राष्ट्रपति जुमा के पतन का कारण सहारनपुर का एक खुदरा दुकानदार अतुल गुप्ता है

यदि पंजाब नेशनल बैंक (Punjab National Bank) का पांच खरब रूपयों वाला घोटाला आज न उजागर हुआ होता, तो असली खबर होती कि सुदूर दक्षिण अफ्रिका के भ्रष्टतम राष्ट्रपति जेकब जुमा के पतन का कारण पश्चिम उत्तर प्रदेश के शहर सहारनपुर का एक खुदरा दुकानदार अतुल गुप्ता है। बासमती, आम और काठ की कृत्तियां के लिये जानाजाने वाला यह शहर देवबंद के दारुल उलूम (Darul Uloom Deoband) का केन्द्र है। आज से यह समूचे अफ्रीकी महाद्धीप में कुख्यात हो गया।

इस गाथा का खलनायक है 47-वर्षीय अतुल गुप्ता जिसने स्थानीय रानी बाजार के एक खस्ता दुमंजिले मकान में बचपन गुजारा। वह केपटाउन (दक्षिण अफ्रीका) दो दशक पूर्व गया, व्यापार किया और देश का सातवां सबसे धनी व्यक्ति बना। राष्ट्रपति जुमा की अफ्रीका नेशनल कांग्रेस की आर्थिक सहायता कर के वह खरबपति बन गया। कभी “जीवित शहीद” नेल्सन मंडेला (Nelson Mandela) अफ्रीका कांग्रेस के पुरोधा और राष्ट्रपति थे।

 

फिर उत्तर प्रदेश का प्रसंग ले। इतनी उत्तुंग शिखरों पर सवार होकर भी इन गुप्त बंधु (अजय-अतुल-राजेश) ने अपने गृह प्रदेश का पूरा ख्याल रखा। ये लोग 30 अप्रैल 2013 को दक्षिण अफ्रीका की वायुसेना की आरक्षित पट्टी पर भारतीय जेट एयरवेस के ए-330 नामक विशाल वायुयान में नई दिल्ली से अपने अतिथि समूह को लाये थे। इसमें नामी गिरामी राजनेता, सांसद, व्यापारी, खिलाड़ी, फिल्मीजन आदि थे। गुप्त-बंधु के पारिवारिक पाणिग्रहण समारोह में वे बराती बनकर आये थे। उस वक्त की आखिलेश यादव-नीत समाजवादी सरकार के गणमान्य जन भी इसमें शामिल थे। राष्ट्रपति जुमा ने दिलखोल कर शासकीय मददी इस समारोह को दी। भ्रष्टाचार का यह चरम था।

फिलहाल जुमा के उत्तराधिकारी नवनिर्वाचित राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने पद संभालते ही घोषणा की कि वे जैकब जुमा के शासनकाल के घपले तथा घोटालों की जांच करायेंगे और दण्ड दिलवायेंगे। सूची में यूपी के गुप्त-बंधु शीर्ष पर शोभित हैं।

K Vikram Rao
Mob: 9415000909
Email: k.vikramrao@gmail.com

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संगठन पर उपजे सवालों पर राव साहब से जवाब मांगता एक पत्र

कामरेड श्री के. विक्रम राव

साथी कामरान ने अपने पत्र में जो सवाल उठाये उसको भी पढ़ा और उसके बाद उनको जिस तरह से धमकी भरे अंदाज में जवाब दिया गया उसको भी पढ़ा. एक नवनिर्वाचित पार्षद जो युवा भी है उत्साहित भी है और संगठन के लिए समर्पित भी है. कामरान ने क्या गलत किया कामरान ने संविधान माँगा आपने बदले में उसको ढेर सारा ज्ञान दिया मगर संविधान फिर भी नहीं दिया. आखिर जिस संविधान को वेबसाईट लेने की बात की जा रही है उसको उसी मेल से क्यूँ नहीं भेज दिया जा रहा है. आखिर इस गोपनीयता की वजह क्या है?

मुझे समझ में ये नहीं आ रहा है कि कामरान ने ऐसा क्या मांग लिया है जिसके कारण आप सार्वजनिक स्थानों पर आपा खो दे रहे हैं और आपके पुत्र विश्वदेव राव सोशल मीडिया पर कामरान के उपर साम्प्रदायिक टिप्पणियाँ कर रहे हैं. यह अत्यंत निंदनीय है जिसका अभी तक आपने खंडन भी नहीं किया. वहीँ दूसरी ओर जिन लोगों से आपको अपशब्द कहने पर श्री रामदत्त,श्री मुदित माथुर जैसे कई साथियों से हम लोगों का झगड़ा हो जाया करता था वही आपके सबसे बड़े विश्वस्त हैं. आखिर ऐसा क्यूँ है? और क्या परिस्थितियाँ आ गयी हैं कि मुखर पत्रकारों के संगठन का नेतृत्व पर्देदारी पर उतर आया है. यह भी सवाल उठता है कि दूसरों को इंगित करने वाले हम पत्रकारों का और उसके नेताओं का दामन दागदार तो नहीं?

