बंगाली माछ-भात के इतने प्रेमी क्यों होते हैं?

Daya Sagar : अक्सर सोचता था बंगाली माछ-भात के इतने प्रेमी क्यों होते हैं। तराई इलाका होने के कारण यहां धान की बहार है। जिससे सदियों से इनका जीवन चावल पर आश्रित है। और मछली के लिए यहां गंगा का मीठा पानी है। गंगा यहां हुगली में बदल जाती है और उत्तराखंड के गंगोत्री से निकलने भागीरथी बंगाल की खाड़ी में कहीं खो जाती है। हुगली में इतनी मछली होती है जो साल भर पूरे पश्चिम बंगाल को तृप्त कर सकती है।

यहां के गांवों में हर घर के सामने एक ताल है। अपने और पडोसी के ताल के बँटवारे के लिए इन्होंने मछली पकड़ने वाले जाल की सीमाएं बना दी हैं ताकि हमारे ताल की मछली पडोसी के ताल में न चली जाए। तो कोलकाता में माछ के इतने व्यंजनों पर प्रयोग हुआ जितनी सारी दुनिया में मछली के व्यंजनों पर नहीं हुए। तली हुई मछली, सरसो में भुनी मछली, नारियल में बनी मछली और भी न जाने क्या क्या। बंगालियों ने मछली को मांसाहार न मानकर इसे अपने पवित्र धर्मानुष्ठानों से जोड़ दिया। यही वजह है कि यहां दुर्गा के हर पंडाल के बाहर आपको मछली के दर्जनों पकवान ठेले खमचों पर बिकते दिख जाएंगे।

लेकिन मेरी समस्या कुछ और थी। मैं बंगाल की परम्परागत तरीके से बने मच्छी-भात का आनंद लेना चाहता था। मेरे मित्र शशांक ने इसके लिए मुझे न्यू मार्केट में होटल सिद्धेश्वरी आश्रम का पता दिया था। तमाम गली कूचे पार करते हुए मैं इस नामुराद होटल तक पहुंचा था। पहली नजर में लगा कहां फंस गया। एकदम साधारण और चालू होटल। 1925में बनी ये इमारत कभी होटल रही होगी। पर अब इसके हर कमरे को रेस्‍त्रां में तब्दील कर दिया गया है। सारी मेजे ग्राहकों से भरी हुई। बंगालियों का भद्रलोक यहां माच्छी-भात का आनंद उठा रहा था। हम भी एक छोटे से ऐसी कमरे में बैठ गए। थोड़ी देर में केले के पत्ते पर माछी-भात हमारे सामने था। अब तस्वीरें आपके सामने हैं। इसके बाद लिखने लिखाने का कोई ज्यादा मतलब नहीं रह जाता।

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कोलकाता के बंगाली खाने पीने के गजब शौकीन हैं। पूरे कोलकाता में हर दस कदम पर मिठाई की एक दुकान आपको मिल जाएगी।ये दुकाने कितने साल पुरानी हैं किसी को याद नहीं। लेकिन इनमें सबसे मशहूर भवानीपुर में गंगूराम की दुकान है। ये कोई दो सौ साल पुरानी मिष्टी शॉप हैं। यहां रसगुल्ला, काचा गुल्ला, तालसास सोन्‍देश, चमचम गुलाबजामुन मलाईचाप, राबडी लाजवाब है। यहां के बंगाली समोसे को सिंघाडा कहते हैं। यहां के समोसे हमारे लखनऊ से अलग हैं। लेकिन स्वादिष्ट। राधा वल्‍लभी पूडी के साथ आलू की सब्जी का अलग मजा है। यह भी गुगूराम के यहां मिल जाएगी। मिष्टी दही का अपना अलग क्रेज है। यह सिर्फ आपको कोलकाता में मिलेगी। वे दूध को शक्कर या खजूर मिलाकर तब तक उबालते हैं जब तक उसका रंग लाल नहीं हो जाता। फिर कुल्लहड़ या मिट़टी के किसी बर्तन में उसे वैसे ही जमा देते हैँ। सड़क के फुटपाथ पर आपको बांस की छोटी टोकरियों में ताजा छेना सजाते हलवाई आपको दिख जाएंगे। ये छेना मिष्टी दुकानों पर जाता है। कोलकाता आकर मैंने रूटीन भोजन लगभग त्याग दिया है। सिर्फ यहां के लजीज व्यंजनों का लुत्फ उठा रहा हूं। नॉनवेज व्यंजनों की यहां अलग रेंज है। उस पर फिर कभी। अभी तो रसोगुल्ला के शीरा को निचोड़ कर छेने का स्‍वाद ले रहा हूं। अब तक कितने हो चुके कहना मुश्किल है।

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जगह जगह की चाय पीना मेरा शगल है। चार साल पहले नार्थ ईस्ट के टी गार्डन में गया तो चाय से जी भर गया। हर तरफ चाय की खुशबू ऐसी बिखरी थी कि एक दिन भी चाय नहीं पी। यही अनुभव कोलकाता में हुआ। संतकुटिया गुरुद्वारा के पास केसरिया चाय की दुकान गजब मशहूर है। ये जनाब कुल्लहड में चाय बेचते हैं। चाय की कीमत कुल्लहड़ के साइस से तय है। चाय आपके सामने बनती रहेगी। चाय से भरे छोटे- छोटे जग। ये साहब चाय को एक जग से दूसरे जग में ऊंची धार के साथ तकरीबन तीस-चालीस बार फेटते हैं। फिर उसे कुल्लहड में डाल कर ऊपर से केसर की लाल पत्तियां डाल देते हैं। केसरिया रंग की टी शर्ट पहिने जो लड़का आपको चाय परोसेगे उसकी टी शर्ट के पीछे लिखा होगा- मेक चाय नॉट वॉर। पाक के खिलाफ जंग छेड़ने की मुखलफत करने वालों को ये जुमला बेशक अच्छा लगेगा। एक कुल्लहड चाय पी लीजिए आत्मा तृप्त। ऐसी ताजगी भरी चाय की दिन भर की थकान मिट जाए। लेकिन मजे की बात ये कि कोलकाता घूमने में आपको थकान लग ही नहीं सकती। यही तो इस शहर की खूबी है।

अमर उजाला, शिमला के संपादक दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’ की एफबी वॉल से.

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