रांची प्रेस क्लब पर लगे आरोपों पर सचिव अखिलेश सिंह ने दी सफाई

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अखिलेश सिंह-

रांची प्रेस क्लब… कितने झूठ, कितने सच…

बिरसा का गांडीव। कहने को अखबार है, लेकिन इन दिनों छपता नहीं। पीडीएफ पर निकलता है और व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर फॉरवर्ड होता है। पीडीएफ पत्रकारिता करनेवाले इसके संपादक ने रांची प्रेस क्लब को बदनाम करने का सिलसिलेवार अभियान शुरू किया है। पिछले तीन दिनों में रांची प्रेस क्लब के बारे में इस पीडीएफ अखबार ने जो खबरें छापी हैं, वह निराधार, भ्रामक, अपमानजनक और तथ्यविहीन हैं।

रांची प्रेस क्लब के बारे में किये जा रहे दुष्प्रचार के बारे में एक बार फिर बिंदुवार हम अपना पक्ष स्पष्ट कर रहे हैं-

  1. पहले दिन जो खबर छापी गयी, उसकी हेडिंग थी- रांची प्रेस क्लब के नाम पर लाखों का वारा-न्यारा। हेडिंग कोई भी पढ़ेगा, तो ऐसा लगेगा कि जैसे रांची प्रेस क्लब में कोई बड़ी वित्तीय गड़बड़ी हो गयी हो या कोई घोटाला हो गया है। ऐसा कोई मामला है ही नहीं। *प्रेस क्लब के अकाउंट से एक भी पैसा नाजायज तरीके से इधर-उधर गया नहीं। प्रेस क्लब का जो भी फंड है, वह वैध तरीके से आया है और जितना भी खर्च हुआ है, उसकी एक-एक पाई का हिसाब है। कोई भी आम सदस्य प्रेस क्लब से लिखित तौर पर फंड की एक-एक पाई का हिसाब ले सकता है। यह प्रावधान प्रेस क्लब के संविधान में है।
  2. अखबार ने मिशन ब्लू फाउंडेशन के पंकज सोनी के हवाले से लिखा कि प्रेस क्लब उगाही कर रहा है। हम पुनः स्पष्ट कर रहे हैं कि कोविड की दूसरी लहर के दौरान प्रेस क्लब को विधायक अनूप सिंह ने पांच लाख, एक स्वयंसेवी संस्था असर ने डेढ़ लाख और मुनचुन राय ने 50 हजार रुपये की मदद दी। ये राशि प्रेस क्लब के आधिकारिक अकाउंट में डाली गयी है। इन दाताओं से जो मदद मिली, उसके बारे में प्रेस क्लब ने खुद रिलीज जारी किया और पब्लिकली यह सूचना सभी को दी।

पीडीएफ पत्रकार महोदय से क्लब का सवाल है कि उगाही किसे कहते हैं?

…स्वनामधन्य संपादक जी, आपको इस शब्द का अर्थ नहीं पता है तो हम बता देते हैं- उगाही का मतलब होता है बलपूर्वक, छलपूर्वक या ठगी के जरिए किसी से कुछ वसूल लेना। हम पूरे दावे के साथ कहते हैं कि प्रेस क्लब ने उपर्युक्त लोगों से या किसी अन्य से चवन्नी की भी “उगाही” नहीं की है। जिनसे भी राशि प्राप्त हुई है, वह सम्मान पूर्वक प्राप्त हुई है, अकाउंट में प्राप्त हुई है और जरूरतमंद पत्रकारों की सहायता के लिए प्राप्त हुई है। स्वनामधन्य संपादक इसे ही उगाही का नाम दे रहे हैं।

3.स्वनामधन्य संपादक जी, डंके की चोट पर सुन लीजिए कि पत्रकारों के हित में और क्लब के विकास के लिए सहयोग राशि देने वालों का हमेशा स्वागत है। हम आज भी सक्षम लोगों से अपील करते हैं कि कृपया प्रेस क्लब की मदद के लिए आगे आयें। पत्रकार कोविड वारियर हैं। कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। झारखंड में 30 से ज्यादा साथी कोराना की दूसरी लहर में शहीद हुए हैं। उनके परिजनों की मदद में खड़े रहना प्रेस क्लब का धर्म है। हम सक्षम लोगों, संस्थाओं, कंपनियों, प्रतिष्ठानों, मीडिया हाउसेज के संचालकों से अपील करते हैं कि शहीद पत्रकार साथियों के परिजनों के लिए कृपया खुले दिल से मदद करें।

4.स्वनामधन्य पीडीएफ पत्रकार जी ने प्रेस क्लब के नाम पर उगाही की बात एक बार नहीं, बार-बार लिखी है। हमारा सवाल है कि क्या किसी भी व्यक्ति, संस्था या कंपनी ने कहीं शिकायत की है कि उनसे छलपूर्वक, बलपूर्वक या ठगी करते हुए प्रेस क्लब के नाम पर राशि वसूली ली गयी है? क्या गांडीव से किसी ने ऐसा कहा है? क्या प्रख्यात संस्था योगदा सत्संग या किसी अन्य संस्था या व्यक्ति ने कहा है कि उनसे उगाही की गयी है? अगर हां, तो गांडीव ने ऐसे किसी एक भी व्यक्ति का आधिकारिक बयान क्यों नहीं छापा?