इस पूरे घटनाक्रम में गोपनीयता एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न बन गयी है, यह गोपनीयता संविधान के लिये भी है,एकाउंट्स के लिए भी है और संगठन की बैठकों के लिए भी है. कब कौन सी बैठक कहाँ और किन लोगों के साथ हो जाती है, इसकी न तो नोटिस जारी की जाती है और न ही मिनट्स केवल बस केवल अनुशासन की चाबुक की फटकार के साथ ही आवाज सुनाने की कोशिश की जाने लगी है.

कामरान के इस पत्र के बाद उसके द्वारा उठाये गए ये सवाल अब हर आम सदस्य के मन में उठने लगे हैं. ये सच है की वह पहली बार पार्षद बना है तो क्या उसे सवाल पूछने का हक़ भी नहीं है? कौन सा मानदंड है जिसमे किसी नए सदस्य के मौलिक अधिकार को भी छीनने की कोशिश की जा रहे है और उसके संवैधानिक अधिकार को भी.

राव साहब, आप तो इमरजेंसी के विरोधी रहे, आपने लोकतंत्र की लडाई लड़ी मगर अपने ही संगठन में आप लोकतंत्र का गला घोटने में क्यूँ लगे हैं ? मैं तो लम्बे समय से साधारण सदस्य हूँ मगर अब लगने लगा है कि शायद हम जैसो की चुप्पी ने ही इस स्थिति को जन्म दे दिया , कामरान को बहुत बहुत बधाई और समर्थन आवाज उठाने के लिए … जिम्मेदारी अब पदाधिकारियों की है कि वे अपना क्या चरित्र दिखाते हैं? आशा है कि आप मेरे इस पत्र को अन्यथा लेने के बजाय कुछ ऐसा सार्थक कदम उठाएंगे जिससे उठ रही आवाजों को शांत करने में सहायता मिलेगी.

कामरेड भास्कर दूबे
आम सदस्य
IFWJ

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लखनऊ में धरना देते समय विक्रम राव और कामरान में हुई तकरार, देखें वीडियो

जिम्मेदार वरिष्ठ पत्रकारों / इन्साफ पसंद पत्रकार नेताओं से एक पत्रकार की गुजारिश

नीचे दिए गए वीडियो को ध्यान से देखिये। ये मौका था दिल्ली मे पत्रकारों के साथ बदसलूकी के खिलाफ हजरतगंज स्थित गाँधी प्रतिमा के नीचे विरोध प्रदर्शन का। इस तरह का मुजाहिरा पत्रकार एकता और एकजुटता की दलील भी देता है। लेकिन यहाँ का मंजर तो मकसद से विपरीत पत्रकारों के मतभेद, खंडित होने और बिखराव के साथ पत्रकार खुद बदसलूकी का शिकार होता दिखाई दिया। दो के बीच जमकर हुयी तकरार में एक वरिष्ठ था और एक उनसे काफी कनिष्ठ। एक युवा और एक बुजुर्ग। बुजुर्ग महोदय सम्मानित, जाने-पहचाने और राष्ट्रीय स्तर की ट्रेड यूनियन के संस्थापक अध्यक्ष हैं। दो पीढ़ियों के पत्रकारों के हुजूम के बीचो-बीच दो पीढ़ियों के इन दो पत्रकारों की तकरार मे दोनों मे कोई एक गलत और कोई एक सही होगा।

मोहम्मद कामरान ifwj के राष्ट्रीय पार्षद चुने गये हैं। उन्होने दर्जनों बार ifwj के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. विक्रम राव और upwju के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी से यूनियन के संविधान की जानकारी के लिये इन लोगों से यूनियन के कार्यालय में सम्पर्क किया। कई बार ई-मेल के जरिये संविधान माँगा। ये महत्वपूर्ण सवाल किया कि यूनियन के चुनाव बिना वोटरों / सदस्यों को किसी भी प्रकार की सूचना दिये बिना कैसे हो जाते हैं? अगर सूचना दी जाती है तो किस माध्यम से दी जाती है?  जब इन सवालों का जवाब नहीं मिला तब कामरान ने सार्वजनिक तौर पर पत्रकारों के समक्ष सवाल पूछने की कोशिश की।

