SSP वैभव कृष्णा और नोएडा पुलिस की जालसाजी FIR के पहले पैराग्राफ से ही समझ में आ जाती है!

समरेंद्र सिंह

Samarendra Singh : पुलिस की दादागीरी, पत्रकार को फर्जी मामले में फंसाया… 23 अगस्त को नोएडा पुलिस एक पुराने मामले में एक नया मुकदमा दर्ज करती है. फिर पांच सौ किलोमीटर दूर जाकर लखनऊ से एक पत्रकार को रातों रात उठा लेती है. उसका दफ्तर सील कर देती है. उस पर गैंगस्टर एक्ट लगा देती है. कई अन्य धाराओं में भी मुकदमा दर्ज करा देती है. और ऐसा करते हुए नोएडा पुलिस दलील देती है कि गिरफ्तार हुए शख्स ने पत्रकारिता के “पवित्र” पेशे को बदनाम किया है. लेकिन सच्चाई यह है कि नोएडा पुलिस ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि जिले के एसएसपी वैभव कृष्णा और उनके कुछ साथी ऐसा चाहते थे.

यह मामला लखनऊ के युवा पत्रकार नीतीश पांडे से जुड़ा है. नीतीश पांडे एक वेबसाइट चलाते हैं. उस वेबसाइट का नाम है www.policenewsup.com … इस वेबसाइट पर उत्तर प्रदेश पुलिस से जुड़ी कुछ खबरें छपती हैं. कभी तारीफ में. कभी खिलाफ भी. इसमें नोएडा की कुछ खबरें छपीं. कुछ खबरें वैभव कृष्णा के पक्ष में भी थीं और कुछ खिलाफ भी थीं. खिलाफ वाली खबरों से वैभव कृष्णा आहत थे. उन्होंने कई बार पत्रकारों से इस बारे में शिकायत भी की. नीतीश पांडे के खिलाफ शिकायत की. लेकिन बात यहां तक पहुंच जाएगी इसका अंदाजा किसी को भी नहीं था.

बीती शाम वैभव कृष्णा के इशारे पर एक पुराने मामले में नीतीश पांडे का नाम जोड़ा गया और उनके खिलाफ कई धाराओं में मुकदमा दर्ज करा दिया गया. उन्हें सुनियोजित तरीके से फंसाया गया है. इतना ही नहीं. कल ही मुकदमा दर्ज हुआ और कल ही नोएडा पुलिस की टीम पांच सौ किलोमीटर की दूरी तय करके लखनऊ पहुंच गई. फिल्मी अंदाज में www.policenewsup.com के दफ्तर पर छापा मारा गया. और फिर वहां मौजूद नीतीश पांडे को गिरफ्तार कर लिया. उसके बाद दफ्तर सील करने का आदेश जारी कर दिया.

वहां मौजूद लोगों को सिर्फ इतना ही बताया जाता है कि नीतीश पांडे एक बड़े गिरोह का सदस्य है. वसूली गैंग का सदस्य है. किससे वसूली की गई? किस कारोबारी या फिर अधिकारी को धमकाया गया? किस अफसर से अनैतिक लाभ लिया गया? पुलिस की टीम ने कुछ भी नहीं बताया. पूरी रात घर के लोग परेशान रहे. चूंकि नीतीश पांडे पत्रकार हैं और पिछले काफी समय से लखनऊ में काम करते हैं इसलिए बहुत से पत्रकार जानने वाले हैं. उन सभी ने पुलिस के आला अधिकारियों से बात की. सबने यही कहा कि वैभव कृष्णा ने उन्हें बताया है कि मामला बहुत संगीन है और गिरोह बड़ा ताकतवर है. इनकी जड़ें काफी गहरी हैं. बहुत से अफसरों को ये ब्लैकमेल कर रहे हैं. वैभव कृष्णा की इस दलील से सब सन्नाटे में थे. लेकिन आज जब एफआईआर की कॉपी मिली तो सारी तस्वीर साफ हो गई. सीधे तौर पर यह मसला कुछ अफसरों के अहंकार का मसला है. उन्होंने नीतीश पांडे को सबक सिखाने के लिए, उन्हें वर्दी का रौब दिखाने के लिए एक फर्जीवाड़ा किया है.

SSP वैभव कृष्णा और नोएडा पुलिस की जालसाजी समझने के लिए आपको एफआईआर के पहले पैराग्राफ पर नजर डालने की जरूरत है. इसमें कहा गया है कि “यह गैंग उपरोक्त कार्य दो प्रकार से संपादित करता है. प्रथम इस गैंग के सदस्य सरकारी सेवकों विशेषकर पुलिस अधिकारियों को अनुचित आर्थिक लाभ का प्रलोभन देकर अभियुक्तों के पक्ष में कार्य करने के लिए उत्प्रेरित करते हैं. जो सरकारी सेवक/पुलिस अधिकारी इनके उत्प्रेरण के प्रभाव में आ जाते हैं, उनको ये अवैध अनुचित दुनियावी/ ऐहिक, आर्थिक लाभ के माध्यम से उनके विधिपूर्ण सरकारी कार्य से विमुक्त कर अभियुक्तों के पक्ष में अनुचित व विधि विरुद्ध कार्य करवाते हैं तथा जो सरकारी सेवक/पुलिस अधिकारी इनके इस विधि विरुद्ध उत्प्रेरण के प्रभाव में नहीं आते हैं उसके विरुद्ध ये लोग विभिन्न इलैक्ट्रोनिक वो सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म जैसे न्यूज पोर्टल व्हाट्सअप फेसबुक, ट्विटर आदि पर व्यापक रूप से उसके विरुद्ध असत्य, अनर्गल व तथ्यहीन प्रचार प्रसार कर उसकी नकारात्मक छवि बना कर इतना दवाब डालने का प्रयत्न करते हैं कि वह सरकारी सेवक/ पुलिस अधिकारी विवश होकर अपने विधियुक्त सरकारी कर्तव्यो को छोड़ कर इन लोगों की इच्छा अनुसार अवैध कार्य करने लगे.”

