अखिलेश के समाजवाद का हुआ विस्तार, क्रूर-वहशी भगवान की जिले-जिले में कराएंगे मूर्ति पूजा!

-समरेंद्र सिंह-

ये 21वीं सदी की समाजवादी पार्टी है – इसे डॉ लोहिया, डॉ अंबेडकर और संविधान से नहीं, परशुराम और मनुस्मृति से प्रेम है…

सबसे पहले कुछ सवाल:

1) क्या कोई अपनी मां से इस हद तक नफरत कर सकता है कि उसकी हत्या कर दे?

2) सिर्फ मां की ही नहीं बल्कि मां का जिस जाति या नस्ल से संबंध हो – उस पूरी जाति और नस्ल को ही खत्म करने की कोशिश करे? वह भी एक बार नहीं बल्कि अनेक बार? छोटे-छोटे बच्चों की भी हत्या कर दे और उनकी भी जो गर्भ में ही हों?

3) और क्या कोई भी समाज ऐसे हिंसक, क्रूर और वहशी व्यक्ति को अपना भगवान मान सकता है? जो समाज ऐसे किसी व्यक्ति या चरित्र को भगवान मानता है वह समाज कितना हिंसक होगा?

4) और ऐसे हिंसक भगवान का समाजवाद से कोई संबंध हो सकता है क्या? ऐसे हिंसक और क्रूर भगवान की पूजा करने वाला समाजवादी कहला सकता है क्या?

5) इसी से जुड़ा आखिरी सवाल है कि क्या इस भगवान के सहारे उग्र हिंदुत्व/ हिंदूवाद की चुनौती का सामना किया जा सकता है? क्या इसके सहारे दलितों, शोषितों और वंचितों की लड़ाई लड़ी और जीती जा सकती है?

आप सोच रहे होंगे कि इन सवालों का संदर्भ क्या है? और मैं किस भगवान और समाज की बात कर रहा हूं? इसका संदर्भ है समाजवादी पार्टी. उस पार्टी के एक ब्राह्मण नेता हैं अभिषेक मिश्रा. सुनते हैं कि अभिषेक मिश्रा इन दिनों अखिलेश यादव के सलाहकार हैं. इन सलाहकार महोदय ने घोषणा की है कि उत्तर प्रदेश के हर जिले में परशुराम की मूर्ति लगायी जाएगी और इस फैसले में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की सहमति है. इतना ही नहीं लखनऊ में 108 फुट ऊंची प्रतिमा लगाई जाएगी. कुछ दिन पहले समाजवादी पार्टी ने यह भी ऐलान किया था कि गरीब ब्राह्मणों की बेटियों की शादी में पार्टी मदद करेगी. गरीबों की बात करते करते बात गरीब ब्राह्मणों पर सिमट गई है.

ये नया समाजवाद है. जिसमें शोषितों, वंचितों के नायकों की नहीं बल्कि शोषण और क्रूरता के पर्याय माने जाने वाले भगवानों की बात होती है. समाजवादी मूल्यों की नहीं बल्कि धार्मिक और दबंग जातियों के अहंकार की बात होती है. संविधान की नहीं मनुस्मृति की बात होती है. आगे बढ़ने से पहले ये जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर परशुराम हैं कौन? और इसका भारतीय समाज की कुंठा और उस कुंठा से जन्म लेनी वाली क्रूरता से क्या संबंध है.

हिंदू धर्म के तीन देव हैं. ब्रह्मा, विष्णु और महेश. ब्रह्मा जन्म देते हैं. विष्णु पालते हैं और महेश यानि शिव संहार करते हैं. बताया जाता है कि विष्णु के दश अवतार हैं. जिनमें से नौ का जन्म हो चुका है और दसवें यानि कल्कि का अवतार तब होगा जब यह कलयुग खत्म होने को होगा. कल्कि जन्म लेंगे और राफेल, रॉकेट, मिसाइल और परमाणु बम के युग में घोड़े पर सवार होकर तलवार से दुष्टों का नाश करेंगे और सतयुग स्थापित करेंगे. इन्हीं दस अवतारों में से छठे अवतार परशुराम हैं और सातवें राम हैं. राम पर बीते कुछ दिनों में काफी चर्चा हुई है. लेकिन परशुराम पर नहीं हुई है. आज परशुराम पर चर्चा कर लेते हैं और सबसे पहले यह जानते हैं कि परशुराम हैं कौन?