राव साहब कह रहे हैं कि सबकुछ ifwj की website मे मौजूद है। यदि कामरान जी के सवालो का हर जवाब ifwj की website में मौजूद है तो आपको कामरान को गलत ठहराना पड़ेगा और उसे बेवजह परेशान किये जाने और नाहक सियासत करने का दोषी माना जाना चाहिये। यदि website मे ऐसी कोई जानकारी नही है तो आपको ifwj / upwju की कार्यशैली के खिलाफ खुल कर सामने आना होगा। बीच का कोई रास्ता नहीं बचता। आपको बताना ही होगा क्या किसी भी पत्रकार यूनियन से जुड़ा व्यक्तित्व या बाहरी पत्रकार भी यूनियन के बारे मे या उसकी कार्यशैली से जुड़ा सवाल नहीं पूछ सकता है? क्या किसी भी elected body की transparency नहीं होनी चाहिये? अगर ifwj की website पर यूनियन की सारी बाते हैं और चुनाव की सूचना यूनियन सदस्यों को दी गयी थी, फिर भी कामरान ऐसे सवाल बेवजह कर रहे तो कामरान को गलत ठहराया जाना चाहिए लेकिन यदि ifwj वोटरो/सदस्यो को बिना सूचना दिये चुनाव करवाता है तो क्या इन चुनावों को अवैध / असंवैधानिक / नाजायज माना जाना चाहिए। 

कामरान जी द्वारा ifwj के संविधान की जानकारी कई बार माँगने के बाद भी नही दी गयी। जब एक विरोध प्रदर्शन में पत्रकारों के बीच संविधान की जानकारी माँगने का आग्रह किया तो राव साहब ने कामरान को डाट-डपट के सबके सामने कहा कि सारी जानकारी ifwj की website पर है। यदि website पर ऐसी कोई जानकारी नहीं तो क्या जिम्मेदार पत्रकारों को ifwj के अध्यक्ष श्री के विक्रम राव जी और उनकी यूनियन को गलत नहीं ठहराना चाहिये? तकरार का ये वाकिया जिन पत्रकारों के बीच हुआ था वहाँ बहुत सारे पत्रकारों में वरिष्ठ पत्रकार, ifwj के राष्ट्रीय पार्षद, प्रेस क्लब एवं Upsacc के पूर्व पदाधिकारी सुरेश बहादुर सिंह, Upsacc के अध्यक्ष प्रांशु मिश्र और फोटो ज्रर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष एसएम पारी के अतिरिक्त कई जिम्मेदार वरिष्ठ पत्रकार मौजूद थे। इन पत्रकार नेताओं से निवेदन है कि सम्पूर्ण मामले पर अपनी राय और अपना फैसला सुनाते हुए पत्रकारों को अवश्य अवगत कराये कि पूरे वाकिये में सही कौन है और कौन गलत है? 

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=wKMWlBWoUlQ

शुक्रिया
नवेद शिकोह   
लखनऊ
09369670660
navedshikoh84@gmail.com

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पत्रकारों की लड़ाई लड़ने वाले परमानंद पांडेय को अपमानित करना शुरू किया के. विक्रम राव ने!

देश के जाने माने पत्रकार नेता परमानंद पांडेय को अपमानित करने की मुहिम खुद उनके ही संगठन के वरिष्ठों ने शुरू कर दी है. वरिष्ठ पत्रकार और सुप्रीम कोर्ट के वकील परमानंद पांडेय ने मजीठिया वेज बोर्ड की लंबी व मुश्किल लड़ाई लड़ते हुए पूरे देश में आम पत्रकारों के बीच सम्मान और प्रशंसा हासिल की है. लेकिन वे जिस पत्रकार संगठन IFWJ में महासचिव हैं, उसी संगठन के वरिष्ठ लोग उन्हें अपमानित करने की मुहिम चलाने लगे हैं.

ताजी खबर ये है कि आईएफडब्ल्यूजे के सम्मेलन में जब कार्यकारिणी के कई सदस्यों को के. विक्रम राव ने भाग लेने से रोकने की कोशिश की तो परमानंद पांडेय ने बतौर महासचिव इस कृत्य का विरोध किया और सम्मेलन का वाकआउट कर गए. सूत्रों का कहना है कि असल में पूरी लड़ाई सरोकार बनाम दलाली की है. एक तरफ परमानंद पांडेय पत्रकार हितों को लेकर संघर्षरत हैं और सत्ता व मीडिया प्रतिष्ठानों से टकरा रहे हैं तो दूसरी तरफ सत्ता के चारण किस्म के पदाधिकारी हैं जो संगठन को अपने कब्जे में रखकर हर हाल में दलाली संस्कृति को मुख्यधारा बनाए रखना चाहते हैं.

