की प्रोफेसर की अय्याशी बता रहा है, मुझे रत्तभर भी हैरानी नहीं हो रही है. मैं मीडिया की कुंठा को बेहद करीब से जानता-समझता हूं और उनसे बुरी तरह प्रभावित लोगों को भी.. इन दिनों मेरे बेहद करीबी रिश्तेदार लोग जो उम्र में मुझसे कम से कम दस-बारह साल बड़े होंगे, व्हॉट्स अप पर चुटकुले भेजने का काम कर रहे हैं, उन्हें बुरा न लगे तो शुरू-शुरू में स्माइली भेज दिया करता.

Vineet Kumar : फेसबुक टाइमलाइन पर कन्हैया के साथ उसकी दोस्त की जो तस्वीर तैर रही है, पंजाब केसरी जैसा अखबार समूह जिसे जेएनयू की प्रोफेसर की अय्याशी बता रहा है, मुझे रत्तभर भी हैरानी नहीं हो रही है. मैं मीडिया की कुंठा को बेहद करीब से जानता-समझता हूं और उनसे बुरी तरह प्रभावित लोगों को भी.. इन दिनों मेरे बेहद करीबी रिश्तेदार लोग जो उम्र में मुझसे कम से कम दस-बारह साल बड़े होंगे, व्हॉट्स अप पर चुटकुले भेजने का काम कर रहे हैं, उन्हें बुरा न लगे तो शुरू-शुरू में स्माइली भेज दिया करता.

वैसे मुझे व्हॉट्स अप रत्तीभर भी पसंद नहीं है… लेकिन बाद में मैं अफसोस से भर जाता. चुटकुले की एक-एक पंक्ति में यौन कुंठाएं भरी होती हैं. स्त्री-पुरुष लिंगों और सेक्स पर आधारित इन चुटकुले के भेजे जाने के पीछे उनका एक पैसा भी माथा काम नहीं करता कि किसको भेज रहे हैं, क्यों भेज रहे हैं. इन दीदीयों से कभी-कभार बात होती है तो पूछती हैं- ”इनसे तो तुम्हारी बात होती रहती होगी, कहते हैं विनीत घमंडी हो गए हैं, रिस्पांस नहीं देते, पहला नंबर कह रहे थे कि ब्लॉक कर दिया है.”

मुझे उन दीदीयों, मोहल्ले-कॉलेज की छुटपन की दोस्तों का चेहरा याद आने लग जाता है और लगता है उल्टी हो जाएगी- ऐसा मर्द है इन सबका पति जिसके पीछे ये लोग दिन-रात एक किए रहती हैं. मीडिया में जो लंपटता आपको दिख रही है, उसकी जड़े बहुत गहरी जम चुकी है. इस अंदाज में किसी के साथ तस्वीर खिंचवाना गुनाह है क्या? क्या साबित करना चाहते हैं लोग इससे? कुछ तो माथा-बुद्धि लगाया करो.. कुछ नहीं बचेगा इस समाज में इस हालत में.

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आपको चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने में दो मिनट भी नहीं लगेंगे. मैं कोई सिलेब्रेटी नहीं हूं. लेकिन दिल्ली सहित दूसरे शहरों में सभा-संगोष्ठियों में जाता हूं तो कुछ लोग साथ में तस्वीरें खींचने की बात करने लगते हैं. मुझे कोई ठसक नहीं होती. मैं एकदम से मान जाता हूं. ज्यादातर मीडिया और साहित्य के बच्चे होते हैं, कुछ उम्र में दो-चार साल आगे पीछे. सेल्फी में मजबूरी होती है नजदीक होकर खिंचवाने की लेकिन दो-चार बार का अनुभव अजीब सा रहा. पिछले दिनों इन्दौर जाना हुआ. मेरी बात खत्म होने के बाद मुझसे चार-पांच साल कम उम्र की एक महिला आई. अपने दोस्त को फोन पकड़ाया और कहा- मेरी, विनीतजी के साथ पिक ले ले. उसका दोस्त मोबाईल फोन किसी और को टिकाकर खुद भी फ्रेम में आना चाहता था. वो कहने लगी, नहीं पहले सिंगल.

लड़के ने तस्वीर उतारते वक्त कहा- तो सिंगल में क्या इतनी दूरी पर होते हैं. महिला ने तपाक से कहा- मैं और भी नजदीक हो सकती हूं और अपनी रौ में खुद नजदीक होने के बजाय मुझे अपनी ओर खींचने लगी. थोड़ा अटपटा सा लग रहा था मुझे..और वैसे भी किसी के छूने, बहुत नजदीक आकर मुंह सटाकर बात करने से मुझे दिक्कत होने लगती है. खैर, उसके दोस्त ने कहा- हां अब ठीक है. मैंने दोनों को थैंक्स कहा- फिर कभी मिलना होगा कहकर भीड़ में गुम हो गया. एक दो बार मुझसे उम्र में छोटी और कई तो बहुत बड़ी ने ताने मारकर तस्वीरें खिंचवाई हैं- बस-बस फेसबुक पर ही क्रांतिकारी, साथ फोटो खिंचवाने में नर्वस हो जाते हैं आप. डोन्ट वरी, मैं आपको फंसाउंगी नहीं और कंधे पर हाथ रखकर क्लिक. सच कहूं, कोई मेरे साथ की ऐसी तस्वीरें पोस्ट कर दे तो आपको वो सब कन्हैया से ज्यादा आपत्तिजनक लगेगी और आपको मुझे चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने में दो मिनट भी नहीं लगेंगे. हमने देशभक्ति को ऐसी खूंटी बना दी है कि कोट से लेकर लंगोट कुछ भी उतारकर टांग दो, सब देशहित में कहलाएगा.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.


मूल पोस्ट…

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
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