न्यूज क्लिक वाले प्रबीर को गिरफ्तार करने पर आमादा दिल्ली पुलिस, कोर्ट के चलते बची जान

मोदी सरकार को अपनी आलोचना पसंद नहीं है. उसे पालतू मीडिया ही भाता है. इस पालतू मीडिया को जनता आजकल गोदी मीडिया का नाम दे चुकी है. पर कुछ ऐसे संस्थान हैं जो सच को पूरे साहस के साथ छापते हैं. इसी में एक है न्यूज क्लिक.

इस डिजिटल मीडिया हाउस के पीछे पड़ गई है केंद्र सरकार. दिल्ली पुलिस हर हाल में न्यूज क्लिक के मालिक प्रबीर पुरकायस्थ को गिरफ्तार करने पर आमादा है. लेकिन कोर्ट के चलते प्रबीर राहत की सांस ले रहे हैं. लेकिन लुकाछिपी का खेल जारी है.

पिछले दिनों संपादक की गिरफ्तारी पर आमादा दिल्ली पुलिस से कोर्ट ने आखिरकार पूछ ही लिया कि संपादक से हिरासत में पूछताछ जरूरी क्यों है? जज ने पूछा कि प्रथम दृष्टया जब कोई शिकायत नहीं है तो आपको याची को हिरासत में पूछताछ की जरूरत क्यों है?

इस सुनवाई के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने डिजिटल मीडिया पोर्टल न्यूजक्लिक के संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ की विदेशी फंडिंग के संबंध में गिरफ्तारी पर रोक 17 दिसंबर तक बढ़ा दी है. प्रबीर सत्रह दिसंबर तक राहत की सांस ले सकते हैं.

पुरकायस्थ की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति योगेश खन्ना ने दिल्ली पुलिस से पूछा कि जब भारतीय रिजर्व बैंक ने उनके पक्ष में प्रथम दृष्टया निष्कर्ष निकाला है, तो उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ की जरूरत क्यों है? न्यायमूर्ति ने पूछा कि प्रथम दृष्टया जब आरबीआई ने उनके खिलाफ कोई शिकायत नहीं दी उस मामले में आपको याची को हिरासत में पूछताछ की जरूरत क्यों है?

वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए पेश जांच अधिकारी ने कहा कि वह अभी भी अन्य लेनदेन का सत्यापन कर रहे हैं और जांच अभी चल रही है।

उच्च न्यायालय से प्रवर्तन निदेशालय द्वारा जांच के मामले में दंडात्मक कार्रवाई से प्रबीर को पहले से ही संरक्षण है.

दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा द्वारा दायर प्राथमिकी में आरोप है कि पीपीके न्यूजक्लिक स्टूडियो प्राइवेट लिमिटेड ने कानून का उल्लंघन करते हुए वित्त वर्ष 2018-19 में वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी यूएसए से 9.59 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्राप्त किया.

पुरकायस्थ की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल कोर्ट में पहले ही यह बता चुके हैं कि अमेरिका स्थित कंपनी से न्यूजक्लिक ने उस साल निधि प्राप्त की थी, जब एफडीआई पर कोई सीमा नहीं थी. सिब्बल ने तर्क दिया था कि वह लोकप्रिय पत्रकार हैं और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म चलाते हैं. डिजिटल मीडिया मंचों को विदेशों से पैसा लेने की अनुमति है, जिस पर सीमा मामल के अगले साल से प्रभावी हुई थी. पैसों के हेर-फेर का कोई सवाल नहीं उठता है क्योंकि इसका इस्तेमाल कर्मचारियों को वेतन देने में किया गया था और इस प्रक्रिया में कोई राजकोषीय घाटा नहीं हुआ था.

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