परमानंद पांडे पर के. विक्रम राव खेमे ने आरोप लगाया है कि मजीठिया वेज बोर्ड का केस लड़ने के लिए उन्होंने आईएफडब्लूजे के आफिस का इस्तेमाल किया. यह बड़ा ही हास्यास्पद आरोप है कि अगर कोई पत्रकार संगठन का पदाधिकारी है तो वह पत्रकारों के हित के लिए लड़ता है तो इसमें क्या गलत है. मोदी और मुलायम के हाथों सम्मानित होकर खुद को महान पत्रकार बताने दिखाने वाले के. विक्रम राव नहीं चाहते कि संगठन के बैनर तले पत्रकारों के हित की लड़ाई लड़ी जाए. वे संगठन को सिर्फ नेताओं मंत्रियों अफसरों के आगे समर्पित करके इससे लाभ हासिल करना चाहते हैं. मकान, दुकान, सम्मान, रुपया, पैसा, एवार्ड हासिल करने के चक्कर में ही आज देश के ढेर सारे पत्रकार संगठनों महज हवा हवाई व भाषणबाजी तक सिमट गए हैं.

सूत्रों के मुताबिक आईएफडब्लूजे कार्य समिति की बैठक में विक्रम राव ने दो दर्जन बाउंसर बुला लिए. चर्चा है कि प्रधान महासचिव परमानंद सहित सात सदस्यों को शामिल होने से रोका. परमानंद पांडेय को महासचिव पद से हटाने की भी तैयारी है ताकि संगठन का दलाली के लिए पूर्ण रुपेण इस्तेमाल किया जा सके और कोई सवाल उठाने वाला न रहे. सम्मेलन में गैर सदस्यों को शामिल कर बैठक की औपचारिकता पूरी की जा रही है. उद्घाटन समारोह से मुलायम सिंह यादव ने किया किनारा. डीएम को बनाया मुख्य अतिथि. मथुरा में हुए सम्मेलन को लेकर आरोप लगाया जा रहा है कि मुलायम सिंह यादव के कार्यक्रम के नाम पर जम कर वसूली की गई. सायकिल स्टैंड चलाने वाले और कचौड़ी बेचने वालों को सम्मेलन का आयोजक बनाकर यह दिखा दिया गया कि संगठन पूरी तरह जेबी हो चुका है.

ज्ञात हो कि परमानंद पांडेय एक जमाने में जनसत्ता अखबार में चीफ सब एडिटर हुआ करते थे. उन्होंने पत्रकारों के हित के लिए तीन माह की लंबी स्ट्राइक कराई. बाद में प्रबंधन ने उनका तबादला गोरखपुर कर दिया. उन्हें जब प्रबंधन ने किनारे करने की कोशिश की तो वे वकालत पढ़े होने के कारण सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने लगे और मीडिया वालों की लड़ाई को अपने हाथ में लेकर अंजाम तक पहुंचाने लगे. उन्हें IFWJ का महासचिव बनाया गया लेकिन उन्हें काम करने यानि पत्रकारों की लड़ाई लड़ने से रोकने की भरसक कोशिश की गई लेकिन वो अपने पथ पर डटे रहे. ताजा विवाद के बाद माना जा रहा है कि के. विक्रम राव व उनकी लाबी परमानंद पांडेय को संगठन से बाहर करके संगठन को अपने मनमुताबिक संचालित करेगी.

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के. विक्रम राव, हेमन्‍त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस जैसों को दूर रखना अन्यथा पूरा मिशन तबाह कर देंगे

Kumar Sauvir : अखिलेश जी। मुझे अपनी मौत का मुआवजा एक कराेड़ से कम मंजूर नहीं… अपने मुआवजा सेटलमेंट के बंटवारे का पूरा प्‍लान तय कर लिया है मैंने…  पत्रकार-समिति के लोगों, 10-20 पेटी अलग ले लेना, पर मेरे हिसाब से नहीं… मैंने कर रखा है एक करोड़ मुआवजा के एक-एक पैसा का हिसाब प्‍लान… मेरी चमड़ी खिंचवाना व उसमें भूसा भरके मेरी प्रतिमा स्‍थापित कराना मित्रों… 

इसी तरह ही तो कटता है जीवन का कनेक्‍शन, और अपने लोग अचानक पराये हो जाते है। कुछ की नजर घर के माल-मत्‍ता पर, तो कुछ दोस्‍त-असबाब लोग तो मृतक की बीवी से आंख-मटक्‍का में जुट जाते हैं। पहले जो लोग उस महिला को भाभी जी भाभी जी कहते नहीं थकते थे, अब सीधे बावले “एनडी” सांड़ की तरह अपनी पूंछ सीधा कर अपने पांव से जमीन खुरच करके सरेआम फूं-फां करते चिल्‍लाते हैं:- “अरे हां हमार लल्‍लन-टॉप, यहर आवौ ना !”

