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उत्तर प्रदेश

संगठन पर उपजे सवालों पर राव साहब से जवाब मांगता एक पत्र

कामरेड श्री के. विक्रम राव

साथी कामरान ने अपने पत्र में जो सवाल उठाये उसको भी पढ़ा और उसके बाद उनको जिस तरह से धमकी भरे अंदाज में जवाब दिया गया उसको भी पढ़ा. एक नवनिर्वाचित पार्षद जो युवा भी है उत्साहित भी है और संगठन के लिए समर्पित भी है. कामरान ने क्या गलत किया कामरान ने संविधान माँगा आपने बदले में उसको ढेर सारा ज्ञान दिया मगर संविधान फिर भी नहीं दिया. आखिर जिस संविधान को वेबसाईट लेने की बात की जा रही है उसको उसी मेल से क्यूँ नहीं भेज दिया जा रहा है. आखिर इस गोपनीयता की वजह क्या है?

कामरेड श्री के. विक्रम राव

साथी कामरान ने अपने पत्र में जो सवाल उठाये उसको भी पढ़ा और उसके बाद उनको जिस तरह से धमकी भरे अंदाज में जवाब दिया गया उसको भी पढ़ा. एक नवनिर्वाचित पार्षद जो युवा भी है उत्साहित भी है और संगठन के लिए समर्पित भी है. कामरान ने क्या गलत किया कामरान ने संविधान माँगा आपने बदले में उसको ढेर सारा ज्ञान दिया मगर संविधान फिर भी नहीं दिया. आखिर जिस संविधान को वेबसाईट लेने की बात की जा रही है उसको उसी मेल से क्यूँ नहीं भेज दिया जा रहा है. आखिर इस गोपनीयता की वजह क्या है?

मुझे समझ में ये नहीं आ रहा है कि कामरान ने ऐसा क्या मांग लिया है जिसके कारण आप सार्वजनिक स्थानों पर आपा खो दे रहे हैं और आपके पुत्र विश्वदेव राव सोशल मीडिया पर कामरान के उपर साम्प्रदायिक टिप्पणियाँ कर रहे हैं. यह अत्यंत निंदनीय है जिसका अभी तक आपने खंडन भी नहीं किया. वहीँ दूसरी ओर जिन लोगों से आपको अपशब्द कहने पर श्री रामदत्त,श्री मुदित माथुर जैसे कई साथियों से हम लोगों का झगड़ा हो जाया करता था वही आपके सबसे बड़े विश्वस्त हैं. आखिर ऐसा क्यूँ है? और क्या परिस्थितियाँ आ गयी हैं कि मुखर पत्रकारों के संगठन का नेतृत्व पर्देदारी पर उतर आया है. यह भी सवाल उठता है कि दूसरों को इंगित करने वाले हम पत्रकारों का और उसके नेताओं का दामन दागदार तो नहीं?

इस पूरे घटनाक्रम में गोपनीयता एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न बन गयी है, यह गोपनीयता संविधान के लिये भी है,एकाउंट्स के लिए भी है और संगठन की बैठकों के लिए भी है. कब कौन सी बैठक कहाँ और किन लोगों के साथ हो जाती है, इसकी न तो नोटिस जारी की जाती है और न ही मिनट्स केवल बस केवल अनुशासन की चाबुक की फटकार के साथ ही आवाज सुनाने की कोशिश की जाने लगी है.

कामरान के इस पत्र के बाद उसके द्वारा उठाये गए ये सवाल अब हर आम सदस्य के मन में उठने लगे हैं. ये सच है की वह पहली बार पार्षद बना है तो क्या उसे सवाल पूछने का हक़ भी नहीं है? कौन सा मानदंड है जिसमे किसी नए सदस्य के मौलिक अधिकार को भी छीनने की कोशिश की जा रहे है और उसके संवैधानिक अधिकार को भी.

राव साहब, आप तो इमरजेंसी के विरोधी रहे, आपने लोकतंत्र की लडाई लड़ी मगर अपने ही संगठन में आप लोकतंत्र का गला घोटने में क्यूँ लगे हैं ? मैं तो लम्बे समय से साधारण सदस्य हूँ मगर अब लगने लगा है कि शायद हम जैसो की चुप्पी ने ही इस स्थिति को जन्म दे दिया , कामरान को बहुत बहुत बधाई और समर्थन आवाज उठाने के लिए … जिम्मेदारी अब पदाधिकारियों की है कि वे अपना क्या चरित्र दिखाते हैं? आशा है कि आप मेरे इस पत्र को अन्यथा लेने के बजाय कुछ ऐसा सार्थक कदम उठाएंगे जिससे उठ रही आवाजों को शांत करने में सहायता मिलेगी.

कामरेड भास्कर दूबे
आम सदस्य
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