परशुराम के पिता जमदग्नि ब्राह्मण ऋषि थे. उन्होंने अपने से काफी कम उम्र की एक क्षत्रिय कन्या रेणुका से शादी की थी. जमदग्नि के “बीज” से रेणुका ने अपनी कोख में परशुराम को पाला और जन्म दिया. ऐसा माना जाता है कि पढ़े-लिखे व्यक्ति में अहंकार कम हो जाता है. खासकर जो ऋषि हो उसका अहंकार से क्या लेना देना? जिसने खुद को ईश्वर को समर्पित कर दिया हो वो अहंकार और क्रोध पाले यह अच्छी बात नहीं है. लेकिन हमारे देश में ऋषि लोग आले दर्जे के अहंकारी, क्रूर और कपटी हुए हैं.

तो ऋषि जमदग्नि ने अपने कुल से एक वर्ण नीचे और वह भी अपने से काफी कम उम्र की लड़की से शादी तो कर ली, लेकिन अपने रिश्ते को लेकर उसके मन में संशय बना रहा. यही नहीं दूसरे कुल में शादी करने की वजह से अपने कुल में उसका मान भी घट गया. ऐसा इसलिए कि महान सनातनी भारतीय परंपरा के मुताबिक निम्न वर्ण में शादी करने वाले की अपने कुल में महत्ता घट जाती है. इसे आप मनुस्मृति के इस श्लोक से समझ सकते हैं:

“यदि स्वांश्चापरांश्चैव विन्देरन्योषितो द्विजाः।
तासां वर्णक्रमेण स्याज्ज्यैष्ठं पूजा च वेश्म च ।।

(अर्थ- द्विज जातियों – ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य – के अपनी जाति की स्त्रियों से और दूसरी जाति की स्त्रियों से विवाह करने पर वर्णक्रम से ही उनकी ज्येष्ठता, पूजा और कुलीनता माननी चाहिए. अभिप्राय यह है कि क्षत्रिय लड़की से विवाह करने वाला ब्राह्मण, ब्राह्मणी से विवाह करने वाले ब्राह्मण से हीन माना जाएगा. )

क्षत्रिय स्त्री रेणुका से शादी के बाद ब्राह्मण ऋषि जमदग्नि की अपने कुल में महत्ता घट गई. मान सम्मान कम हो गया. वो दोयम दर्जे से ऋषि समझे जाने लगे. इतना ही नहीं उनकी संतान जो कि विष्णु का अवतार थी और इस नाते उसे भगवान का दर्जा हासिल था, उसमें भी दोष उत्पन्न हो गया. नीच कुल के कुछ संस्कार उसके उच्च कुल के लहू में घुल गए और वो अपने कुल में यानि ब्राह्मणों के बीच पतित कहलाने लगे.

इसे आप मनुस्मृति के इस श्लोक से समझिए:

स्त्रीष्वनन्तरजातासु द्विजैरुत्पादितान्सुतान्।
सदृशानेव तानाहुर्मातृदोषविगर्हितान् ।।
(अर्थ – द्विजों द्वारा अपने क्रम से हीन जाति की स्त्रियों से (ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिय लड़की से तथा क्षत्रिय द्वारा वैश्य लड़की से) उत्पन्न सन्तान माता के दोष के कारण पतित होती है।)

मतलब पिता और पुत्र दोनों की अपने समाज में स्थित कमजोर हो गई. वो नीच समझे जाने लगे. एक संकीर्ण और सामंती समाज में जहां तप करने मात्र से दलित ऋषि शंबूक की हत्या कर दी जाती हो, वैसे संकीर्ण और क्रूर समाज में वर्णसंकर परशुराम के भीतर कितना क्रोध पल रहा होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता सकता है. उनसे बार बार कहा गया होगा कि वह ब्राह्मण होने के बावजूद नीच है. उनके खून में गंदगी घुली हुई है. दोष है. और यह दोष उनकी मां की वजह से है. मतलब उनके उज्ज्वल वर्ण पर उनकी मां एक बदनुमा दाग की तरह है.