पिछले तीन पहले नान-पेमेंट पर फोन और नेट का कनेक्‍शन कट गया, तो यकीन मानिये कि मुझे मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव की याद आ गयी। जनता के प्रति उनकी निष्‍ठा और भाव-प्रवण त्‍याग देखकर मेरी आंखें ही बिलबिला गयीं। अश्रुधार। लगा मानसून केवल इसी की प्रतीक्षा कर रहा था। लेकिन अखिलेश यादव ने मामला ठीक कर दिया। जागेन्‍द्र सिंह के परिवार को इतना रकम-इकराम थमा दिया कि अब बाकी लोगों को कोई दिक्‍कत नहीं। तो ऐसा है अखिलेस भइया, जरा हमारा भी हिसाब कर ल्‍यौ। मैं अपने जीते-जी सारे मामले सुलटाय देना चाहता हूं। कोई धमकी दे रहा है कि तुम्‍हारी पत्रकारिता तुम्‍हारे अंग-विशेष में घुसेड़ देंगे, कोई कह रहा है कि तुम्‍हारे परिवार को चैन से नहीं जीने देंगे, कोई मुझे निपटाने की चेतावनी कर रहा है, कोई नेस्‍तनाबूत करने की चादर बुन रहा है, कोई क्रिमेशन के लिए लकडी जुटा रहा है, किसी ने बिजली वाले श्‍मशान शुल्‍क का पैसा एकट्ठा कर लिया है, तो कोई कफन-दफन और लकड़ी को लेकर उत्‍साहित है। कुल मिलाकर लगातार यह बातें फिजां में तैर रही हैं कि:- कुमार सौवीर। जरा सम्‍भल जाओ। कहीं ऐसा न हो कि तुम्‍हारी भी मुस्‍कुराती फोटो घर की दीवार पर टंगे और उस पर चढ़ी हो एक माला। न हुआ तो कम से चरित्र पर छींटे फेंक डाली जाएंगी, फर्जी मुकदमों में फंसाया जाऊंगा, वगैरह-वगैरह

नहीं नहीं, यह मत समझना कि मैं इन धमकियों से घबरा गया हूं। नक्‍को णी नक्‍को। मुझे तो ऐसी चर्चाएं ज्‍यादा जोशीला बना देती हैं। ऐसे हमले मुझे उम्र को और तराशना शुरू कर देते हैं। मैं खुद को ज्‍यादा जवान महसूस करना शुरू कर देता हूं। और इसी यौवन में फिर नयी खबर खोजने में जुट जाता हूं। हर कोई प्रेम के अतिरेक में मुझे सलाह दे रहा है कि यह यह भेडि़यों का जंगल है और आप अकेले हैं, ध्‍यान रखियेगा। बहुत सतर्कता रखना। वगैरह-वगैरह। दिलासा भी मिल रहा है कि मैं साथ हूं, डोंट वरी—–

तो अब मैं असल बात पर आना चाहता हूं। सन-82 से पत्रकारिता शुरू की थी और आज 2015 के फेंटे में आ चुका हूं। जी-हुजूरी कभी की नहीं, इसलिए जिन्‍दगी में बेहिसाब कष्‍ट भोगे। न जाने कितनी नौकरी से निकाला गया। लेकिन पटी सिर्फ साहसी सम्‍पादकों से ही। जयब्रत राय और विश्‍वेश्‍वर कुमार जैसे कायर सम्‍पादक या तो मुझसे पिट गये या फिर खुद ही खुद को विदा कर गये। जब भी कहीं कोई अन्‍याय हुआ, मैं हाजिर रहा। अपने इसी संस्‍कार-प्रवृत्ति को आजतक सम्‍भाले हूं। इसीलिए जागेन्‍द्र सिंह के हौलनाक हादसे पर अपने खर्चे पर पहुंचा और जितनी भी मिली, सचाई बयान कर दी।

