भारत के मीडिया घराने अब पत्रकारों की बजाय मैनेजरों के हाथों में हैं!

योगी आदित्‍यनाथ ने बजरंग बली को लोकदेवता, वनवासी, गिरवासी, दलित और वंचित भी बताया, लेकिन मीडिया को बेचे जाने लायक ‘माल’ केवल ‘दलित’ शब्‍द में नजर आया…. इसके बाद शुरू हो गई पीसीआर से इस खबर और शब्‍द पर ‘खेलने’ की तैयारी…

लखनऊ। क्‍या भारत का शीर्ष मीडिया पत्रकारों की बजाय मैनेजरों के हाथ में है? क्‍या टीवी पर चिल्‍ला-चिल्‍लाकर स्‍टार एंकर बनने वाले किसी विषय पर सवाल पूछने से पहले उसके बारे में बेसिक जानकारी जुटाना जरूरी नहीं समझते हैं? दरअसल, यह सवाल मेरे जेहन में इसलिए उभरा क्‍योंकि आजतक के न्‍यूज डाइरेक्‍टर और एंकर राहुल कंवल ने एक कार्यक्रम में भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह से सवाल किया कि क्‍या भगवान हनुमान ‘दलित-जाति’ के हैं? क्‍या भगवान की ‘जाति’ बताई जानी चाहिए?

अब सवाल यह है कि ‘दलित’ कौन सी ‘जाति’ है? समूची मीडिया ‘दलित’ शब्‍द को ‘जाति’ मानकर हल्‍ला मचाए हुए हैं। टीवी और अखबारों के स्‍टार रिपोर्टर और एक से एक दिग्‍गज पत्रकार हनुमान जी को ‘दलित’ कहे जाने को उनकी ‘जाति’ मानकर इस तरीके से तीर छोड़ रहे हैं कि बजरंग बली के अराध्‍य राघव कुल के राजा रामचंद्र भी खुद को तीरंजादी में ‘दलित’ महसूस कर रहे होंगे! उन्‍हें महसूस हो रहा होगा कि वह टीवी पत्रकारिता के दौर में अवतरित नहीं हुए अन्‍यथा ‘रावण वध’ भी ‘जातिवाद’ के फेर में फंस जाता।

दरअसल, ‘दलित’ शब्‍द को लेकर मीडिया में जो बवाल मचा हुआ है, उसकी उत्‍पत्ति उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के उस बयान के बाद हुई है, जिसमें उन्‍होंने कहा था, ”हम सबका संकल्प बजरंगी संकल्प होना चाहिए। बजरंग बली का संकल्प। बजरंग बली हमारी भारतीय परंपरा में एक ऐसे लोकदेवता हैं, जो स्वयं वनवासी हैं, गिरवासी हैं, दलित हैं, वंचित हैं, सबको लेकर के… सभी… पूरे भारतीय समुदाय को… उत्तर से लेके दक्षिण तक, पूरब से पश्चिम तक… सबको जोड़ने का कार्य बजरंगबली करते हैं। और इसलिए बजरंग बली का संकल्प होना चाहिए। राम काज किन्हें बिनु…।”

अब अगर ‘दलित’ के शाब्दिक अर्थ की बात करें तो इसका आशय उस वर्ग से है, जो आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, सांस्‍कृतिक, साहित्यिक रूप से दमित है। दबा हुआ है। जिसकी दैनिक दिनचर्या, जिंदगी किसी और की इच्‍छा से नियंत्रित है। इस स्थिति में किसी भी जाति का व्‍यक्ति, जिसका नियंत्रण किसी अन्‍य के पास है, ‘दलित’ कहा जाएगा’, लेकिन ‘कौआ कान ले गया’ के पीछे भागती मीडिया कभी भी ‘दलित’ शब्‍द का सही मायने में प्रयोग नहीं किया।

‘दलित’, ‘अल्‍पसंख्‍यक’ शब्‍द लंबे समय से मीडिया में बिकने वाला ‘माल’ रहा है। उदाहरण के तौर पर टीवी और अखबारों में लिखी जाने वाली हेडिंग और ब्रेकिंग- ‘दबंगों द्वारा दलित से मारपीट’, ‘दलित के ऊपर कार चढ़ाई’, ‘अल्‍पसंख्‍यकों पर हमला’… आदि आदि। इसका सीधा मतलब होता है कि किसी अपराधी ने इंसान या व्‍यक्ति से मारपीट नहीं की। ‘अल्‍पसंख्‍यक’ शब्‍द का मायने भी टीवी मीडिया के लिए एक खास वर्ग ही होता है। सिख, जैन, पारसी नहीं।

योगी आदित्‍यनाथ ने बजरंग बली को लोकदेवता, वनवासी, गिरवासी, दलित और वंचित भी बताया, लेकिन मीडिया को बेचे जाने लायक ‘माल’ केवल ‘दलित’ शब्‍द में नजर आया। इसके बाद शुरू हो गई पीसीआर से इस खबर और शब्‍द पर ‘खेलने’ की तैयारी। दरअसल, न्‍यूज चैनल में काम करने के दौरान का अनुभव रहा है कि किस तरह टीआरपी के लिए एडिटर, आउटपुट एडिटर, शिफ्ट इंचार्ज और रनडाउन प्रोड्यूसर चिल्‍लाते हैं कि इस खबर पर पूरा ‘खेलना’ है। इस ‘खेल’ और इसके ‘खेलने’ के चक्‍कर में राहुल कंवल जैसे बड़े पत्रकार मान बैठते हैं कि ‘दलित’ एक ‘जाति’ का नाम है।

दिल्‍ली में बैठने के बावजूद राहुल कंवल जैसे बड़े पत्रकारों को इस बात की जानकारी नहीं है कि राष्‍ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने 2008 में ही सारे राज्‍यों को निर्देशित कर रखा है कि वह अपने आधिकारिक दस्‍तावेजों में ‘दलित’ शब्‍द का इस्‍तेमाल ना करें। दलित की जगह अनुसूचित जाति का प्रयोग करें। पर सवाल वही है कि अनुसूचित जाति लिखने से ना तो खबरें ‘बिक’ सकती हैं और ना ही इस पर ‘खेला’ जा सकता है। अगर राहुल कंवल अपने समूह की वेबसाइट ‘द लल्‍लन टाप’ पढ़ लिये होते ‘दलित’ को ‘जाति’ बताने की शर्मिंदगी से बच सकते थे।

लेखक अनिल सिंह दिल्ली में लंबे समय तक टीवी और वेब पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों लखनऊ में ‘दृष्टांत’ मैग्जीन में वरिष्ठ पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. उनसे संपर्क 09451587800 या anilhamar@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


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One comment on “भारत के मीडिया घराने अब पत्रकारों की बजाय मैनेजरों के हाथों में हैं!”

  • कमलजीत सिंह says:

    सटीक उदहारण के साथ आपने अपनी बातों को साबित किया है । सड़क पर अचानक होने वाले हादसे में क्या पता होता है कि उसकी जद में आने वाला व्यक्ति दलित है । लेकिन अखबारों की हेडिंग में दलित शब्द ज़रूर समाहित होगा…ऐसे कई उदहारण होंगे .. सही प्रहार किया है आपने

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