यही सुनते हुए परशुराम बड़े होने लगे. एक दिन ऋषि जमदग्नि को अपनी पत्नी रेणुका के चरित्र पर संदेह उत्पन्न हो गया. हुआ यह कि उस दिन रेणुका सरोवर में स्नान के लिए गईं थीं. वहां कोई राजा चित्ररथ भी था. उस राजा को देख कर रेणुका के मन में कुछ भाव उत्पन्न हो गए. मर्द और औरतों के बीच बहुत से भाव उत्पन्न हो जाते हैं. यह स्वभाविक चीज है. खुद ऋषि जमदग्नि के मन में भी रेणुका को देख कर भाव उत्पन्न हुए थे तभी उन्होंने उनके पिता से उसका हाथ मांगा था. लेकिन रेणुका के मन में किसी के लिए भाव उत्पन्न हो जाना एक बहुत “संगीन अपराध” था. रेणुका जब घर पहुंची तो ऋषि जमदग्नि ने उनके मन में उठ रहे इन भावों को अपने “तप के बल” पर पढ़ लिया. ये बहुत संगीन अपराध थे. इतने संगीन अपराध कि ऋषि जमदग्नि ने परशुराम को आदेश दिया कि वह अपनी मां का “वध” कर दे. धार्मिक लोग ऐसी हत्याओं को “वध” कहते हैं. “पापियों” का “वध” होता है और “वध” “जायज” होता है.

पिता भक्त परशुराम में अपना फरसा उठाया और अपनी मां की हत्या कर दी. मां से और उसके नीच कुल से परशुराम की नफरत यहीं खत्म नहीं हुई. इसके बाद एक छोटी घटना और घटी. किसी क्षत्रिय राजा ने परशुराम के पिता को कुछ गायें दान में दी थीं. उस राजा के बेटों ने बाद में वो गायें ऋषि जमदग्नि से छीन लीं. जिसके बाद परशुराम ने 21 बार क्षत्रिय कुल का नाश किया. छोटे-छोटे बच्चों तक की हत्या कर दी. किसी तरह कुछ लोग छिप-छिपा कर बच जाते थे और फिर कुनबा बड़ा होता तो परशुराम फिर जाकर सबकी हत्या कर देते.

हमारे देश में ऐसे “प्रतापी” भगवान “परशुराम” की पूजा मुख्य तौर पर ब्राह्मण वर्ण के लोग ही करते हैं. ब्राह्मण वर्ण में ब्राह्मण के अलावा ऐसे वर्णसंकर शामिल हैं जिनके पिता तो ब्राह्मण रहे हैं, लेकिन माता क्षत्रिय या फिर वैश्य वर्ण की रही हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में भूमिहार और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के त्यागी खुद को परशुराम का वंशज मानते हैं. नियम के मुताबिक वो ब्राह्मण हैं, मगर “शुद्ध” ब्राह्मण उन्हें ब्राह्मण नहीं मानते. लेकिन ये “शुद्ध” ब्राह्मण परशुराम की पूजा जोरशोर से करते हैं. इसकी मुख्य वजह परशुराम का रौद्र रूप. यह रूप अन्य वर्ण के लोगों को डराने-धमकाने के काम आता है. बाहुबल को लेकर इनके भीतर की हीन ग्रंथी से इन्हें मुक्त करता है. बहुत से ब्राह्मण दूसरे वर्ण के लोगों से बार बार कहते हैं कि ज्यादा बोलोगे तो जैसे परशुराम ने क्षत्रियों का “नाश” किया था वैसे ही तुम्हारा भी “नाश” कर देंगे.