खतरों-धमकियों से डरना मेरी आदत नहीं। मैं जूझना ही सीखा है और आज जब मेरे खात्‍मे की तैयारियां चल रही हैं, मैं उससे भी भिड जाना चाहता हूं। मै चाहता हूं मैं आजीवन आम आदमी के लिए लड़ता रहूं। लेकिन अगर कोई मुझे पेट्रोल डाल कर फूके या ट्रक से नीचे फिंकवा दे, तो वह तो तत्‍काल दाह-संस्‍कार अनिवार्य होगा। लेकिन अगर मेरी गाेली मार कर हत्‍या की जाए, तो मैं अपने सभी मित्रों से आदेशात्‍मक-निवेदन रहेगा कि वे मेरी खाल खिंचवा लें और उसमें भूसा भर के कुमार-सौवीर-कद वाली जीवन्‍त प्रतिमा स्‍थापित करवा दें। पत्रकारिता के सद्य:स्‍तनपायी और नवागतों-छात्रों को अपने जीवन की शुरूआत इसी मुर्दा चमड़ी वाली जीवन्‍त प्रतिमा के दर्शन से कराया जाए, ताकि उनमें पत्रकारिता के दायित्‍वों और उसमें निहित खतरों को भांपने-आंकने और खुद में जिजीविषा उत्‍पन्‍न करने का साहस उमड़े।

इसलिए मैं अखिलेश यादव से सीधे और दो-टूक बात करने आया हूं। तो ऐसा है अखिलेश जी, आपकी सरकार में चंद पत्रकार और कुछ आपराधिक व्‍यक्ति मुझे ठिकाने को आमादा हैं। आप उन्‍हें रोक सकें तो बेहतर है, वरना मैं मर गया तो दिक्‍कत आपकाे भी होगी। अब तक तो लखनऊ के किसी पत्रकार की सामान्‍य मृत्‍यु पर 20 लाख रूपया देने का परिपाटी तो आपने ही शुरू की है। लेकिन जागेन्‍द्र का दाह-काण्‍ड हुआ तो आपने अपने सलाहकार पत्रकारों की सलाह पर मामला खूब टाला। लेकिन जब मैं समेत बाकी पत्रकारों ने जमकर हल्‍ला किया तो आपने जागेन्‍द्र के परिजनों को 30 लाख, दो बच्‍चों को नौकरी, 5 एकड़ फंसी जमीन का करार कर लिया।

कुछ भी हो, इस फैसले का मैं दिल से सम्‍मान और बधाई देता हूं। और मांग करता हूं कि अगर मुझे मार डालना ही अपरिहार्य हो तो मेरे मुआवजे की रकम कम से कम एक करोड़ की जाए। हालांकि मेरे साथी-संगी कम से कम पांच करोड़ की मांग करेंगे जरूर, लेकिन आप एक खोखे पर ही नक्‍की कर लीजिएगा। दूसरी बात यह है कि मैं नहीं चाहता कि मेरी बेटियों को भरपाई के तौर पर कोई सरकारी दी जाए। यह अनुकम्‍पा मैं नहीं चाहता। इतना ही नहीं, शायद मेरी बेटियां भी ऐसी पेशकश को सिरे से ही खारिज कर देंगी। जिन हालातों में यूपी सरकार के कर्मचारी नौकरी करते हैं, मैं और हमारे बच्‍चे उसे स्‍वीकार नहीं करेंगे। एक खास बात यह कि सरकारी नौकरी सरकार की अनुकम्‍पा पर नहीं, व्‍यक्ति की क्षमता पर होनी चाहिए। अगर किसी में दम होगा, तो वह यथायोग्‍य नौकरी हासिल कर ही लेगा। हां, अगर आप चाहेंगे तो इस एवज में इन दोनों को 25-25 लाख रूपया अतिरिक्‍त एकमुश्‍त भुगतान दिला दीजिएगा। क्‍यों पत्रकार दोस्‍तों, सहमत हो या नहीं? ठीक है ठीक है ठीक है, धन्‍यवाद