एफआईआर पर यकीन करें तो इस गिरोह के “प्रभाव” में बहुत से “सरकारी सेवक” हैं. और उन “सरकारी सेवक” ने इस गिरोह के नैतिक/अनैतिक हथकंडों के दबाव में आकर बहुत से अनैतिक कार्य किए हैं. वो कार्य जो “विधि विरुद्ध” हैं. अब “विधि विरुद्ध” का अर्थ क्या है? वो कार्य जिन्हें कानून की परिभाषा में अपराध कहा जा सकता है. एफआईआर के मुताबिक इस गैंग के प्रभाव में जो अफसर हैं, (आईएएस, आईपीएस, पीसीएस) उन्होंने अपराध किया है. लेकिन इस एफआईआर में ऐसे एक भी अफसर का जिक्र नहीं है. वैभव कृष्णा को उन अफसरों का ब्यौरा देना चाहिए. यह ब्यौरा भी देना चाहिए कि नीतीश पांडे के बहकावे में, प्रलोभन में, रिश्वत लेकर या फिर डराने-धमकाने पर कौन-कौन से अफसरों ने अपराध किया है और कौन-कौन सा अपराध किया है? वैभव कृष्णा को “विधि विरुद्ध” काम करने वाले अफसरों की सूची, उनके विधि विरुद्ध कार्य की सूची और विधि विरुद्ध कार्यों के लिए मजबूर होने की वजहों की सूची सार्वजनिक करनी चाहिए.

इस एफआईआर में ऐसा कोई ब्यौरा नहीं है. कुछ महीने पुराना वो मामला है जिसमें पहले कुछ लोग गिरफ्तार किए गए थे. इस बार उसी मामले में एक नाम और जोड़ दिया गया है. नीतीश पांडे का नाम और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है. इस एफआईआर में जो ब्यौरा दिया गया है उसमें कुछ खबरें हैं. खबरें जिसमें “जाति के आधार पर पोस्टिंग” की बात कही गई है. इसके अलावा एफआईआर में? कुछ ऐसी खबरों का जिक्र है जिनसे वैभव कृष्णा, कलानिधि और आकाश तोमर के कामकाज के तरीके पर सवाल उठते हैं.

एफआईआर के मुताबिक ये खबरें वैभव कृष्णा, कलानिधि नैथानी और आकाश तोमर पर दबाव डालने के लिए छापी गई हैं. ताकि उनसे कुछ अनैतिक और विधि विरुद्ध काम कराए जा सकें. अगर यह सच है तो नीतीश पांडे ने उन सभी से कुछ अनैतिक काम करने की गुजारिश भी की होगी. वैभव कृष्णा और उनके साथियों को यह साफ करना चाहिए कि उन सभी से नीतीश पांडे ने कौन-कौन से अनैतिक और विधि विरुद्ध कार्य करने की गुजारिश की थी? किन-किन अपराधियों को बचाने की गुजारिश की थी? यह भी बताना चाहिए कि ऐसा करने के एवज में नीतीश ने वैभव कृष्णा, कलानिधि नैथानी और आकाश तोमर को क्या कुछ ऑफर किया था?

खैर, वैभव कृष्णा ने वो कर दिया है जो उन्हें नहीं करना चाहिए था. नीतीश पांडे से कुछ चूक हुई थी. उसे एक युवा पत्रकार की तरफ से हुई चूक कहा जा सकता है. लेकिन जवाब में वैभव कृष्णा ने अपनी हरकत से कानून व्यवस्था का तमाशा बना दिया है. वैभव कृष्णा और उनके साथियों ने बताया है कि वो जब चाहें, कहीं से भी किसी को भी उठा सकते हैं. उसे सलाखों से पीछे डाल सकते हैं. और ऐसा करते वक्त उन्हें किसी सुबूत और किसी गवाह की जरूरत नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या प्रदेश नेतृत्व पुलिस महकमे द्वारा कानून व्यवस्था के इस भद्दे और क्रूर खिलवाड़ पर कोई कदम उठाएगा या नहीं? इंसाफ की आस जिंदा रहेगी या नहीं?

लेखक समरेंद्र सिंह लंबे समय तक एनडीटीवी न्यूज चैनल में कार्यरत रहे हैं.

पूरे प्रकरण को समझने और गिरफ्तार पत्रकारों का पक्ष जानने के लिए ये वीडियो जरूर देखें-

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Posted by Bhadas4media on Saturday, August 24, 2019

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One comment on “SSP वैभव कृष्णा और नोएडा पुलिस की जालसाजी FIR के पहले पैराग्राफ से ही समझ में आ जाती है!”

  • Madan kumar tiwary says:

    सब मिलेगा डायरी में, क्यों नही आपलोगो ने बेल आवेदन मूव करते समय पुलिस डायरी की मांग की ?बिहार-यूपी में यह ब्लैकमेलर पत्रकारों का गिरोह दशको से है, इनका काम ही दलाली,भयादोहन है, अब जाकर इन्हें पता चलेगा कि कानून सबके लिए बराबर है, बहुत गुंडागर्दी करते है, हर व्यक्ति इनके खौफ में जीता है

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