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दिल्ली

महेश शर्मा का मंत्रालय बाबुओं के कब्जे में!

केंद्रीय संस्कृति एवं कला मंत्री महेश शर्मा का मंत्रालय कला एवं संस्कृति के सिवा सभी कार्य दक्षता से कर रहा है। चर्चा है कि इस दक्षता के लिए अवार्ड वापसी के नेता अशोक वाजपेयी से चुपके से हाथ मिलाकर शांति का समझौता कर लिया है। संस्कृति मंत्रालय के सभी स्वायत्त संसथान जैसे संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादेमी, साहित्य अकादमी पर मंत्रालय के बाबू अशोक वायपेयी के फॉर्मूले से कब्ज़ा जमा कर बैठे हैं और मंत्री साहब किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही करने को तैयार नहीं हैं।

केंद्रीय संस्कृति एवं कला मंत्री महेश शर्मा का मंत्रालय कला एवं संस्कृति के सिवा सभी कार्य दक्षता से कर रहा है। चर्चा है कि इस दक्षता के लिए अवार्ड वापसी के नेता अशोक वाजपेयी से चुपके से हाथ मिलाकर शांति का समझौता कर लिया है। संस्कृति मंत्रालय के सभी स्वायत्त संसथान जैसे संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादेमी, साहित्य अकादमी पर मंत्रालय के बाबू अशोक वायपेयी के फॉर्मूले से कब्ज़ा जमा कर बैठे हैं और मंत्री साहब किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही करने को तैयार नहीं हैं।

पूर्व काल में इन सभी संस्थानों में करोड़ों के घपले हुए हैं और इस सम्बन्ध में जाँच करने की बात तो कई बार हुई पर ढाक के तीन पात। मंत्री महोदय ने संसदीय समिति के समक्ष 2014 में कई बड़े वादे किये थे- जैसे सभी गांवों से कला एवं संस्कृति का जुड़ाव, भारतीय सांस्कृतिक धरोहरों का वर्गीकरण, कला का मानचित्र इत्यादि। कई लुभावने वादों के साथ शुरू की गयी मुहिम मंत्रालय की फाइलों में उलझ कर रह गयी हैं और कोई भी कार्य शुरू नहीं हो पाया है।

यह अत्यंत ही दुखद है कि राष्ट्रवादी पार्टी का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी सांस्कृतिक क्षेत्र में कुछ भी कर पाने में असमर्थ है। संस्कार भारती जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से सांस्कृतिक विधा पर काम करती है, वह भी मंत्री से खासी नाराज है। हाल में सिर्फ कल्याण चक्रवती के खिलाफ ही सीबीआई कार्यवाही शुरू की गयी है पर अशोक वाजपेयी के खिलाफ कुछ भी नहीं। संगीत नाटक अकादमी की सचिव हेलेन आचार्य जी का साठ हजार का मोबाइल का बिल, लीला सैमसन द्वारा नाट्यशाला पर ६ करोड़ खर्च करके उसको तुड़वाना, क्षेत्रीय कला केन्द्रों पर पूर्ववत खुली लूटपाट चल रही है। कलाकारों को दिया जाने वाला मानदेय अधिकारियों द्वारा कमीशन में लूटा जा रहा है। मंत्री महोदय इन बातों से अनभिज्ञ हैं।

पहले संयुक्त सचिव को बदला गया। फिर सचिव को बदला गया। पर बात वहीं के वहीं है। सभी बाबू एकजुट होकर मंत्री को नियमावली का ऐसा पाठ पढ़ाते हैं कि मंत्री बेचारे उलझ कर रह जाते हैं। इस तरह संस्कृति मंत्रालय पर कब्ज़ा बाबुओं के हाथ में रह जाता है। संघ से जुड़े कलाकार एवं कार्यकर्ता, जो दरकिनार हैं, धीमे स्वर में मंत्रीजी की कारगुजारियों पर नाराजगी जताते हैं। परन्तु मंत्री जी लगता है चैन की बांसुरी बजा रहें हैं। इस सांठगांठ में विशेष अधिकारी महोदय नवनीत सोनी की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इन्हें मंत्रीजी ने नियमों को ताक पर रख कर नियुक्त किया हुआ है। सोनी के मूल नियोक्ता द्वारा से अभी भी अनापत्ति नहीं ली गयी है जो कार्मिक विभाग के नियमों का सीधा उल्लंघन है।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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