चूंकि मेरे पास जमीन नहीं है। इसलिए कोई लफड़ा भी नहीं है। इसलिए आप तसल्‍ली से लम्‍बी-लम्‍बी सांसें ले सकते हैं। सरकार खुश हो सकती है, सरकारी नौकर बेफिक्र हो सकते हैं। यह तो रही मेरी मौत का मुआवजा वाले संघर्ष और सफलता की कहानी। अब देखिये, इस मुआवजा के बंटवारे का सटीक-सटीक और फाइनल मसौदा। तो मित्रों। जैसा कि आपको पता है कि यह रकम टैक्‍स-फ्री होगी, यानी पूरा एक करोड। इसमें 25-25 लाख रूपया तो सीधे मेरी बेटियों को बांट दीजिएगा। इसके अलावा बाकी रकम में से 25 लाख रूपया उप्र मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार समिति को दिला दीजिएगा। मुझे खूब पता है कि रवि वर्मा जैसे बेहद बीमार पत्रकारों को मदद के तौर पर एक धेला भी नहीं मिला था। जब मैंने उनकी मदद के लिए 186 पत्रकारों के हस्‍ताक्षर से एक ज्ञापन तैयार किया, तो उसे हेमन्‍त तिवारी ने यह वायदा करके हासिल कर लिया कि रवि वर्मा को मुआवजा दिलायेगा।लेकिन दो साल पहले हेमन्‍त ने यूपी भवन में शराब पीने के बाद उगल दिया था कि उसने मेरा द्वारा तैयार किया गया ज्ञापन फाड़कर फेंक दिया था। हेमन्‍त ने बताया था कि चाहे कुछ भी हो, पूर्व हिसाम के कार्यकाल में कोई भी ऐसा काम नहीं करायेंगे, ताकि सारा दोषारोपण हिसाम पर ही हो।

इतना ही नहीं, जब 23 दिसम्‍बर-11 को मुझे ब्रेन स्‍ट्रोक पड़ा, तो के. विक्रमराव, हेमन्‍त और सिद्धार्थ कलहंस वगैरह एक भी तथा‍कथित मुझे व मेरे परिवारी जनों से मिलने तक नहीं आये, राहत तो कोसों दूर थी। ऐसे में दूसरे पत्रकारों के प्रति इन लोगों का व्‍यवहार क्‍या और कैसा होता, भगवान जाने। इसीलिए मैंन इस कोष की स्‍थापना अपनी मौत के मुआवजे की रकम से करना चाहता हूं, ताकि इसका इसका लाभ आम पत्रकारों को मिले। और चूंकि यह 25 रूपये मैं अपनी जान की कीमत पर पत्रकारों के कल्‍याण के लिए सहयोग-स्‍वरूप दूंगा, इसलिए नहीं चाहूंगा कि इस रकम ऐसे इतने घटिया मानसिकता के लोगों के हाथ पड़े। दोस्‍तों, इसका अलग कोष बनना चाहिए। लेकिन इतना जरूर ध्‍यान रखियेगा कि इस समिति अथवा कोष का संचालन हेमन्‍त तिवारी, के-विक्रमराव और सिद्धार्थ कलहंस जैसे लोगों के हाथ में न पड़े। अन्‍यथा यह मिल कर मेरी पूरी शहादत को मिट्टी में मिला देंगे।

इसलिए तत्‍काल मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार समिति की बैठक कर नया चुनाव कराना और नई कार्यकारिणी को यह कोष सौंप देना। अगर किन्‍हीं जुगाड़-कारणोंवश यह लोग दोबारा चुनाव जीत जीते हैं, तो फिर भी इन लोगों के हाथ में यह कोष मत सौंपना। इसके लिए शलभमणि त्रिपाठी, ब्रजेश मिश्र, आलोक पाण्‍डेय, प्रांशु मिश्र, पंकज झा, नवलकान्‍त सिन्‍हा, अनूप श्रीवास्‍तव, रामदत्‍त त्रिपाठी, शरद प्रधान, आशीष मिश्र, सुधीर मिश्र, हिसाम सिद्दीकी, राजबहादुर, ज्ञानेंद्र शुक्‍ला, श्रेय शुक्‍ल, संतोष बाल्‍मीकि, राजीव मिश्र, अजय कुमार, मनमोहन, प्रभात त्रिपाठी आदि दिग्‍गजों को सौंप देना। रही बची 25 लाख रूपयों की रकम। तो उसे महिला कल्‍याण के लिए खर्च कर दीजिएगा, जो पत्रकारिता में संघर्ष कर रही हैं। मसलन ममता, दीपिका सिंह, बबिता अपूर्व, मंजू, शिरीन, बादेसबा वगैरह-वगैरह। इनके लिए उप्र मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार समिति की ओर से एक कोष बनवाइयेगा। बस, इतना ध्‍यान रखियेगा कि उसमें के. विक्रम राव, हेमन्‍त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस जैसे लोग कत्‍तई शामिल न हों, वरना यह लोग फेवीक्विक लगाकर कुण्‍डली मारे बैठे रहेंगे। वरना यह सब लोग मिल कर पूरा का पूरा मिशन तबाह कर देंगे, जैसे मान्‍यताप्राप्‍त समिति, श्रमजीवी पत्रकार सिंह और प्रेस-क्‍लब का हश्र किया है इन लोगों ने। इन लोगों की छाया से दूर ही रहना इस कोष को मेरे दोस्‍तों। अगर समय रहा तो जिन लोगों को इस ट्रस्‍ट की जिम्‍मेदारी दी जा सकती है, उनका भी नाम सिफारिश के तौर पर पेश कर दूंगा।