अब इतने क्रूर और वहशी भगवान की मूर्ति हर जिले में लगा कर समाजवादी पार्टी वंचित, शोषित, दलित तबकों को कौन सा संकेत देना चाहती है? कौन सा समाजवाद स्थापित करना चाहती है? और क्या इस तरह से बीजेपी को चुनौती दी जा सकती है?

वरिष्ठ पत्रकार समरेंद्र सिंह की एफबी वॉल से।


इसी प्रकरण पर वरिष्ठ पत्रकार शम्भू नाथ शुक्ल की टिप्पणी पढ़ें-

अखिलेश यादव परशुराम की प्रतिमा लगवाएँगे। लेकिन इससे क्या होगा? ब्राह्मण परशुराम को न अपना पूर्वज मानते हैं न अपना ईष्ट। मुझे याद नहीं पड़ रहा, कि कभी हम लोगों के घर या परिवार में किसी को पता भी था, कि परशुराम जयंती कब होती है! यह तो 2005 में मुलायम सिंह ने घोषणा की कि परशुराम जयंती अक्षय तृतीया को होती है और उस दिन अवकाश हुआ करेगा। हमें चित्रगुप्त जयंती पता थी, कृष्ण, राम और शिव की भी। अग्रसेन, विश्वकर्मा आदि देवों की भी जयंतियाँ पता थीं। यहाँ तक कि राणा प्रताप और मुहम्मद साहब की। लेकिन परशुराम जयंती को न हम जानते थे न उन्हें पूजते थे। उलटे वे जिस भार्गव कुल से थे, उनसे बाक़ी के ब्राह्मण दूरी बरतते हैं। इसलिए मेरी राय है, कि अखिलेश यह नौटंकी बंद करें। पूजा ही करनी है और प्रतिमा लगवानी है तो अयोध्या, मथुरा या काशी जाएँ और राम, कृष्ण या शिव की प्रतिमा ही लगवाएँ।

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Comments on “अखिलेश के समाजवाद का हुआ विस्तार, क्रूर-वहशी भगवान की जिले-जिले में कराएंगे मूर्ति पूजा!

  • अमित शर्मा says:

    हद दर्जे का निहायत ही घटिया लेख लिखा है, दूषित मानसिकता एक एक शब्द से टपक रही है।

    ऋषियों और भगवान परशुराम के लिए जिस प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया गया है वह नाकाबिले बर्दाश्त है।

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    • Achyut Kumar Dwivedi says:

      शर्म आती है ऐसे लोगों की मानसिकता पर जो भगवान के अवतार पर भी सवालिया निशान लगा रहे हैं… उन्हें क्रूर वहशी कह रहे हैं….

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  • परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रीय विहीन कर दिया तो ये जो मूंछों पर ताव दिये ठाकुर बने घूमते हैं वे असली ठाकुर हैं या दोगले

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  • Lekhak kuntha se grashit hai …. yah rajpoot shrishth ki bhawna se grashit hai …. ramchandraji ne ravan ka badh kiya tha … kukaromo ke karan ….. isme ram ko koi doshi nahi kahta hai ….. par samrandra apne jatiy ahankar ke vashiboot yah bhi nahi dekh pa raha hai ki parshuramji ne kyon durachari ksatrion ko mara tha ….

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  • Udit Bhartiya says:

    किसी भी समाज के भगबान के बारे इस तरह का लेख नही लिखना चाहिए
    पत्रकारिता की आड़, राजनीति नही करनी चााहिए ब भगबान के बदनाम नही करना चाहिए
    इस तरह के घाटियाँ शब्दावली का प्रयोग विलकुल नही करना चाहिए

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  • Dhirendra Kumar Awasthi says:

    हीन भावना से ग्रसित होकर आसमान पर थूकने से आसमान का कुछ नहीं बिगड़ेगा, परन्तु आसमान पर थूकने वाला अपना अहित अवश्य कर बैठेगा।

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