सहारा-सेबी सांठगांठ : इनकी नौटंकी से लाखों निवेशकों को आज तक नहीं मिली फूटी कौड़ी

प्रॉपर्टी के खरीददार नहीं मिलने का करते हैं दिखावा

मुंबई। सहारा ग्रुप के मालिक घोटालेबाज सुब्रत रॉय और सेबी की सांठगांठ की वजह से उसकी अरबों की प्रॉपर्टी जब्त नहीं हो पाई है। इसकी वजह से लाखों निवेशकों को आज तक फूटी कौड़ी नहीं मिली, लेकिन सेबी के माध्यम से सरकार की भी निवेशकों के प्रति दिखावे की राजनीति चल रही है। केंद्र में कांग्रेस सरकार के बाद भाजपा सत्ता में आई, लेकिन आज तक निवेशकों का पैसा नहीं मिला। अब एक बार फिर सेबी ने दिखावे के लिए सहारा ग्रुप को निवेशकों के पैसे हड़पने का आरोप लगाते हुए लौटाने का निर्देश दिया है।

निवेशकों को न मिले पैसा ऐसी है मानसिकता सुब्रत रॉय सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार तिहाड़ जेल में थे। उनकी पूरी प्रॉपर्टी बेच दी जाए तो निवेशकों को सालाना 15% की दर से ब्याज के साथ धन लौटाया जा सकता है, लेकिन सरकार और उसके अंतर्गत सेबी जैसी एजेंसियों ने भी रॉय के साथ सांठगांठ की है। इसीलिए सेबी ने अपने अंतर्गत प्रॉपर्टी बेचने के बजाय रॉय को ही बेचने के लिए कहा है। वास्तव में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सेबी प्रॉपर्टी बेच सकती है। यदि ऐसा हुआ तो निवेशकों का पैसा मिल सकता है, लेकिन निवेशकों को पैसा मिले, ऐसी मानसिकता सरकार की नहीं है। इसीलिए सहारा की एंबी वैली जैसी संपत्ति को खरीददार नहीं मिलने का दिखावा किया जाता है।

निवेशकों का पैसा जा सकता है सरकार की तिजोरी में कभी-कभी निवेशक पैसा नहीं मांगते, इसलिए हम उनको पैसा नहीं लौटाते, ऐसी भूमिका रॉय ने ली है, लेकिन यदि निवेशक पैसा नहीं मांगते, तो वही पैसा सरकार की तिजोरी में जा सकता है। इसीलिए सरकार भी अपने फायदे के लिए चुप्पी साध रखी है और ‘सेबी-सहारा-कोर्ट’ का खेल खेला जा रहा है।

वैल्यूएशन में धांधली सेबी वैल्यूएशन करने का काम कैप नामक कंपनी को देती है, वहीं इनकी सांठगांठ रहती है। इसके तहत कौड़ी के भाव प्रॉपर्टी खरीदी जाती है और अखिर तक निवेशकों को पैसा नहीं मिलता। गौरतलब है कि प्रॉपर्टी लेने वाले कीभी सांठगांठ रहती है। वह भी उन्हीं के अपने ही आदमी रहते हैं। सेबी की ओर से बैलेंसशीट में मार्गेज के कारण वैल्यूएशन बड़ा दिखाते हैं, जिससे प्रॉपर्टी की ज्यादा कीमत नहीं मिलती है।

लंबी प्रक्रिया से न्याय मिलने में देरी न्याय पाने के निवेशकों को लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। वैल्यूएशन निकालना और नोटिस देने जैसी लंबी और पेचीदगी भरी कार्रवाई से पीड़ितों के लिए न्याय की राह कठिन होती जाती है।

लेखक उन्मेष गुजराथी मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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