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

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मीडिया ने मेरे खिलाफ खूब खबरें छापी पर मैंने इसे अपनी सहज आलोचना माना : मुलायम सिंह यादव

लखनऊ : बदलते दौर में सोशल मीडिया की प्रासंगिकता बढ़ रही है। आज के दौर में इसे नजरअंदाज कर न तो राजनीति संभव है और न ही सरकार चलाना। पूर्व रक्षा मंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने यह विचार इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्लूजे) की ओर से ‘सोशल मीडिया-वरदान या अभिशाप’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद में व्यक्त किए। राजनीति के शुरुआती दिनों को याद करते हुए श्री यादव ने कहा कि कई बार कहा कि मीडिया ने उनके खिलाफ खबरें छापी पर उन्होंने इसे अपनी सहज आलोचना के रूप में ही लिया।

उन्होंने कहा कि आज लोगों तक समाचारों की पहुंच आसान हुयी है। कुछ ही पलों में राजधानी में हो रही घटना से गांवों के लोग वाकिफ हो जाते हैं। पूर्व रक्षा मंत्री ने कहा कि अखबारों के संपादकीय निष्पक्ष होते हैं और वो हर रोज इसे जरूर पढ़ते हैं। श्री यादव ने इस मौके पर आईएफडब्लूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष के विक्रम राव की वेबसाइट का विमोचन भी किया। वेबसाइट में श्री राव की 5 किताबें, 500 से अधिक लेख, परिचय और तस्वीरों का प्रस्तुतिकरण किया गया है।

परिसंवाद में बोलते हुए आल इंडिया रेलवे मेन्स फेडरेशन के राष्ट्रीय महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने कहा कि मीडिया सरकारों को आईना दिखाने का काम करता है। उन्होंने कहा कि आज किसी भी सरकार के लिए मीडिया को नजरअंदाज करना आसान नहीं रह गया है। वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस ने सोशल मीडिया के बढ़ते हुए प्रभाव पर रोशनी डालते हुए कहा कि सोशल मीडिया संचार का लगभग एक दशक पुराना माध्यम है. उन्होंने कहा की इसका प्रचलन तब तेजी में आया जब 2008 में फेसबुक नाम की सोशल वेबसाइट अस्तित्व में आई। उन्होंने कहा कि आज सोशल साईट पर तीन तरह की जमात देखने को मिल रही है। पहली वो जिनका उद्देश्य साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देना है। दूसरी जमात उनकी जो साम्प्रदायिकता की विरोध में खड़े हैं। तीसरी जमात उस दलित चिन्तक वर्ग की है जो सदियों से मीडिया के एक वर्ग के लिए उपेक्षित रहा है। सोशल मीडिया ने ऐसे उपेक्षित वर्ग को एक प्लेटफार्म दिया जहाँ आकर वो अपनी बात रखते है. इसलिए सोशल मीडिया एक वरदान ही है।

इंडियन फेडरेषन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के अध्यक्ष के. विक्रम राव ने अपनी 40 वर्ष के पत्रकारीय जीवन के अनुभव करते हुए कहा कि हमारे समय में सूचनाओं का संवहन बड़ा मुश्किल था. सोशल मीडिया जैसा कोई भी माध्यम मौजूद नहीं था. आज सूचनाओं का संवहन सुगम है. ख़बरें तेजी से इधर से उधर भेजी जा सकती हैं और ये इसलिए संभव है क्योंकि सोशल मीडिया पर आम आदमी की पहुंच है. उन्होंने कहा कि हालाँकि अभी सोशल मीडिया को नियंत्रित करने की आवश्यकता है क्योकि जहाँ एक तरफ सकरात्मक उपयोग है वही इसका नकरात्मक उपयोग किया जा रहा है. श्रोताओं में बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक शामिल थे. गोष्ठी में प्रमुख रूप से अधिवक्ता पदम कीर्ति, हिन्द मजदूर सभा के सचिव उमाशंकर मिश्र, यूनियन के पदाधिकारी हसीब सिद्धीकी, श्याम बाबू, विनीता रानी, उत्कर्ष सिन्हा ने सहभागिता करी एवं मंच का संचालन योगेश मिश्र ने किया।

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