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सिजेरियन का सच

Ila Joshi : जब तक सिजेरियन तरीके से प्रसव कराने की तकनीक हमारे देश में नहीं थी, या कहना चाहिए कि जब तक ये तरीका बेहद आम नहीं बना था तब तक नॉर्मल डिलीवरी को लेकर जितनी आशंकाएं डॉक्टर आज आपको गिनाते हैं ये लगभग नामौजूद ही थीं। सिजेरियन डिलीवरी से जुड़ी डिलीवरी के बाद की कॉम्प्लिकेशन के बारे में अगर आप अंजान हैं तो ज़रूर पढ़ लें क्योंकि ये फेहरिस्त बेहद लम्बी है।

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Ila Joshi : जब तक सिजेरियन तरीके से प्रसव कराने की तकनीक हमारे देश में नहीं थी, या कहना चाहिए कि जब तक ये तरीका बेहद आम नहीं बना था तब तक नॉर्मल डिलीवरी को लेकर जितनी आशंकाएं डॉक्टर आज आपको गिनाते हैं ये लगभग नामौजूद ही थीं। सिजेरियन डिलीवरी से जुड़ी डिलीवरी के बाद की कॉम्प्लिकेशन के बारे में अगर आप अंजान हैं तो ज़रूर पढ़ लें क्योंकि ये फेहरिस्त बेहद लम्बी है।

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पिछले एक दशक में जिस तरह से सिजेरियन तरीके से प्रसव के आंकड़े बढ़ रहे हैं उससे तो ये लगने लगा है कि कुछ समय बाद यदि कोई भारतीय औरत नॉर्मल डिलीवरी से बच्चा पैदा करती है तो ये ख़बर बनेगी। कुछ बेहद समझदार लोग ये तर्क भी देते हैं कि नई लड़कियां लेबर पेन से बचने के लिए सिजेरियन तरीका अपनाती हैं तो उन महान लोगों को पता होना चाहिए कि सिजेरियन के बाद ज़िंदगी भर जो उन लड़कियों को झेलना पड़ता है उसमें कोई भी थोड़ा बहुत समझदार इंसान अपनी इच्छा से इस विकल्प को कभी नहीं चुनेगा। सरकारी अस्पतालों के बिगड़ते हालात, अच्छे डॉक्टरों की उन सुविधाविहीन अस्पतालों में काम करने के प्रति उदासीनता और निजी अस्पतालों की बढ़ती संख्या ने एक नया बाज़ार खड़ा किया है।

ऐसे में बड़े शहरों में रहने वाले लोगों के लिए मेडिकल इनश्योरेंस कोई लक्ज़री नहीं एक बुनियादी ज़रूरत बन गई है। आए दिन हम अख़बारों में, टीवी में इस तरह की ख़बरें पढ़ते देखते हैं कि अस्पताल ने केस बिगाड़ दिया, कुछ नहीं था लेकिन दुनियाभर के टेस्ट करवा दिए, डिपाजिट न दे पाने की हालत में मरीज़ को एडमिट नहीं किया, बकाया न अदा कर पाने तक बॉडी देने से इंकार कर दिया। और ये सब केस अपवाद नहीं हैं, दुर्भाग्यवश ज़्यादातर मामलों में ऐसा ही होता है। एक अनुभव तो निजी है जिसमें डिपाजिट का पैसा मरीज़ के डिस्चार्ज होने के 100 दिन बाद मिला वो भी जब सैंकड़ों तकादे दिए गए। इसी बाज़ार का एक अहम हिस्सा है सिजेरियन तरीके से प्रसव कराना।

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आम तौर पर प्रसव के समय सभी लोग थोड़े टेंशन में होते हैं ऐसे में अचानक डॉक्टर कहे कि सिजेरियन करना पड़ेगा तो अमूमन लोग उस वक़्त तर्क न कर सकने की स्थिति में हाँ कह देते हैं और इसी का फ़ायदा ये बाज़ार उठाता है। गर्भ के नौ महीनों में रेगुलर चेकअप के दौरान डॉक्टर का ज़ोर इस बात पर होना चाहिए कि कैसे होने वाली माँ स्वस्थ रहे जिससे सिजेरियन की ज़रूरत न ही पड़े।

इसी बीच बहुत से ऐसे ख़ास संस्थान/अस्पताल सामने आने लगे हैं जो नॉर्मल डिलीवरी कराने के लिए बनाए गए हैं। लेकिन इनमें से अधिक्तर का प्रोसीजर एक आम इंसान की आर्थिक हैसियत से बाहर है सो ज़्यादातर लोगों के पास ये विकल्प नहीं। ऐसे में ये ज़रूरी हो जाता है कि आप निजी तौर पर ख़ुद को जागरूक रखें, नौ महीने के समय में आपके पास पर्याप्त समय है एक अच्छा डॉक्टर और अस्पताल ढूंढने का। क्योंकि अगर इस मसले पर आप ख़ुद लापरवाह रहेंगे तो इस बाज़ार को फलने फूलने का मौका आप ख़ुद दे रहे हैं। वैसे मैं सिस्टम पर सवाल करना चाहती हूं लेकिन क्या फ़ायदा दस लाइनें ज़्यादा लिखकर, क्योंकि जिस देश में धर्म के नाम पर चंदा मिलना आसान है लेकिन सभी सुविधाओं से लैस ग़रीबों के लिए एक मुफ़्त अस्पताल बनाने की बात कोई सोचता तक न हो तो वहां सिस्टम को सवाल करने से कौन सा आप लोग जागने वाले हैं।

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रंगकर्मी, पत्रकार और एक्टिविस्ट इला जोशी की एफबी वॉल से.

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