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ऑड-इवन से दिल्ली की सड़कों पर क्या फायदा हुआ?

Arvind Shesh : इति “ऑड-इवन” स्वाहा…! इति ‘कार-सेवा’ स्वाहा…! पंद्रह तारीख के साथ ही ऑड-इवन खत्म… और साथ ही दिल्ली में बसों को सहज तरीके से चलने वाली अकेली बीआरटी को खत्म करने का काम शुरू। यानी पंद्रह दिनों की ऑड-इवन कार-सेवा खत्म होने के साथ ही कार वालों की सेवा शुरू…! अब अचानक दिल्ली से प्रदूषण छू-मंतर हो जाएगा… और अगर कहीं से प्रदूषण आएगा तो वह तंदूर चूल्हे से आएगा… और उससे आगे खाना बनाने के लिए जलाई गई आग से आएगा…!

Arvind Shesh : इति “ऑड-इवन” स्वाहा…! इति ‘कार-सेवा’ स्वाहा…! पंद्रह तारीख के साथ ही ऑड-इवन खत्म… और साथ ही दिल्ली में बसों को सहज तरीके से चलने वाली अकेली बीआरटी को खत्म करने का काम शुरू। यानी पंद्रह दिनों की ऑड-इवन कार-सेवा खत्म होने के साथ ही कार वालों की सेवा शुरू…! अब अचानक दिल्ली से प्रदूषण छू-मंतर हो जाएगा… और अगर कहीं से प्रदूषण आएगा तो वह तंदूर चूल्हे से आएगा… और उससे आगे खाना बनाने के लिए जलाई गई आग से आएगा…!

यानी गधा बनाओ… चरखा चलाओ…! पॉलिटिक्स ऑफ कन्फ्यूजन का मामला यों ही नहीं औजार बनाया गया है…! पहले के अनेकानेक भरमों की तरह एक पखवाड़े तक कारों पर लगाम लगा कर इस आम आदमी पार्टी की सरकार ने अपने आम आदमी का पक्षधर होने का भरम फैलाया और लोग सोचने लगे कि यह तो सचमुच आम आदमी पार्टी की सरकार बन गई..! ऑड-इवन से दिल्ली की सड़कों पर क्या फायदा हुआ? प्रदूषण की बुनियाद पर ऑड-इवन योजना को लागू करना ही अपने आप में एक धोखा और वही पॉलिटिक्स ऑफ कन्फ्यूजन था… और अब वह अपनी नियति की ओर बढ़ रही है।

दिल्ली की सड़कों पर कारें अगर समस्या हैं तो वे अतिक्रमण की हैं, भयानक जाम की हैं… रोजाना लोगों के दो या चार घंटे खाने की है। इसलिए अगर ऑड-इवन लागू होना भी था तो उसकी बुनियाद कारों के समंदर से होने वाले जाम और गैरजिम्मेदार अतिक्रमण होना था। प्रदूषण की बुनियाद पर ऑड-इवन न लागू होना था, न हुआ। ज्यादा प्रदूषण सिर्फ दिसंबर और जनवरी का मामला होता है, उसके बाद अब कोई नहीं चिल्लाएगा कि प्रदूषण ने जीना हराम कर दिया है। जाम से कितनों की नौकरी भले चली जाए, कोई मर भले न जाए, लेकिन आभिजात्य समाजों में समस्या भी आभिजात्य ही रहेगा- यानी प्रदूषण… जो जितना है, उससे ज्यादा दिखावा है!

इन सबके इतर हो सके तो गौर कीजिएगा कि भ्रम की राजनीति परोसते हुए कौन-कौन से मुद्दे किसके पेट में घुस गए और गुम हो गए…!

पत्रकार अरविंद शेष के फेसबुक वॉल से.

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