5.खबर में लिखा गया कि प्रेस क्लब में बने कोविड हॉस्पिटल में कोई मरीज नहीं था। अब स्वनामधन्य संपादक जी को कौन समझाये कि किसी हॉस्पिटल में अगर कोरोना का मरीज नहीं है तो यह निंदा या आलोचना की बात नहीं, बल्कि खुशी का विषय है। केंद्र से लेकर राज्य तक की सरकारें इस बात के लिए प्रयासरत हैं कि कोविड के मरीजों की संख्या शून्य हो जाये। इन दिनों रिम्स, सदर हॉस्पिटल से अन्य कोविड हॉस्पिटल में मरीजों की संख्या कम हो गयी है, तो क्या यह दुख का विषय है?

यह कैसी पत्रकारिता है भाई? प्रेस क्लब के खिलाफ दुष्प्रचार करना है तो इसका क्या मतलब है कि कुछ भी लिख दो ! खबर में एक जगह लिखा गया कि प्रेस क्लब के हॉस्पिटल में एक भी डॉक्टर नहीं था और फिर उसी खबर में लिखा गया कि बाद में एक डॉक्टर दिखे। हमारा सवाल है कि क्या किसी मरीज ने ऐसी शिकायत की कि वह भर्ती हुआ और उसे किसी डॉक्टर ने नहीं अटेंड किया? सच यह है कि डॉक्टर रोस्टर और जरूरत के हिसाब से हमेशा उपलब्ध रहे।

  1. खबर में लिखा गया कि प्रेस क्लब हॉस्पिटल में आईसीयू तक नहीं है। अरे भाई, प्रेस क्लब में अस्थायी हॉस्पिटल खुला था और इसमें आईसीयू का कोई प्रावधान ही नहीं था। यह ऑक्सीजन सपोर्टेड बेड वाला हॉस्पिटल था। यह बात पहले ही दिन से स्पष्ट थी। गांडीव के स्वनामधन्य संपादक जी, हमारा सवाल है कि जब आपको खबर लिखने के पहले इतनी मामूली जानकारी भी नहीं थी, तो यहां किस आईसीयू की तलाश में आये थे? हम पूछते हैं कि खुद का दिमाग किस आईसीयू में रखकर आये थे !
  2. एक खबर में यह लिखा गया कि प्रेस क्लब के एक कमरे में हॉस्पिटल के एमडी और लड़की बदहवास हाल में मिले। क्या हॉस्पिटल का एमडी और नर्सिंग स्टाफ एक साथ एक कमरे में बैठकर खाना नहीं खा सकते या बात नहीं कर सकते? यह बात अखबार कैसे कह सकता है कि वे बदहवास हाल में थे? क्या अखबार के संपादक या संवाददाता ने उन्हें देखा? वहां जो लोग मौजूद थे, क्या उनमें से किसी ने कहा है कि उन्हें बदहवास स्थिति में देखा गया? प्रेस क्लब चुनौती देता है कि गांडीव वहां मौजूद किसी भी प्रत्यक्षदर्शी को सामने लाये जिसने उन्हें बदहवास स्थिति में देखा हो। असल में यह खबर चरित्रहनन की पत्रकारिता की पराकाष्ठा है।
  3. रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स ऑफ इंडिया के नियमों के अनुसार हर अखबार के लिए एक आरएनआई नंबर होता है और इस नंबर को प्रिंटलाइन के साथ अखबार के हर अंक में छापना अनिवार्य है। गांडीव अखबार में कहीं भी आरएनआई नंबर नहीं छपता। तो क्या यह सवाल नहीं उठता है कि यह अखबार ही फर्जी है? रांची प्रेस क्लब इस बारे में आरएनआई से प्रामाणिक सूचना लेने की कोशिश कर रहा है।
  4. गांडीव का जो पीडीएफ व्हाट्सएप और फेसबुक पर प्रसारित हो रहा है, उसके प्रिंटलाइन में लिखा गया है कि समाचार पत्र वृंदा मीडिया पब्लिकेशंस के प्रिंटिंग प्रेस में छप रहा है। हकीकत यह है कि यह अखबार छप ही नहीं रहा। हम चुनौती देते हैं कि गांडीव एक महीने की मुद्रित प्रतियों का प्रदर्शन करे या फिर उसके संपादक जी इस बात की घोषणा करें कि अब उनका अखबार छपता ही नहीं।

10.आखिरी बात, रांची प्रेस क्लब इस तरह की घृणित पीडीएफ पत्रकारिता की भर्त्सना करता है। प्रेस क्लब को बदनाम करने की मंशा से जो खबरें गांडीव या अन्य किसी मीडिया ने छापी है, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।

नोट- आज की आपकी पम्पलेट पर भी आपकी सच्चाई रखूंगा। बिरसा के गांडीव के सम्मानित संपादक जी।

धन्यवाद

मूल खबर-

रांची प्रेस क्लब पर लगा आरोप, हास्पिटल के नाम पर लाखों का वारा-न्यारा

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  • इसमें कोई शक नहीं कि राँची प्रेस क्लब को कतिपय अखिलेश सिंह जैसे थेथररबाजों ने दलाली का अड्डा बना दिया है...राजेश सिंह की टीम मीडिया को कोठा पर बैठा रखा है। यशवंत जी आप अखिलेश सिंह जैसे लोगों को इतना प्राथमिकता देकर दलाली को क्यों बढ़ावा दे रहे हैं...साले चोर हैं सब...

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