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कोरोना से ‘कादम्बिनी’ के संपादक रहे राजीव कटारा की मौत

चंद्रभूषण

मीडिया सर्कल में दो सबसे नजदीकी लोग कादम्बिनी में काम करते थे। कोरोना काल में ही पहले शशिभूषण गए, फिर कादम्बिनी गई और अब राजीव कटारा भी चले गए। बहुत निजी किस्म की हतक है, क्या कहूं?

-अम्बरीश कुमार-

पुराने साथी और कादंबनी के पूर्व संपादक राजीव कटारा भी चले गए कोरोना की वजह से। विनम्र श्रद्धांजलि। यात्रा संस्मरण पर कितना लिखवाया था उन्होंने। याद आता है दिल्ली के पटपड़गंज स्थित आशीर्वाद एपार्टमेंट के अपने घर में उनकी मुलाकात का सिलसिला। दिल्ली छूटी पर संपर्क बना रहा। उनके जैसा विनम्र और सहज स्वभाव पत्रकारों में कम दिखता है।

-मनोज पमार-

कोई तो कह दे ये खबर सच नहीं। कुछ देर पहले वरिष्ठ पत्रकार और बड़े भाई राजीव कटारा जी के आकस्मिक निधन की सूचना मिली तो यकीन ही ना हुआ। दीवाली से कुछ दिन पहले ही उनसे कुछ किताबों पर लंबी चर्चा हुई थी। चंबल के बीहड़ और धौलपुर से पारिवारिक लगाव कई मायनों में मुझे उनके नजदीक रखता था। जब भी बात की पूरे अधिकार और अपनेपन के साथ। बहुत याद आएंगे राजीव जी।

-रविंद्र त्रिपाठी-

दिल्ली में मेरे सबसे पुराने मित्र और एमे में मेरे सहपाठी , पत्रकार और हरदिल अजीज राजीव कटारा का निधन हो गया। वे भी korona के शिकार हुए। मेरे और राजीव के एक और सहपाठी थे दीपक सिन्हा जिनका लगभग तीस साल पहले निधन हो गया था। आज दीपक की भी बहुत याद आ रही है।
ज्यादा लिखा नहीं जा रहा है। मन विचलित हो रहा है। बहुत सी यादें हैं। पर सब कुछ अस्तव्यस्त हो रहा है।

-राकेश कायस्थ-

वे गर्मजोशी से भरे, असाधारण रूप से मददगार, सज्जन और सच्चे अजातशत्रु थे। लंबे समय तक कांदिबिनी जैसी पत्रिका का संपादन करने वाले राजीव कटारा को कोरोना ने हमसे छीन लिया। उन जैसे व्यक्ति आसानी से नहीं मिलते। यह समय हमें बार-बार एहसास दिला रहा है कि कुदरत के आगे हम कितने लाचार हैं। जीवन में जितना भी वक्त है, आदमी बिना राग-द्वेष के बिता ले कौन जाने कल क्या होगा।

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