तीन दशक तक रेडियो पर गूंजनेवाली ये आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई!

अभिरंजन कुमार-

ऑल इंडिया रेडियो के ख्यातिप्राप्त समाचार वाचक रामानुज प्रसाद सिंह जी के निधन की खबर से सदमे में हूं।

एक तो वे मेरी ही मिट्टी बेगूसराय के थे और खास बात यह कि मेरे प्रिय कवि और मेरे साहित्य कुलगुरु रामधारी सिंह दिनकर के अनुज सत्यनारायण जी के बेटे यानी दिनकर जी के भतीजे थे।

दूसरा कि मैं भी कुछ वर्षों तक आकाशवाणी दिल्ली में कैजुअल समाचार वाचक के रूप में काम कर चुका हूं और वहीं उनसे भी यदा-कदा मुलाकात हो जाती थी। एक शानदार समाचार वाचक और बेहतरीन आवाज़ के धनी तो थे ही, एक बेहद जिंदादिल इंसान भी थे।

उनके निधन पर समाचारवाचक बिरादरी और बेगूसराय के लोगों की तरफ से भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें।


मनोज मलयानिल-

ये आकाशवाणी है, अब आप रामानुज प्रसाद सिंह से समाचार सुनिए…करीब तीन दशक तक रेडियो पर गुंजनेवाली ये आवाज आज हमेशा के लिए खामोश हो गई।

रेडियो से बेइंतहा लगाव होने के कारण पत्रकारिता के छात्र के रुप में मैंने सबसे पहले इंटर्नशिप के लिए आकाशवाणी को चुना था। इंटर्नशिप का पहला दिन था, आकाशवाणी के न्यूज सर्विस डिविजन में दिग्गज समाचार वाचकों को कौतुहल भरी नज़रों से देख रहा था। पायजामा-कुर्ता पहने भव्य काया में सामने बैठे एक व्यक्ति ने मेरा नाम और परिचय पूछा। मैंने अपना घर बिहार का समस्तीपुर बताया।

उन्होंने छूटते पूछा अरे अपने गाँव का नाम बताओ। मैंने अपने गांव का नाम बताया। फिर उन्होंने कहा, ”मैं सिमरिया का रहनेवाला हूं, मेरी एक बुआ तुम्हारे गांव के पास में ही रहती हैं” । आवाज कुछ जानी पहचानी लग रही थी, फिर भी मैंने धीरे से उनसे पूछा, ”सर आपका नाम क्या है?” उन्होंने कहा रामानुज प्रसाद सिंह।

मैंने कहा ‘ सर, आपको तो बचपन से हम सुनते आ रहे हैं”। उन्होंने कहा, “आओ मेरे साथ”। फिर अपने साथ मुझे वो उस स्टूडियो में ले गए जहां से बड़े-बड़े दिग्गज समाचार पढ़ते थे। मुझे सहज बनाने के लिए उस कुर्सी पर बिठाया जिस कुर्सी पर बैठकर समाचार वाचक ख़बरों को पढ़ते थे। उन्होंने मुझे समाचार वाचन की कई बारीकियां समझाई।

कई दिनों बाद न्यूज रुम में ही जानकारी मिली कि वो महान साहित्यकार रामधारी सिंह दिनकर के भतीजे हैं। बहुत सहज और सरल व्यक्तित्व के स्वामी थे रामानुज प्रसाद सिंह। आकाशवाणी के मेरे पहले गुरु को अंतरात्मा से श्रद्धांजलि!


राणा यशवंत-

सुबह से बिहार के कई मित्रों की पोस्ट देख रहा हूं जिसमें वे ऑल इंडिया रेडियो के प्रख्यात समाचार वाचक रामानुज प्रसाद सिंह के निधन पर अपने अपने संस्मरणों से होकर गुजर रहे हैं। वैे राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के भतीजे थे औऱ बिहार के बेगूसराय से थे- यह बहुत कम लोगों को पता होगा। हम बिहारियों ने कभी ये कोशिश ही नहीं की कि हमारी माटी के नगीनों को हम देश के सीने पर तमगे की तरह टांकें। इसपर जल्द विस्तार से लिखूंगा।

फिलहाल तो रेडियो के रत्नों की बात चल रही है और वे लोग जो अस्सी के दशक में होश संभाल रहे थे, घर में सुबह शाम का समाचार रेडियो पर सुना जाता था, उनको रामानुज प्रसाद सिंह का नाम याद रहेगा। देवकीनंदन पांडे, रामानुज प्रसाद सिंह, इंदु वाही – ये ऐसे समाचार वाचक रहे जिनसे उस दौर का घर-घर परिचित था। समाचर से लेकर क्रिकेट-हॉकी की कमेंट्री और फिल्मी गानों को सुनने का एकमात्र जरिया था रेडियो। इसलिए उस दौर के तमाम नाम आज भी कहीं ना कहीं स्मृतियों के जंगल में विशालकाय दरख्त-से खड़े मिलते हैं।

जसदेव सिंह, सुशील दोषी, जेपी नारायणन, मुरली मनोहर मंजुल ये ऐसे नाम है जो अपनी कॉमेंट्री के बूते मैच को सुननेवाले की आंखों के सामने रख दिया करते थे। स्कूल से आते समय, पटौनी या दौनी के वक्त, सांझ में किसी पोखर या कुएं के किनारे, रात में बिस्तर में लेटकर इनलोगों की जो कमेंट्री सुनी, उसने आज भी कई मैचों को जे़हन में ज़िंदा रखा है। लड्डू लाल मीणा और शहनाज आज भी उन रातों की याद दिला दिया करते हैं जब छाया गीत छत पर लेटे हुए चांदनी रातों में सुना करते थे।

चांद के नीचे से बादल का टुकड़ा गुजर रहा था और गाना बजा आधा है चंद्रमा रात आधी….। दूर पड़े उन दिनों के चेहरे आज भी साफ-शफ्फाक दिखते हैं। आज भी वे नाम मंदिर के कंगूरे की तरह दूर से नजर आते हैं। आज भी वो आवाज कौंध जाती है – ये आकाशवाणी है। अब आप रामानुज प्रसाद सिंह से समाचार सुनिए।

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