अखबार कोई भी हो, सबका हाल एक जैसा है

वैसे तो टीवी, मोबाइल और इंटरनेट की सुविधा होने के कारण मुझे अखबार मंगाने-पढ़ने की जरूरत नहीं महसूस होती है। लेकिन आदतन एक अंग्रेजी एवं एक हिन्दी का अखबार मंगाता हूं। अखबार के पेज सिर्फ इस आस में पलटता हूं कि शायद मेरे पढ़ने लायक या फिर मेरी जानकारी बढ़ाने वाली कोई खबर मिल जाये। पर, ऐसा कम ही होता है। बड़ी निराशा होती है। मैं अखबार भी बदलता रहता हूं। जैसे दस दिन अगर ‘अमर उजाला’ मंगाया तो अगले दस दिन ‘दैनिक जागरण’ या और कोई अखबार। सबका हाल एक जैसा ही है। पहले नियमित रूप से हिन्दी अखबार का एक ही ब्रांड ‘हिन्दुस्तान’ मंगाता था।

बहरहाल, आज के दिन दैनिक जागरण आया था। पहला पेज फुल पेज विज्ञापन का था, जिसे शायद जैकेट एडवर्टीजमेंट कहते हैं। तीसरा पेज वास्तविक पहले पेज के कलेवर में और पांचवां पेज भी वास्तविक पहले पेज जैसा। खैर, इसका कोई गिला नहीं। मैं ही क्या, सारे पाठक अखबार के इस रूप को स्वीकार करने के आदी हो चुके होंगे। अखबार को यह रूप देने में कोई कानूनी अथवा नैतिक अड़चन भी नहीं है। कुछ लोगों को इस बात का जरूर मलाल हो सकता है कि पहला पेज प्रमुख खबरों को समर्पित करने की परिपाटी ‘शहीद’ हो गयी। मुझे कतई नहीं है। इसकी वजह मेरी यह सोच है कि जब हमारी रुचियों, जरूरतों और खुशियों को बाजार तय कर रहा है तो अखबार कैसा निकले यह भी उसे ही तय करना चाहिए।

इतनी बातें मैं फालतू में कर गया। अब असली बिन्दु पर आता हूं। दैनिक जागरण की आज की पहली और प्रमुख खबर है— “हुर्रियत प्रमुख मस्जिद में इस्लाम का पाठ पढ़ा रहे थे और बाहर भीड़ ने डीएसपी को मार डाला “। हो सकता है कि यह हेडिंग लगाने के लिए संबंधित पत्रकार को संपादक की ओर से काफी वाहवाही मिली हो। यह भी संभव है कि इतनी मार्मिक हेडिंग खुद संपादक ने लगायी हो। इस हेडिंग से ध्वनित होता है कि डीएसपी को मारे जाने का हादसा  इस्लाम का पाठ पढ़ाये जाने का नतीजा है। खबर की बॉडी में बताया गया है, “जिस समय मस्जिद के बाहर यह घटना घटित हुई, उस समय मस्जिद के भीतर उदारवादी हुर्रियत कान्फरेंस के प्रमुख मीरवाइज मौलवी उमर फारूक लोगों को इस्लाम का पाठ पढ़ाते हुए अमन की सीख दे रहे थे।” पुलिस अधिकारी को मारे जाने का हादसा जघन्य है, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। लेकिन क्या वैचारिक आवेश में आकर किसी पत्रकार को इस तरह की हेडिंग लगानी चाहिए। मेरी समझ से तो यह जायज नहीं है।

एक जमाना मैंने वह भी देखा है, जब हिन्दी अखबारों में हत्या और बलात्कार जैसी जघन्य घटनाओं को रोचक बनाने की नीयत से बेहद फूहड़ प्रयोग किये जाते थे। उसी दौर में गोरखपुर के एक अखबार में छपी हेडिंग देखिए– “अरहर के खेत में शौच कर रही महिला के साथ बलात्कार”। मैं आज और दैनिक जागरण दोनों अखबारों में काम कर चुका हूं। जरा इन अखबारों में छपने वाली हत्या की खबरों के इन शीर्षकों पर गौर कीजिए–  “छत पर पत्नी के साथ सो रहे युवक की हत्या”, “ससुराल जा रहे युवक की बेरहमी से पीट-पीट कर हत्या”।

विनय श्रीकर
वरिष्ठ पत्रकार
नोएडा
9792571313



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Comments on “अखबार कोई भी हो, सबका हाल एक जैसा है

  • शाहनवाज़ अली says:

    ये नियति बन चुकी है, ओर एक मुहिम के तौर पर ये सब जारी है। अपने शायद यहां छपे इनसेट पर गौर नही किया, जिसमे लिखा था कि मोहम्मद अय्यूब के नाम के आगे पंडित न लगा होता तो शायद बच जाती जान। ये सब तरह तरह की बातों के हवाले से डाला गया। अब आप समझ सकते हैं और ये इनसेट मेरठ एडिशन के मुज़फ्फरनगर में तो छपा है।

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